पटना: बिहार की सियासत में इन दिनों एक ऐसा मुद्दा दस्तक दे चुका है, जिसने सत्ता के गलियारों में अचानक हलचल बढ़ा दी है। मुद्दा है—समान नागरिक संहिता यानी UCC। केंद्र में गृह मंत्री अमित शाह के बयान के बाद देश की राजनीति में इसकी चर्चा तेज हुई, लेकिन बिहार में मामला थोड़ा ज्यादा दिलचस्प हो गया है। वजह है NDA का सबसे बड़ा सहयोगी दल JDU।
अमित शाह ने कहा कि 2029 से पहले NDA शासित राज्यों में UCC लागू करने का लक्ष्य है। बयान सामने आया तो बिहार में सवाल उठने लगा—क्या NDA के साथ सरकार चला रही JDU भी इसके लिए तैयार है? सोमवार को JDU के प्रदेश महासचिव श्याम रजक ने साफ कहा—“बिहार में इसे लागू नहीं होने देंगे।” बयान आया तो सियासी तापमान बढ़ना स्वाभाविक था। लेकिन इसके तुरंत बाद JDU के राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष संजय झा का बयान आया—पहले UCC का प्रारूप देखा जाएगा, फिर गृह मंत्री अमित शाह से मुलाकात होगी।
यानी एक तरफ पार्टी का नेता कह रहा था ‘लागू नहीं होने देंगे’, दूसरी तरफ पार्टी नेतृत्व कह रहा था ‘पहले ड्राफ्ट देखेंगे।’ अब सवाल यही है—JDU का अंतिम स्टैंड क्या है? मंगलवार को इस सवाल ने और जोर पकड़ लिया। पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और केंद्रीय मंत्री ललन सिंह के बीच दो दौर की बैठक हुई। बैठक खत्म हुई तो डिप्टी CM विजय चौधरी मीडिया के सामने आए। उन्होंने कहा कि पार्टी पहले बिल के प्रावधानों का अध्ययन करेगी। पार्टी के भीतर विचार-विमर्श के बाद आगे फैसला होगा। अभी तो बिल किसी ने देखा ही नहीं है। विजय चौधरी का एक वाक्य खास था—“बिल ऐसा हो जिसमें हमारी बात हो।” तो आखिर JDU की ‘बात’ क्या है? क्या UCC पर NDA में सहमति बन पाएगी? और अगर JDU साथ नहीं आती तो क्या बिहार में इसे लागू करना संभव होगा? आइए, 5 पॉइंट में पूरी कहानी समझते हैं।
1. सबसे पहला सवाल—क्या बिहार में UCC लागू करने की तैयारी शुरू हो चुकी है?
फिलहाल उपलब्ध जानकारी के मुताबिक 15 सितंबर 2026 तक बिहार सरकार की ओर से UCC लागू करने के लिए कोई आधिकारिक बिल, ड्राफ्ट, विशेषज्ञ समिति या कैबिनेट प्रस्ताव सार्वजनिक नहीं किया गया है।यानी अमित शाह के बयान के बाद राजनीतिक चर्चा जरूर तेज हुई है, लेकिन बिहार में कानून बनाने की औपचारिक प्रक्रिया शुरू होने की सार्वजनिक जानकारी सामने नहीं आई है।
UCC लागू करना सिर्फ केंद्र की घोषणा से संभव नहीं होगा। राज्य को अपना मॉडल तैयार करना होगा। इसके लिए ड्राफ्ट तैयार करने, उस पर विचार-विमर्श और राज्य की विधायी प्रक्रिया से गुजरने की जरूरत होगी। उत्तराखंड में UCC लागू करने की प्रक्रिया में विशेषज्ञ समिति का गठन हुआ, समिति की रिपोर्ट के आधार पर ड्राफ्ट तैयार किया गया, लोगों से सुझाव लिए गए, कैबिनेट की मंजूरी के बाद विधानसभा में बिल लाया गया और अंततः राष्ट्रपति की मंजूरी के बाद कानून बना। यानी बिहार में फिलहाल राजनीतिक बयानबाजी शुरू हुई है, लेकिन सरकारी स्तर पर कानून बनाने की पूरी मशीनरी सक्रिय होने का कोई सार्वजनिक संकेत नहीं है।
2. JDU साथ नहीं आई तो क्या बिहार में UCC पास हो जाएगा?
यही सबसे बड़ा सियासी सवाल है। बिहार में किसी राज्य कानून को लागू करने के लिए विधायी प्रक्रिया से गुजरना होगा। मौजूदा आंकड़ों के मुताबिक NDA के पास दोनों सदनों में बहुमत है, लेकिन तस्वीर JDU को हटाकर बदल जाती है।243 सदस्यीय विधानसभा में बहुमत के लिए 122 विधायकों की जरूरत होती है। NDA के पास 202 विधायक हैं। इनमें BJP के 89 और JDU के 85 विधायक हैं। LJP(R) के 19, HAM के 5 और RLM के 4 विधायक हैं। यानी JDU को अलग कर दें तो इन तीन सहयोगी दलों के साथ NDA की संख्या 117 रह जाती है।
यानी विधानसभा में बहुमत के आंकड़े से 5 विधायक कम।विधान परिषद में भी तस्वीर कुछ ऐसी ही है। 75 सदस्यीय सदन में बहुमत के लिए 38 सदस्य चाहिए। NDA के पास 48 MLC हैं। इनमें BJP के 25 और JDU के 20 हैं। बाकी सहयोगी दलों के पास 1-1 सदस्य हैं।यानी आंकड़ों ने भी इस मुद्दे को बेहद दिलचस्प बना दिया है। सवाल यह है कि अगर JDU का साथ नहीं मिला तो क्या BJP और बाकी सहयोगी दल मिलकर रास्ता निकाल पाएंगे?
3. आखिर UCC पर JDU की आपत्ति है क्या?
इस कहानी का सबसे अहम हिस्सा यही है। UCC को लेकर JDU का रुख अचानक सामने नहीं आया है। मुख्यमंत्री रहते हुए नीतीश कुमार ने विधि आयोग के तत्कालीन अध्यक्ष बीएस चौहान को पत्र लिखकर अपनी आपत्ति दर्ज कराई थी।नीतीश कुमार का तर्क था कि विभिन्न धार्मिक समूहों, खासकर अल्पसंख्यकों की सहमति के बिना UCC लागू करने से सामाजिक वैमनस्य पैदा हो सकता है और धार्मिक स्वतंत्रता की संवैधानिक गारंटी को लेकर लोगों का भरोसा प्रभावित हो सकता है।
जुलाई 2016 में मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के प्रतिनिधियों से बातचीत के दौरान भी नीतीश कुमार ने कहा था कि जब तक UCC को लेकर देशभर में आम राय नहीं बनती, तब तक बिहार में इसे लागू नहीं किया जाएगा।यानी आज JDU जो कह रही है, उसकी जड़ें करीब एक दशक पुराने राजनीतिक स्टैंड में हैं।इसीलिए UCC का नाम सामने आते ही JDU का सक्रिय होना सिर्फ आज की राजनीति नहीं, बल्कि उसके पुराने रुख से भी जुड़ा हुआ दिखाई देता है। अब असली सवाल—क्या JDU अपने पुराने स्टैंड पर कायम रहेगी या NDA की राजनीति के बीच कोई बीच का रास्ता निकलेगा?
4. JDU के अलावा NDA के बाकी सहयोगी क्या कह रहे हैं?
अभी तस्वीर पूरी तरह साफ नहीं है। लेकिन सहयोगी दलों के बयान भी अपने-अपने अंदाज में सामने आ चुके हैं। RLM प्रमुख उपेंद्र कुशवाहा ने कहा कि केंद्र का प्रस्ताव सामने आने के बाद उनकी पार्टी अपना पक्ष रखेगी। यानी फिलहाल गेंद ड्राफ्ट के पाले में है। हिन्दुस्तानी अवाम मोर्चा के राष्ट्रीय अध्यक्ष संतोष मांझी ने UCC को लेकर अपेक्षाकृत सकारात्मक रुख दिखाया। उन्होंने कहा कि अमित शाह बोले हैं तो अच्छी बात होगी और विचार-विमर्श के बाद इसे लागू किया जा सकता है। वहीं LJP(R) अध्यक्ष चिराग पासवान ने कहा कि भारत का सामाजिक ताना-बाना अलग-अलग है। ड्राफ्ट सार्वजनिक होना चाहिए और सभी के हितों का ध्यान रखा जाना चाहिए। इसके बाद उनकी पार्टी अपना मत रखेगी। यानी NDA के अंदर फिलहाल तीन तरह के सुर सुनाई दे रहे हैं—JDU की सावधानी, HAM का सकारात्मक संकेत और RLM-LJP(R) का ड्राफ्ट देखने के बाद फैसला।
5. अब तक की कहानी में सबसे बड़ा ट्विस्ट क्या है?
पूरी कहानी को एक लाइन में समझें तो मामला अमित शाह के बयान से शुरू हुआ और नीतीश कुमार-ललन सिंह की बैठक तक पहुंच गया।पहले अमित शाह ने 2029 से पहले NDA शासित राज्यों में UCC लागू करने का लक्ष्य बताया।फिर बिहार में JDU नेता श्याम रजक ने कहा—“बिहार में लागू नहीं होने देंगे।”इसके बाद संजय झा ने कहा—पहले ड्राफ्ट देखेंगे और फिर गृह मंत्री से बात करेंगे।मंगलवार को नीतीश कुमार और ललन सिंह के बीच दो दौर की बैठक हुई।
बैठक के बाद विजय चौधरी ने कहा—पहले बिल देखेंगे, अध्ययन करेंगे, पार्टी में चर्चा होगी और फिर फैसला होगा।और BJP की ओर से फिलहाल इस पूरे विवाद पर अपेक्षाकृत खामोशी दिखाई दे रही है।यहीं से बिहार की राजनीति का सबसे बड़ा सवाल निकलता है—क्या UCC बिहार में कानून का मुद्दा बनने से पहले NDA के अंदर सहमति की परीक्षा बन गया है?क्योंकि आंकड़े बताते हैं कि विधानसभा में JDU के बिना NDA बहुमत के आंकड़े से पीछे चला जाता है। वहीं JDU का पुराना राजनीतिक स्टैंड UCC के मुद्दे पर उसे सीधे समर्थन देने से रोकता दिखाई देता है।
लेकिन कहानी अभी खत्म नहीं हुई है।असली परीक्षा तब होगी, जब UCC का ड्राफ्ट सामने आएगा।तब पता चलेगा कि JDU की आपत्ति सिर्फ प्रक्रिया और प्रावधानों को लेकर है या पार्टी किसी भी रूप में इसे बिहार में लागू करने के खिलाफ खड़ी होती है।फिलहाल बिहार की सियासत में एक सवाल सबसे ज्यादा गूंज रहा है—अमित शाह का UCC वाला बयान क्या सिर्फ कानून की शुरुआत है, या बिहार में NDA के भीतर नए सियासी समीकरणों की भी शुरुआत?





