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Bihar News : न UPSC पास की, न ट्रेनिंग ली... फिर भी बन गया IAS! बिहार के युवक ने सिस्टम को चकमा देकर ऐसे बुना करोड़ों की ठगी का जाल

न UPSC पास की, न ट्रेनिंग ली... फिर भी बन गया IAS! सरकारी ठेके दिलाने के नाम पर करोड़ों की ठगी करने वाले गिरोह का खुलासा। पढ़िए कैसे सिस्टम को ही बना दिया गया शिकार।

Bihar News : न UPSC पास की, न ट्रेनिंग ली... फिर भी बन गया IAS! बिहार के युवक ने सिस्टम को चकमा देकर ऐसे बुना करोड़ों की ठगी का जाल
Tejpratap
Tejpratap
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Bihar News : बिहार के एक युवक ने आईएएस बनने के लिए न तो यूपीएससी की परीक्षा पास की, न वर्षों तक किताबों में सिर खपाया और न ही किसी ट्रेनिंग अकादमी का मुंह देखा। लेकिन मजे की बात यह है कि वह आईएएस अधिकारी बनकर सरकारी दफ्तरों, स्कूलों और कारोबारियों के बीच ऐसा घूमता रहा, जैसे सचमुच देश की नौकरशाही उसी के कंधों पर टिकी हो। और हैरानी की बात यह नहीं है कि उसने लोगों को ठगा, बल्कि यह है कि सिस्टम लंबे समय तक उसकी इस नौटंकी को पहचान ही नहीं पाया।


गोरखपुर पुलिस ने अब बिहार के सीतामढ़ी निवासी ललित किशोर उर्फ गौरव कुमार सिंह और उसके गिरोह के खिलाफ गैंगस्टर एक्ट के तहत कार्रवाई की है। आरोप है कि यह गिरोह सरकारी टेंडर, ठेका और योजनाओं का लाभ दिलाने के नाम पर लोगों से करोड़ों रुपये की ठगी करता था। लेकिन सवाल यह है कि आखिर एक फर्जी आईएएस इतने लंबे समय तक असली अधिकारियों की तरह कैसे घूमता रहा?


बताया जा रहा है कि गिरोह का सरगना ललित किशोर खुद को आईएएस अधिकारी बताता था। उसका साला अभिषेक कुमार स्टेनो बन जाता था और एक अन्य साथी गनर की भूमिका निभाता था। यानी पूरी सरकारी व्यवस्था का एक प्राइवेट संस्करण तैयार कर लिया गया था। वर्दी, स्टाफ, सुरक्षा कर्मी, पहचान पत्र और सरकारी अंदाज—सब कुछ मौजूद था। कमी सिर्फ असली नियुक्ति पत्र की थी, जिसकी जरूरत शायद किसी ने महसूस ही नहीं की।


विडंबना देखिए कि यह फर्जी अधिकारी कई स्कूलों में निरीक्षण और जांच करने तक पहुंच गया। लोगों ने सवाल पूछने के बजाय उसकी अगवानी की। पड़ोसी उसे आईएएस मान बैठे, कारोबारी उसके प्रभाव में आ गए और कई लोग सरकारी ठेके पाने के सपने देखने लगे। लगता है कि हमारे यहां किसी व्यक्ति के हाथ में फाइल, गले में आईडी कार्ड और साथ में दो लोग चल रहे हों तो उसकी पहचान जांचने की जरूरत नहीं समझी जाती।


इस पूरे मामले का दूसरा दिलचस्प पहलू तकनीक का इस्तेमाल है। पुलिस के अनुसार गिरोह नकली व्हाट्सएप चैट, फर्जी पत्राचार, कूटरचित दस्तावेज और एआई आधारित सामग्री तैयार कर लोगों को भरोसा दिलाता था। यानी जहां सरकार डिजिटल इंडिया का सपना दिखा रही है, वहीं ठगों ने भी डिजिटल ठगी का नया पाठ्यक्रम शुरू कर दिया है।


असल चिंता सिर्फ करोड़ों रुपये की ठगी नहीं है। चिंता इस बात की है कि यदि कोई व्यक्ति महीनों तक आईएएस बनकर घूम सकता है, निरीक्षण कर सकता है, प्रभाव जमा सकता है और लोगों को विश्वास दिला सकता है कि वह एक वरिष्ठ अधिकारी है, तो हमारी सत्यापन प्रणाली कितनी मजबूत है? क्या किसी अधिकारी की पहचान जांचने का कोई आसान और प्रभावी तंत्र नहीं है? या फिर समाज अब भी पद और रुतबे के सामने सवाल पूछना अपनी बेइज्जती समझता है?


गोरखपुर पुलिस ने आरोपियों को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया है और अब उनकी संपत्तियों का ब्योरा जुटाकर जब्ती की तैयारी की जा रही है। कानून अपना काम कर रहा है, लेकिन यह मामला केवल अपराध की कहानी नहीं है। यह उस मानसिकता का आईना भी है जिसमें लोग सरकारी पहुंच और प्रभाव के लालच में बिना जांच-पड़ताल के किसी पर भी भरोसा कर लेते हैं।


फर्जी आईएएस का यह मामला एक बार फिर बता गया कि ठगों की सफलता उनकी चालाकी से कम और सिस्टम की लापरवाही से ज्यादा तय होती है। वरना बिना परीक्षा दिए आईएएस बनना आज भी भारत में उतना ही मुश्किल है, जितना बिना टिकट के विमान उड़ाना। फर्क सिर्फ इतना है कि यहां विमान उड़ने से पहले पकड़ लिया जाता है, लेकिन फर्जी अफसर लंबे समय तक उड़ान भरते रहते हैं।