SARAN: छपरा शहर की बहुप्रतीक्षित डबल डेकर पुल परियोजना अब बड़े जमीन विवाद में घिरती नजर आ रही है। इस परियोजना के निर्माण मार्ग में आने वाले गांधी चौक से तेलपा और नेहरू चौक के बीच स्थित करीब 200 से अधिक मकानों पर बेदखली का खतरा मंडरा रहा है। इनमें कई ऐसे घर हैं, जहां परिवार पिछले 90 वर्षों से रह रहा हैं।
जिला प्रशासन ने पहले चरण में 78 भू-स्वामियों को नोटिस जारी कर उनकी जमाबंदी (भूमि अभिलेख) रद्द करने की प्रक्रिया शुरू कर दी है। इस कार्रवाई के बाद प्रभावित परिवारों में चिंता और आक्रोश का माहौल है। लोगों का कहना है कि उन्हें उम्मीद थी कि परियोजना के लिए भूमि अधिग्रहण होने पर नियमानुसार मुआवजा मिलेगा, लेकिन अब उनके स्वामित्व के अधिकार पर ही सवाल खड़े किए जा रहे हैं।
'घुड़दौड़ रोड' बताकर उठाए गए स्वामित्व पर सवाल
प्रशासन के अनुसार, जिस भूमि पर आज दो और चार मंजिला इमारतें बनी हुई हैं, वह पुराने खतियान में 'घुड़दौड़ सड़क (रेस कोर्स रोड)' के रूप में दर्ज है। इसी आधार पर अपर समाहर्ता (एडीएम) स्तर से 78 भू-स्वामियों को नोटिस जारी कर पूछा गया है कि उनकी जमाबंदी क्यों नहीं रद्द की जाए। सभी संबंधित लोगों को निर्धारित समय सीमा के भीतर अपना पक्ष रखने का अवसर दिया गया है।
प्रशासन का दावा
प्रशासनिक रिपोर्ट के अनुसार, संबंधित भूमि मूल रूप से लगभग सात बीघा क्षेत्र में फैली घुड़दौड़ (रेस कोर्स) की सड़क थी। प्रशासन का कहना है कि समय के साथ इस भूमि पर नियमों के विपरीत अथवा अवैध तरीके से जमाबंदी कायम कर ली गई और बाद में मकानों का निर्माण कर दिया गया। डबल डेकर पुल परियोजना के लिए भूमि अभिलेखों की जांच के दौरान यह मामला सामने आने के बाद कार्रवाई शुरू की गई।
मुआवजे की उम्मीद, मिला नोटिस
प्रभावित मकान मालिकों का कहना है कि प्रशासन ने पहले सर्वे कर मकानों, मालिकों और अन्य विवरण इसलिए जुटाए थे ताकि भूमि अधिग्रहण के बाद मुआवजा दिया जा सके। लेकिन अब मुआवजा देने के बजाय जमाबंदी रद्द करने का नोटिस जारी कर दिया गया है, जिससे लोगों में असमंजस और नाराजगी है।
स्थानीय लोगों का दावा है कि उनके पूर्वजों ने यह भूमि विधिवत रजिस्ट्री (सेल डीड) के माध्यम से खरीदी थी और उसी आधार पर दशकों पहले मकानों का निर्माण कराया गया था। उनके पास स्वामित्व से जुड़े सभी दस्तावेज मौजूद हैं, जिन्हें एडीएम कोर्ट में प्रस्तुत किया जा चुका है।
एडीएम कोर्ट में होगी सुनवाई
प्रशासन द्वारा जारी नोटिस के बाद अब पूरे मामले की सुनवाई एडीएम कोर्ट में होगी। सुनवाई के दौरान भू-स्वामी अपने पक्ष में सेल डीड, जमाबंदी और अन्य दस्तावेज प्रस्तुत करेंगे। इसके बाद प्रशासन तय करेगा कि संबंधित जमाबंदी को बरकरार रखा जाए या उसे रद्द किया जाए।
लोगों में आक्रोश
प्रभावित परिवारों का कहना है कि यदि सरकार सार्वजनिक परियोजना के लिए भूमि अधिग्रहित करती है तो उन्हें कोई आपत्ति नहीं है, लेकिन बिना मुआवजा दिए स्वामित्व समाप्त करने की कार्रवाई न्यायसंगत नहीं है। उनका कहना है कि उन्होंने वर्षों की मेहनत की कमाई से अपने घर बनाए हैं और कई परिवार पीढ़ियों से यहां रह रहे हैं। ऐसे में बेदखली का नोटिस उनके भविष्य को संकट में डालने जैसा है।
1931 से जुड़ा है भूमि विवाद का इतिहास
भूमि मामलों के जानकार एवं अधिवक्ता सुनील शर्मा के अनुसार, इस विवादित भूमि का इतिहास लगभग एक शताब्दी पुराना है। वर्ष 1931 में यह भूमि छह बड़े जमींदारों के स्वामित्व में थी। इन जमींदारों ने निजी स्तर पर घुड़दौड़ (रेस कोर्स) के लिए लगभग सात बीघा भूमि उपलब्ध कराई थी। बाद में तत्कालीन रेस कोर्स अधिकारी के माध्यम से सखी चंद्र के नाम केवाला (दस्तावेज) तैयार किया गया।
वर्ष 1950 में बिहार सरकार ने इस भूमि के एक हिस्से का विधिवत अधिग्रहण किया, जिसमें वर्तमान पुलिस लाइन का दक्षिणी भाग भी शामिल है। अधिवक्ता का कहना है कि यदि केवल पुराने खतियान के आधार पर कई दशक पुरानी जमाबंदियों को रद्द किया जाता है, तो यह मामला न्यायिक समीक्षा का विषय बन सकता है।
पहले भी हो चुका है विवाद
यह पहली बार नहीं है जब यह मामला विवादों में आया हो। वर्ष 2022 में भी प्रशासन ने इसी परियोजना के लिए 268 भू-स्वामियों को मकान खाली करने और बिना मुआवजा दिए भूमि छोड़ने का नोटिस जारी किया था। इसके खिलाफ प्रभावित लोगों ने पटना हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी। सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने निर्माण कार्य पर रोक लगा दी थी। बाद में जिला प्रशासन और भू-स्वामियों के बीच बातचीत के बाद मामला शांत हुआ था।
अब एक बार फिर प्रशासन की कार्रवाई से विवाद गहराने की आशंका है। फिलहाल सभी की निगाहें एडीएम कोर्ट की सुनवाई पर टिकी हैं। यदि जमाबंदी रद्द होती है, तो प्रभावित भू-स्वामी उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटा सकते हैं। वहीं, यदि भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया अपनाई जाती है तो मुआवजे का मुद्दा सबसे महत्वपूर्ण होगा। डबल डेकर पुल जैसी महत्वाकांक्षी परियोजना से जुड़ा यह भूमि विवाद फिलहाल छपरा शहर में चर्चा का प्रमुख विषय बना हुआ है।





