PATNA : बिहार सरकार के खजाने में पैसा आता कहां से है और आखिर जाता कहां है? आम आदमी के लिए यह सवाल अक्सर बजट पेश होने के समय ही सामने आता है। लेकिन सरकार के स्तर पर कमाई और खर्च का यह हिसाब पूरे साल बेहद बारीकी से तैयार किया जाता है। सरकार की आय को अलग-अलग मदों में दर्ज किया जाता है और खर्च के लिए भी पहले से तय श्रेणियां होती हैं। वित्तीय वर्ष 2027-28 के बजट निर्माण से जुड़े दस्तावेज में सरकारी खर्च का ऐसा ही विस्तृत खाका सामने आया है।
इस व्यवस्था को समझें तो तस्वीर काफी दिलचस्प है। सरकार की प्राप्तियों के लिए 44 मद और खर्च के लिए 70 अलग-अलग मद निर्धारित किए गए हैं। यानी सरकारी खजाने में पैसा आने से लेकर उसके अलग-अलग कामों में खर्च होने तक पूरा लेखा-जोखा एक निर्धारित ढांचे के तहत चलता है।
सरकार का पैसा सिर्फ सड़क और भवन पर नहीं होता खर्च
अक्सर बजट की चर्चा होते ही सड़क, पुल, भवन, अस्पताल और स्कूल जैसे बड़े निर्माण कार्यों की तस्वीर सामने आती है। लेकिन सरकारी खर्च की सूची बताती है कि सरकारी मशीनरी को चलाने में भी बड़ी रकम खर्च होती है। बजट प्राक्कलन में वेतन सबसे प्रमुख मदों में शामिल है। इसके साथ विशेष वेतन, जीवनयापन भत्ता, मकान किराया भत्ता, परिवहन भत्ता, चिकित्सा भत्ता और अन्य भत्तों के लिए अलग-अलग प्रावधान किया जाता है। त्योहार अग्रिम जैसी मद भी इसमें शामिल है। सरकारी कर्मचारियों से जुड़े खर्च यहीं खत्म नहीं होते। मजदूरी, पेंशन, पारिवारिक पेंशन, उपादान, रूपांतरित मूल्य और छुट्टी नकदीकरण जैसे भुगतान भी बजट में अलग-अलग मदों के तहत दर्ज होते हैं। यानी सरकार के खजाने से निकलने वाला पैसा सिर्फ विकास योजनाओं में नहीं, बल्कि सरकारी व्यवस्था को लगातार चलाने में भी इस्तेमाल होता है।
दफ्तर चलाने में भी कई मदों में बंटता है खर्च
सरकारी कार्यालयों को चलाने के लिए होने वाले खर्च की सूची भी काफी लंबी है। कार्यालय व्यय, वाहनों के ईंधन और रखरखाव, दूरभाष, बिजली, विधि संबंधी खर्च, वर्दी-पोशाक और स्थापना व्यय के लिए अलग-अलग मद निर्धारित हैं।इसके अलावा बिजली प्रभारी, डीजल-पेट्रोल संबंधी खर्च, स्थलान व्यय, कमीशन और कार्यालय के लिए आवश्यक अन्य खर्च भी बजट में दर्ज किए जाते हैं।सरकारी कामकाज में यात्रा भी एक अहम हिस्सा है। इसलिए यात्रा व्यय के लिए अलग मद रखी गई है। वहीं किराया, रॉयल्टी तथा प्रकाशन और मुद्रण पर होने वाले खर्च को भी अलग से दर्ज किया जाता है।
सम्मेलन से लेकर दवा और राशन तक का हिसाब
सरकारी विभागों की बैठक, सम्मेलन, कार्यशाला और सेमिनार पर होने वाला खर्च भी बजट के दायरे में आता है। प्रशिक्षण व्यय के लिए भी अलग प्रावधान है।सामग्री और आपूर्ति के तहत सामग्री एवं पूर्तियां, दवा भंडार और आहार-पथ्य जैसी मदें शामिल हैं। यानी सरकारी अस्पतालों या संस्थानों में दवाओं और जरूरी सामग्री की खरीद भी इसी वित्तीय व्यवस्था के तहत दर्ज होती है। पुलिस और सुरक्षा से जुड़े खर्च के लिए शस्त्र और गोला-बारूद की अलग मद है। वहीं राशन की लागत और पीओएल यानी पेट्रोलियम, ऑयल एवं लुब्रिकेंट से संबंधित खर्च को भी अलग श्रेणी में रखा गया है।
विज्ञापन से लेकर मरम्मत और कंसल्टेंसी तक
सरकारी योजनाओं और विभागीय गतिविधियों की जानकारी जनता तक पहुंचाने के लिए होने वाले विज्ञापन और प्रकाशन का खर्च भी अलग मद में दर्ज किया जाता है। छोटे निर्माण या दूसरे जरूरी कार्यों के लिए 'लघु कार्य' की मद है। इसके साथ अनुरक्षण एवं मरम्मत का प्रावधान है। जरूरत के अनुसार संविदा सेवाएं, कंसल्टेंसी, व्यावसायिक/कला/तकनीकी सेवाएं और परीक्षा संबंधी व्यय भी बजट में अलग-अलग दर्ज किए जाते हैं। इससे साफ है कि सरकारी बजट में खर्च का कोई एक बड़ा डिब्बा नहीं होता। पैसा जिस काम के लिए खर्च होना है, उसे संबंधित मद में दर्ज करने की व्यवस्था है।
छात्रवृत्ति, सब्सिडी और राहत का भी अलग हिसाब
सरकार की ओर से जनता और विभिन्न संस्थाओं को दी जाने वाली आर्थिक सहायता भी बजट का बड़ा हिस्सा होती है। सहायता अनुदान, अंशदान, सब्सिडी, छात्रवृत्ति/वजीफा और प्रोत्साहन जैसी मदों को अलग-अलग रखा गया है। राहत के लिए नगद या वस्तु के रूप में किए जाने वाले खर्च का भी प्रावधान है। विवेकानुदान और अनुग्रह अनुदान जैसी मदें भी सूची में शामिल हैं।
बड़े निर्माण और निवेश पर भी नजर
सरकार के विकास कार्यों में सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा पूंजीगत खर्च का होता है। दस्तावेज में मुख्य निर्माण कार्य और भू-अर्जन के लिए अलग मद दिखाई गई है। निवेश, ऋण एवं अग्रिम, ऋण की वापसी और अन्य पूंजीगत व्यय का भी अलग हिसाब रखा जाता है। इसके अलावा आरक्षित निधियां, अंतःलेखा अंतरण, बढ़ता खाता/हानियां, मूल्यह्रास और व्यय में कमी जैसी वित्तीय मदें भी बजट व्यवस्था का हिस्सा हैं।
आखिर 44 मदों से पैसा आता कैसे है?
अब सवाल सरकार की कमाई का है। सरकार के पास आने वाली रकम को भी अलग-अलग स्रोतों और मदों में दर्ज किया जाता है। उपलब्ध बजट प्रक्रिया के अनुसार प्राप्तियों का अनुमान तैयार करते समय विभागों को वास्तविक प्राप्तियों, पिछले आंकड़ों और आगामी वित्तीय वर्ष की संभावनाओं को ध्यान में रखना होता है। यानी सरकार पहले यह अनुमान लगाती है कि उसके पास कितने संसाधन उपलब्ध होंगे। इसके बाद विभिन्न विभागों और योजनाओं के लिए खर्च का अनुमान तैयार किया जाता है। कमाई और खर्च के बीच संतुलन ही बजट की असली बुनियाद है।
हर बढ़े या घटे खर्च का देना पड़ता है जवाब
2027-28 के बजट निर्माण के लिए तैयार जांच-पत्र में नियंत्रक पदाधिकारियों से कई सवाल पूछे गए हैं। इनमें यह देखना शामिल है कि आय-व्ययक प्राक्कलन सही तरीके से भरा गया है या नहीं, किसी मद में वृद्धि या कमी का कारण स्पष्ट किया गया है या नहीं और जहां जरूरी है, वहां संबंधित सरकारी आदेश का उल्लेख किया गया है या नहीं। यानी विभाग अपनी मर्जी से सिर्फ कोई आंकड़ा जोड़कर बजट नहीं बना सकता। खर्च के पीछे आधार और आवश्यकता बतानी होती है।
कुल मिलाकर बिहार सरकार का बजट एक बड़ी तिजोरी का हिसाब है, लेकिन उस तिजोरी से निकलने वाले पैसे की हर दिशा तय है। 44 मदों में सरकार की प्राप्तियों का हिसाब और 70 मदों में खर्च का ब्योरा—यही व्यवस्था बताती है कि सरकारी पैसा कहां से आता है और किस रास्ते से जनता, योजनाओं और सरकारी व्यवस्था तक पहुंचता है।





