मुजफ्फरपुर/आरा : क्या भरत तिवारी मुठभेड़ विवाद ने बिहार पुलिस के एक पुराने और विवादित एनकाउंटर की फाइल फिर खोल दी है? क्या लगभग दो दशक पहले मुजफ्फरपुर में हुई कथित मुठभेड़ में उठे सवाल आज भी जवाब मांग रहे हैं? भोजपुर के चर्चित भरत तिवारी मुठभेड़ मामले में तत्कालीन एसडीपीओ राजेश शर्मा का नाम सामने आने के बाद 19 साल पुराना ब्रह्मपुरा मुठभेड़ कांड एक बार फिर चर्चा के केंद्र में आ गया है।
वर्ष 2007 में मुजफ्फरपुर के ब्रह्मपुरा थाना क्षेत्र स्थित एमआईटी इलाके में पुलिस मुठभेड़ में तीन युवकों की मौत हुई थी। उस समय पुलिस ने दावा किया था कि वाहन जांच के दौरान संदिग्ध युवकों ने पुलिस टीम पर फायरिंग कर दी थी, जिसके बाद जवाबी कार्रवाई में तीनों को मार गिराया गया।
मारे गए युवकों की पहचान मनीष शर्मा, मुकेश ठाकुर और सुबोध कुमार सिंह उर्फ उदारा सिंह के रूप में हुई थी। लेकिन क्या वास्तव में यह मुठभेड़ थी या फिर किसी और कहानी को एनकाउंटर का रूप दिया गया? यही सवाल उस समय उठे थे और आज फिर चर्चा में हैं।
घटना के बाद मृतकों के परिजनों ने पुलिस के दावे को चुनौती दी। मनीष शर्मा की मां अनीता देवी ने आरोप लगाया कि पुलिस उनके बेटे को घर से पूछताछ के नाम पर लेकर गई थी और अगले दिन उसकी मौत की सूचना मिली। उन्होंने इस मामले को फर्जी मुठभेड़ बताते हुए न्याय की लड़ाई शुरू की। मामले की गंभीरता को देखते हुए तत्कालीन डीआईजी अरविंद पांडेय ने सीआईडी जांच की अनुशंसा की थी। बाद में यह मामला राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग तक पहुंचा, जहां पुलिस कार्रवाई पर गंभीर सवाल खड़े किए गए।
आयोग की जांच में कई ऐसे तथ्य सामने आए जिन्होंने पुलिस के दावों को कमजोर किया। आयोग ने पाया कि पुलिस की जनरल डायरी में हथियार, कारतूस और खोखे की बरामदगी का स्पष्ट उल्लेख नहीं था। सवाल यह भी उठा कि यदि मुठभेड़ हुई थी तो घटनास्थल से मिले साक्ष्य पुलिस के दावों से मेल क्यों नहीं खाते?
जांच के दौरान पुलिस अधिकारियों और प्रत्यक्षदर्शियों के बयानों में भी विरोधाभास सामने आए। पुलिस जीप के चालक और तत्कालीन थानेदार के बयान अलग-अलग पाए गए। एक बयान में कहा गया कि युवकों ने पहले फायरिंग की, जबकि दूसरे में पुलिस द्वारा पीछा करते हुए गोली चलाने की बात सामने आई।
बैलिस्टिक रिपोर्ट ने भी कई सवाल खड़े किए। मृतकों के हाथों पर गन पाउडर या फायरिंग के पर्याप्त साक्ष्य नहीं मिले। पुलिस का दावा था कि चार पिस्तौलों से कुल 15 राउंड फायरिंग हुई, लेकिन घटनास्थल से मिले सबूत इस दावे को पूरी तरह पुष्ट नहीं कर सके।
मानवाधिकार आयोग ने अपनी टिप्पणी में कहा था कि रात के अंधेरे में इतनी सटीक गोलीबारी संदेह पैदा करती है। आयोग ने यह भी सवाल उठाया कि शवों के पास पर्याप्त मात्रा में खून क्यों नहीं मिला। इससे यह आशंका भी व्यक्त की गई कि घटना किसी अन्य स्थान पर हुई हो सकती है।
आयोग ने मृतकों के परिजनों को पांच-पांच लाख रुपये मुआवजा देने का आदेश दिया था। साथ ही तत्कालीन पुलिस अधिकारियों की भूमिका पर भी सवाल उठाए गए थे। इनमें उस समय के सदर थानेदार राजेश शर्मा सहित अन्य अधिकारियों के नाम भी शामिल थे। अब जब भरत तिवारी मुठभेड़ मामले में राजेश शर्मा का नाम चर्चा में है, तब ब्रह्मपुरा कांड फिर सुर्खियों में आ गया है। सवाल उठ रहे हैं कि क्या पुराने आरोपों और नई घटनाओं के बीच कोई समानता है? क्या उन पुराने सवालों के जवाब कभी मिल पाएंगे?
हालांकि इन मामलों में अंतिम कानूनी निष्कर्ष और न्यायिक प्रक्रिया का सम्मान करना आवश्यक है, लेकिन इतना जरूर है कि भरत तिवारी प्रकरण ने ब्रह्मपुरा एनकाउंटर की यादें फिर ताजा कर दी हैं। यही कारण है कि करीब दो दशक पुराना यह मामला एक बार फिर बिहार की सियासत और पुलिस व्यवस्था के बीच बहस का विषय बन गया है।





