पटना : बिहार की राजनीति में कई बार चुनाव सिर्फ वोटों की गिनती नहीं होते, बल्कि वे पार्टी के भीतर चल रही ताकत की परीक्षा भी बन जाते हैं। पटना स्नातक निर्वाचन क्षेत्र का चुनाव भी कुछ ऐसा ही चुनाव बन गया है। मतदान खत्म हो चुका है, नतीजा 27 अक्टूबर को आएगा, लेकिन असली सियासी कहानी शायद उसके बाद शुरू होगी।
इस कहानी के केंद्र में हैं मोकामा के जदयू विधायक अनंत सिंह। सामने हैं उनकी अपनी ही पार्टी के उम्मीदवार नीरज कुमार। बीच में हैं जन सुराज के प्रत्याशी अनुज सिंह। और इस पूरी पटकथा में सबसे अहम किरदारों में से एक नाम आता है ललन सिंह का।मामला यहां तक पहुंच गया है कि जिस नेता को अनंत सिंह को मनाने के लिए भेजा गया था, मतदान के दिन उसी ललन सिंह के बारे में पूछे जाने पर अनंत सिंह ने कह दिया- “बिहार में एक-दो नहीं, 100 ललन सिंह हैं। हम नहीं जानते।” सियासत में शब्द कभी-कभी सिर्फ शब्द नहीं होते। वे संदेश होते हैं। और अनंत सिंह का यह संदेश भी काफी दूर तक गया है।
कहानी की शुरुआत नीरज कुमार से हुई, लेकिन अब मामला उससे आगे निकल चुका है
पूरे विवाद को समझने के लिए थोड़ा पीछे जाना होगा। पटना स्नातक सीट पर जदयू ने अपने मौजूदा विधान पार्षद नीरज कुमार को फिर मैदान में उतारा। सामान्य चुनाव होता तो पार्टी के तमाम नेता और कार्यकर्ता उम्मीदवार के साथ खड़े नजर आते। लेकिन यहां कहानी में ट्विस्ट तब आया, जब मोकामा विधायक अनंत सिंह ने ही नीरज कुमार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया। अनंत सिंह ने नीरज कुमार के खिलाफ अपनी पुरानी नाराजगी का हवाला दिया। उनका आरोप रहा कि मोकामा विधानसभा चुनाव के दौरान नीरज कुमार ने उनके खिलाफ प्रचार किया था। अनंत सिंह का कहना था कि उस समय उन्होंने पार्टी नेतृत्व से शिकायत भी की थी, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई। इसके बाद समय बदला और अब वही नीरज कुमार जदयू के उम्मीदवार बनकर पटना स्नातक सीट से मैदान में थे। अनंत सिंह ने इस बार शिकायत करने के बजाय सीधे मैदान बदल दिया।1 अक्टूबर को वह जन सुराज के उम्मीदवार अनुज सिंह के नामांकन में पहुंच गए और साफ कर दिया कि उनका समर्थन नीरज कुमार को नहीं, बल्कि अनुज सिंह को है। यहीं से जदयू के लिए कहानी दिलचस्प से गंभीर हो गई।
फिर एंट्री हुई 'मनाने वाले' ललन सिंह की
जदयू के सामने मुश्किल यह थी कि विरोधी दल का कोई नेता पार्टी उम्मीदवार के खिलाफ नहीं खड़ा था, बल्कि पार्टी का अपना विधायक ही उसके खिलाफ खड़ा था। ऐसे में मामला संभालने की जिम्मेदारी शीर्ष नेतृत्व ने ली। नीतीश कुमार सक्रिय हुए। केंद्रीय मंत्री और जदयू के वरिष्ठ नेता ललन सिंह को अनंत सिंह से बातचीत के लिए आगे किया गया। दोनों के बीच बातचीत हुई। कुछ ऐसा माहौल बनाया गया कि शायद अब विवाद ठंडा पड़ जाएगा। लेकिन राजनीति में समझौता और समाधान दो अलग चीजें होते हैं। बातचीत के बाद ऐसा समझौता सामने आया कि अनंत सिंह नीरज कुमार के खिलाफ खुलकर बयानबाजी नहीं करेंगे। लेकिन वह अनुज सिंह के समर्थन से पीछे भी नहीं हटेंगे। यानी बाहर से खामोशी, भीतर से समर्थन। कहानी कुछ समय के लिए शांत जरूर हुई, लेकिन पटकथा खत्म नहीं हुई थी।
9 अक्टूबर की बैठक और फिर खुली चुनौती
इसके बाद 9 अक्टूबर को मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी की पहल पर एनडीए विधायकों की बैठक हुई। गठबंधन उम्मीदवारों के खिलाफ काम करने वालों को कार्रवाई की चेतावनी दी गई। राजनीतिक संदेश साफ था- पार्टी लाइन के खिलाफ जाने की कीमत चुकानी पड़ सकती है। लेकिन अनंत सिंह के तेवर नहीं बदले। 18 अक्टूबर को उन्होंने मंच से फिर चुनौती वाले अंदाज में बयान दिया कि कोई भी अपनी जमानत नहीं बचा पाएगा। यह सिर्फ चुनावी बयान नहीं था। इसे जदयू के लिए खुली राजनीतिक चुनौती के तौर पर भी देखा गया। अब तक कहानी में नीरज कुमार बनाम अनंत सिंह था। लेकिन धीरे-धीरे इसमें जदयू का नेतृत्व, पार्टी अनुशासन और अंदरूनी पावर गेम भी जुड़ता चला गया।
23 अक्टूबर: मतदान का दिन और कहानी का सबसे बड़ा ट्विस्ट
फिर आया 23 अक्टूबर। पटना स्नातक सीट के लिए मतदान हो रहा था। एक तरफ बूथों पर वोट पड़ रहे थे, दूसरी तरफ मोकामा में अनंत सिंह और नीरज कुमार समर्थकों के बीच विवाद की खबर सामने आई। प्रखंड कार्यालय के बाहर धक्का-मुक्की की स्थिति बनी और पुलिस ने कई लोगों को हिरासत में लिया। लेकिन असली राजनीतिक धमाका इसके बाद हुआ। मीडिया ने अनंत सिंह से ललन सिंह को लेकर सवाल किया। यह वही ललन सिंह थे, जिन्हें कुछ दिन पहले उन्हें मनाने के लिए भेजा गया था। लेकिन जवाब ऐसा आया जिसने पूरी कहानी को फिर सुर्खियों में ला दिया। अनंत सिंह ने कहा कि बिहार में बहुत सारे ललन सिंह हैं और दिल्ली वाले ललन सिंह को वह नहीं जानते। अब इस बयान को सिर्फ तंज मानें या राजनीतिक संदेश? यही सबसे बड़ा सवाल है। क्योंकि जिस व्यक्ति को पार्टी का भरोसेमंद मध्यस्थ बनाकर भेजा गया था, उसके प्रति सार्वजनिक रूप से इतनी तल्खी यह संकेत देती है कि अंदरखाने बातचीत से कोई स्थायी समाधान नहीं निकला।
लेकिन असली सवाल- अनंत सिंह नाराज किससे हैं?
ऊपर से देखें तो लड़ाई नीरज कुमार से है। लेकिन राजनीतिक समीकरणों को थोड़ा गहराई से देखें तो कहानी में और किरदार दिखाई देते हैं। अनंत सिंह खेमे की नाराजगी सिर्फ नीरज कुमार तक सीमित नहीं मानी जा रही। नीरज कुमार को टिकट मिलने में जदयू के राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष संजय झा की भूमिका को लेकर भी सवाल उठते रहे हैं। दूसरी तरफ नीतीश कुमार के बेटे और बिहार सरकार में मंत्री निशांत कुमार भी नीरज कुमार के समर्थन में चुनाव प्रचार करते दिखाई दिए। जब अनंत सिंह से निशांत की सक्रियता को लेकर सवाल किया गया तो उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि वह पार्टी के मालिक हैं, कहीं भी जा सकते हैं। इस एक बयान ने विवाद का दायरा और बड़ा कर दिया। अब सवाल सिर्फ यह नहीं रह गया कि अनंत सिंह नीरज कुमार के खिलाफ क्यों हैं? सवाल यह बन गया है कि क्या जदयू के भीतर पुराने और नए पावर सेंटर के बीच कोई खींचतान आकार ले रही है?
'मैं चाहता हूं पार्टी मुझ पर कार्रवाई करे'—इस लाइन में छिपा है बड़ा संदेश
इस पूरी कहानी की सबसे दिलचस्प बात अनंत सिंह का एक और बयान है। उन्होंने कहा कि वह चाहते हैं कि पार्टी उनके खिलाफ कार्रवाई करे। साथ ही उनका अंदाज रहा- “न मरने का गम, न जीने की खुशी।” राजनीतिक भाषा में यह सामान्य बयान नहीं है। जब कोई नेता खुद अपनी पार्टी से कार्रवाई की मांग करे तो उसके दो मतलब हो सकते हैं। पहला- वह पार्टी नेतृत्व पर दबाव बना रहा है। दूसरा- वह पहले से ही यह मानसिक तैयारी कर चुका है कि अगर पार्टी कार्रवाई करती है तो उसके पास अगला राजनीतिक रास्ता मौजूद है। और यहीं से कहानी में जन सुराज की एंट्री महत्वपूर्ण हो जाती है।
क्या जन सुराज बन सकता है अगला ठिकाना?
अनंत सिंह ने जन सुराज के उम्मीदवार अनुज सिंह को खुले तौर पर समर्थन दिया है। जन सुराज की तरफ से भी उन्हें राजनीतिक मंच मिला है। ऐसे में अगर जदयू अनंत सिंह के खिलाफ कड़ा एक्शन लेती है तो उनके सामने राजनीतिक विकल्प के तौर पर जन सुराज का रास्ता खुला हुआ है। हालांकि फिलहाल अनंत सिंह खुद को जदयू का विधायक बताते रहे हैं। इसलिए अभी यह कहना जल्दबाजी होगी कि वह पार्टी छोड़ने जा रहे हैं। लेकिन राजनीति में दरवाजे अक्सर बाहर से नहीं, परिस्थितियों से खुलते हैं। अगर जदयू कार्रवाई करती है, तो जन सुराज का रास्ता मजबूत हो सकता है। अगर कार्रवाई नहीं करती, तो पार्टी अनुशासन पर सवाल खड़े होंगे। यानी दोनों रास्तों में जदयू के सामने चुनौती है।
नीरज जीते तो भी मुश्किल, हारे तो भी सवाल!
अब पूरी निगाह 27 अक्टूबर के नतीजे पर है। अगर नीरज कुमार जीतते हैं तो जदयू यह संदेश देने की कोशिश कर सकती है कि पार्टी का संगठन और आधिकारिक उम्मीदवार किसी एक विधायक की बगावत से कमजोर नहीं हुआ। लेकिन इसके बावजूद अनंत सिंह पर कार्रवाई का सवाल खत्म नहीं होगा। क्योंकि चुनाव परिणाम से अलग पार्टी अनुशासन का प्रश्न अपनी जगह रहेगा। दूसरी तरफ अगर अनुज सिंह मजबूत प्रदर्शन करते हैं या जीत जाते हैं, तो अनंत सिंह की राजनीतिक भूमिका पर चर्चा और तेज होगी। तब सवाल उठेगा कि क्या एक विधायक ने अपनी ही पार्टी के उम्मीदवार के खिलाफ खड़े होकर राजनीतिक ताकत साबित कर दी? और यही स्थिति जदयू के लिए ज्यादा कठिन होगी।
आखिरी सीन अभी बाकी है...
फिलहाल पटना स्नातक चुनाव का मतदान खत्म हो चुका है। मतपेटियां बंद हैं। उम्मीदवारों की किस्मत का फैसला 27 अक्टूबर को होगा। लेकिन अनंत सिंह बनाम नीरज कुमार की कहानी का क्लाइमेक्स शायद उस दिन भी खत्म नहीं होगा। एक तरफ जदयू का अनुशासन है। दूसरी तरफ अनंत सिंह का अपना राजनीतिक प्रभाव। एक तरफ पार्टी का आधिकारिक उम्मीदवार है। दूसरी तरफ जन सुराज के साथ खड़े अनंत सिंह हैं।और बीच में वह सवाल, जो अब बिहार की सियासत में लगातार घूम रहा है- क्या अनंत सिंह और जदयू के बीच सिर्फ नाराजगी चल रही है या अब आर-पार की पटकथा लिखी जा चुकी है? अगर पार्टी कार्रवाई करती है तो अनंत सिंह के अगले कदम पर सबकी नजर होगी।अगर कार्रवाई नहीं करती है तो पार्टी के भीतर अनुशासन और नेतृत्व की ताकत पर सवाल उठेंगे। यानी फिल्म अभी खत्म नहीं हुई है। 23 अक्टूबर को सिर्फ वोट पड़े हैं, असली राजनीतिक फैसला शायद 27 अक्टूबर के बाद शुरू होगा।





