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09-Dec-2025 04:24 PM
By Viveka Nand
Bihar News: किसी भी दल के लिए कार्यकर्ता रीढ़ होते हैं. लोकतंत्र में कार्यकर्ता विहीन दल का कोई अस्तित्व नहीं होता. किसी भी दल का दफ्तर अगर गुलजार है, तो इसमें कार्यकर्ताओं की महती भूमिका होती है. आप कह सकते हैं कि राजनीतिक पार्टी के कार्यालयों के लिए कार्यकर्ता श्रृंगार होते हैं. अब उसी श्रृंगार का मजाक उड़ाया जा रहा है, मजाक ही नहीं बल्कि अपशब्दों का प्रयोग किया जा रहा है. अपशब्द छोटा पड़ जा रहा, गालियां दी जा रही हैं. चुनाव के समय यही कार्यकर्ता भगवान थे, अब लफुआ हो गए। काम निकलते ही कार्यकर्ताओं को भरी मीटिंग में गालियां सुनने को मिल रही हैं. यह कृत्य अगर पार्टी का कप्तान करे तब तो और भी चिंतन वाली बात है. अगर अध्यक्ष ही कार्यकर्ताओं के बारे में यह सोच रखता हो, तब तो भगवान ही मालिक है. यह खबर उस पार्टी की है, जो खुद को सबसे अलग बताती है. चाल चरित्र और चेहरा अन्य दलों से अलग होने का दावा किया जाता है.
अध्यक्ष ने कार्यकर्ताओं के लिए ‘अपशब्दों’ की कर दी बौछार
यह खबर उस दल-कार्यकर्ता और प्रदेश अध्यक्ष की है, जिसका चाल-चरित्र और चेहरा सबसे अलग बताया जाता है. जिस दल में कार्यकर्ता ही आंख-नाक-कान सब कुछ होते हैं. जिस दल में कार्यकर्ताओं का सम्मान सर्वोपरी होता है, उस दल के अंदर की जो खबर है, वो चौंकाने वाली है. शब्द सुनकर हैरान हो जाएँगे. हर कोई आश्चर्य में पड़ जा रहा, आखिर कप्तान इस तरह के शब्दों का प्रयोग कैसे कर सकता है, वो भी अपने कार्यकर्ताओं के लिए ? क्या उनके कार्यकर्ता लफुआ हैं...? क्या उनके कार्यकर्ता रोड छाप हैं ...?
मीटिंग के दौरान अध्यक्ष ने आपा खोया
अब विस्तार से पूरी खबर बताते हैं. खबर किस दल की है, ऊपर में पढ़कर समझ रहे होंगे. दरअसल, चुनाव के बाद सत्ता में लौटने के बाद प्रदेश स्तर पर बैठक हो रही है. बैठक मे अलग-अलग क्षेत्रों से जिलाध्यक्षों व संगठन से जुड़े नेताओं को बुलाकर मंथन किया जा रहा है. बैठक में मगध-शाहाबाद के अलावे अन्य जिलों के नेताओं को बुलाया गया था. इनके साथ प्रदेश नेतृत्व ने मंथन किया. मंथन हर दल के नेता करते हैं, सबसे अलग पार्टी के अध्यक्ष ने भी किया. यहां तक तो सबकुछ ठीक था.
दिन भर 100-150 लफुआ दफ्तर में मंड़राते रहता है-अध्यक्ष
भरी मीटिंग में प्रदेश अध्यक्ष ने जो बातें कहीं वो आम कार्यकर्ताओं के गले के नीचे नहीं उतर रही. मीटिंग के दौरान अध्यक्ष ने कहा कि, '' लफुआ-चू## किस्म के 100-150 लोग छोटा ‘आयरण’ लेकर प्रदेश कार्यालय में दिन भर घूमते रहता है. कुर्ता का क्रीच थोड़ा कमजोर/ टूटा तो फिर छोटा आयरण से टाइट कर लेता है. लफुआ किस्म के लोगों का दिन भर यही काम है. '' अपने प्रदेश अध्यक्ष की जुबान से इस तरह के शब्द सुनकर सामने बैठे नेता-कार्यकर्ता स्तब्ध रह गए. उन्हें समझ में नहीं आ रहा था, कि अध्यक्ष को क्या हो गया है, वे इस तरह की बातें, वो भी अपने कार्यकर्ताओं के लिए क्यों कर रहे ? हालांकि सबसे अलग कार्यकर्ता होने का जो गौरव हासिल है, लोगों ने उसे बरकरार रखते हुए, अपशब्दों का प्रयोग करने वाले अपने अध्यक्ष को जवाब नहीं दिया, लेकिन मीटिंग से भरे मन से बाहर निकले. कहा....अब हम जैसे कार्यकर्ता लफुआ हो गए. पार्टी की सेवा करने का फल यह मिला कि हमलोगों को लफुआ शब्द से नवाजा जा रहा.