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एम्बुलेंस नहीं, ठेला बना सहारा! आरा में घायल युवक तड़पता रहा, स्वास्थ्य व्यवस्था के दावों की खुली पोल

Bihar News: एक सड़क हादसा, तड़पता हुआ घायल युवक और मदद के लिए बार-बार लगाई गई कॉल… लेकिन जब एम्बुलेंस नहीं पहुंची, तो जो हुआ उसने सिस्टम की सच्चाई सामने ला दी। आखिर उस घायल को अस्पताल तक कैसे पहुंचाया गया?

एम्बुलेंस नहीं, ठेला बना सहारा! आरा में घायल युवक तड़पता रहा, स्वास्थ्य व्यवस्था के दावों की खुली पोल
Ramakant kumar
3 मिनट

Bihar News: बिहार में बेहतर स्वास्थ्य सुविधाओं और त्वरित एम्बुलेंस सेवा के बड़े-बड़े दावे अक्सर सरकारी रिपोर्टों और भाषणों में सुनने को मिलते हैं, लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही कहानी बयां करती है। आरा से सामने आई एक दर्दनाक घटना ने न सिर्फ स्वास्थ्य विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं, बल्कि यह भी दिखा दिया है कि संकट की घड़ी में आम आदमी आज भी व्यवस्था नहीं, बल्कि इंसानियत के भरोसे है।


घटना आरा शहर के नवादा थाना क्षेत्र स्थित धोबी घटवा मोड़ की है, जहां शुक्रवार को एक सड़क हादसे में अरवल जिले के बलिदाद निवासी युवक राकेश कुमार गंभीर रूप से घायल हो गए। टक्कर इतनी जबरदस्त थी कि युवक सड़क किनारे गिरकर दर्द से तड़पता रहा। आसपास मौजूद लोगों ने तुरंत मानवता दिखाते हुए उसकी मदद करनी चाही, लेकिन जब उन्होंने व्यवस्था का सहारा लेने की कोशिश की, तो निराशा ही हाथ लगी।


स्थानीय लोगों ने सबसे पहले एम्बुलेंस सेवा 102 पर कॉल किया। उम्मीद थी कि कुछ ही मिनटों में मदद पहुंच जाएगी, लेकिन 20 मिनट से ज्यादा समय बीत जाने के बाद भी कोई एम्बुलेंस मौके पर नहीं पहुंची। स्थिति बिगड़ती देख लोगों ने डायल 112 पर भी संपर्क किया, लेकिन वहां से भी कोई राहत नहीं मिली। हर गुजरते मिनट के साथ घायल युवक की हालत और गंभीर होती जा रही थी, लेकिन जिम्मेदार सिस्टम पूरी तरह से गायब नजर आया।


यह वही एम्बुलेंस सेवाएं हैं, जिनके बारे में दावा किया जाता है कि वे हर आपात स्थिति में तुरंत उपलब्ध होती हैं। लेकिन इस घटना ने इन दावों की सच्चाई उजागर कर दी। सवाल उठता है कि जब सबसे ज्यादा जरूरत होती है, तब ये सेवाएं आखिर कहां गायब हो जाती हैं?


जब सरकारी तंत्र पूरी तरह विफल साबित हुआ, तब आम लोगों ने इंसानियत का परिचय दिया। आसपास के लोगों ने मिलकर एक ठेला मंगवाया और उसी पर घायल युवक को लिटाकर शहरी प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र तक पहुंचाया। यह दृश्य किसी फिल्मी कहानी जैसा जरूर लग सकता है, लेकिन यह उस सच्चाई का आईना है, जिसमें आज भी गरीब और आम लोग बुनियादी सुविधाओं के लिए जूझ रहे हैं।


सोचने वाली बात यह है कि अगर उस समय स्थानीय लोग मौजूद नहीं होते, तो शायद युवक की जान भी जा सकती थी। क्या यही है वह स्वास्थ्य व्यवस्था, जिस पर करोड़ों रुपये खर्च किए जाते हैं? क्या यही है “बेहतर बिहार” का सपना?


यह घटना सिर्फ एक हादसा नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम की विफलता का जीता-जागता उदाहरण है। एक तरफ सरकार स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत बनाने के दावे करती है, वहीं दूसरी तरफ जमीन पर हालात इतने बदतर हैं कि एक घायल को अस्पताल पहुंचाने के लिए ठेले का सहारा लेना पड़ता है।

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