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भरत भूषण तिवारी मामला: बिहार मानवाधिकार आयोग ने राज्य सरकार को मुआवजा देने का निर्देश दिया

भोजपुर के भरत भूषण तिवारी मौत मामले में बिहार मानवाधिकार आयोग ने बिहार सरकार को मृतक के माता-पिता को अंतरिम (एक्स-ग्रेशिया) मुआवजा देने का निर्देश दिया है। हालांकि आयोग ने स्पष्ट किया कि जांच और न्यायिक जांच पूरी होने से पहले राज्य की जिम्मेदारी तय..

बिहार न्यूज
3 अगस्त को अगली सुनवाई
© सोशल मीडिया
Jitendra Vidyarthi
4 मिनट

PATNA: भोजपुर जिले के शाहपुर थाना क्षेत्र के बेलौथी गांव निवासी भरत भूषण तिवारी की गोली लगने से हुई मौत के मामले में बिहार मानवाधिकार आयोग (BHRC) ने महत्वपूर्ण अंतरिम आदेश दिया है। आयोग ने मानवीय आधार पर मृतक के भारत तिवारी के माता-पिता को उचित अंतरिम (एक्स-ग्रेशिया) मुआवजा देने का निर्देश बिहार सरकार को दिया है।


 हालांकि आयोग ने स्पष्ट किया है कि फिलहाल यह कहना जल्दबाजी होगी कि इस घटना के लिए राज्य सरकार या उसके अधिकारियों की गलती है। आयोग के अध्यक्ष न्यायमूर्ति ए.एम. बदर ने 3 जुलाई 2026 को यह आदेश पारित किया। यह मामला भरत भूषण तिवारी की 17 जून 2026 को हुई मौत से जुड़ी कई शिकायतों पर सुनवाई के दौरान सामने आया।


सरकार ने मांगा था समय

सुनवाई के दौरान बिहार सरकार की ओर से अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक (कानून-व्यवस्था) ने आयोग को बताया कि मामले की जांच अभी जारी है। विभिन्न विभागों और अधिकारियों से सूचनाएं एकत्र की जा रही हैं। साथ ही, इस मामले की न्यायिक जांच भी पटना हाईकोर्ट के पूर्व न्यायाधीश की अध्यक्षता में गठित आयोग द्वारा की जा रही है। इन्हीं कारणों से राज्य सरकार ने जवाब दाखिल करने के लिए दो सप्ताह का अतिरिक्त समय मांगा, जिसे आयोग ने स्वीकार कर लिया।


पोस्टमार्टम रिपोर्ट में गोली लगने से मौत की पुष्टि

आयोग ने अपने आदेश में कहा कि यह विवादित नहीं है कि भरत भूषण तिवारी की मृत्यु हुई है। पोस्टमार्टम रिपोर्ट के अनुसार उनकी मौत गोली लगने से हुए गंभीर रक्तस्राव (हेमरेज) और शॉक के कारण हुई। आयोग ने इसे एक युवा जीवन की दुखद क्षति बताया।


अभी राज्य की जिम्मेदारी तय नहीं

आयोग ने कहा कि सार्वजनिक कानून के तहत राज्य पर मुआवजे की जिम्मेदारी तय करने के लिए यह साबित होना आवश्यक है कि राज्य मशीनरी ने अवैध, दुर्भावनापूर्ण या घोर लापरवाहीपूर्ण कार्रवाई की है। चूंकि पुलिस जांच और न्यायिक जांच दोनों अभी लंबित हैं, इसलिए इस स्तर पर राज्य की जिम्मेदारी तय करना उचित नहीं होगा। आयोग ने कहा कि ऐसा करने से जांच प्रभावित हो सकती है और पूर्वाग्रह की स्थिति उत्पन्न हो सकती है।


अंतरिम राहत देने का निर्देश

हालांकि आयोग ने राज्य की कानूनी जिम्मेदारी तय नहीं की, लेकिन मानवाधिकार संरक्षण अधिनियम, 1993 की धारा 18(सी) का हवाला देते हुए कहा कि जांच पूरी होने से पहले भी पीड़ित या उसके परिजनों को तत्काल राहत देने की सिफारिश की जा सकती है।


इसी प्रावधान के तहत आयोग ने बिहार सरकार को निर्देश दिया कि भरत भूषण तिवारी के माता-पिता, जिन्हें मृतक का आश्रित माना गया है, को उचित एक्स-ग्रेशिया राशि दी जाए। आयोग ने स्पष्ट किया कि यह भुगतान केवल अंतरिम राहत होगी और इससे जांच के अंतिम निष्कर्ष या राज्य की कानूनी जिम्मेदारी पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा।


अगली सुनवाई 3 अगस्त को

आयोग ने बिहार सरकार और संबंधित अधिकारियों को 3 अगस्त 2026 तक अपना विस्तृत जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है। इसके बाद मामले की अगली सुनवाई होगी।