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15-Dec-2025 05:18 PM
By First Bihar
Bihar BJP : भाजपा ने खरमास लगने से ठीक पहले संगठनात्मक स्तर पर लगातार तीन बड़े फैसले लेकर साफ कर दिया है कि पार्टी आने वाले चुनावी दौर से पहले अपनी रणनीति और सामाजिक संतुलन को नए सिरे से परिभाषित कर रही है। पहले उत्तर प्रदेश में पंकज चौधरी को प्रदेश अध्यक्ष बनाया गया, फिर बिहार के कद्दावर नेता नितिन नबीन को कार्यकारी राष्ट्रीय अध्यक्ष की जिम्मेदारी सौंपी गई और अब बिहार भाजपा की कमान संजय सरावगी को सौंप दी गई है। इन तीनों फैसलों को अलग-अलग नहीं, बल्कि एक साझा राजनीतिक रणनीति के रूप में देखा जा रहा है।
यूपी में पंकज चौधरी की नियुक्ति को कुर्मी वोट बैंक को साधने की कोशिश के तौर पर देखा गया। कुर्मी समाज यूपी और बिहार दोनों ही राज्यों में राजनीतिक रूप से प्रभावशाली माना जाता है। लेकिन बिहार के संदर्भ में भाजपा का कदम अपेक्षाकृत अलग दिशा की ओर जाता दिख रहा है। यहां पार्टी ने सरकार गठन के दौरान ओबीसी और अति पिछड़ा वर्ग को प्रतिनिधित्व देकर सामाजिक समीकरण साधे थे, जबकि अब संगठन के शीर्ष पदों पर पार्टी ने अपने कोर वोटर माने जाने वाले अगड़ा समाज की ओर फोकस बढ़ाया है।
सबसे अहम फैसला कायस्थ समाज से आने वाले नितिन नबीन को कार्यकारी राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाने का रहा। बिहार में कायस्थ समाज की आबादी एक फीसदी से भी कम मानी जाती है, लेकिन राजनीतिक और बौद्धिक रूप से इस वर्ग की भूमिका हमेशा महत्वपूर्ण रही है। भाजपा का यह कदम अगड़ा समाज के लिए एक बड़ी सौगात के रूप में देखा जा रहा है। इसके बाद मारवाड़ी समुदाय से आने वाले संजय सरावगी को बिहार भाजपा का प्रदेश अध्यक्ष बनाया गया। मारवाड़ी समाज की भी बिहार में आबादी सीमित है, लेकिन दोनों ही वर्ग भाजपा के परंपरागत और भरोसेमंद वोटर माने जाते हैं।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इन नियुक्तियों के जरिए भाजपा उस नैरेटिव की काट करना चाहती है, जिसमें यह आरोप लगाया जाता रहा है कि पिछड़े वर्ग को साधने के लिए पार्टी अपने कोर वोटर कही जाने वाली जातियों को नजरअंदाज कर रही है। संगठन में शीर्ष पदों पर अगड़ा समाज के नेताओं को जगह देकर भाजपा यह संदेश देना चाहती है कि उसकी राजनीति सिर्फ सत्ता संतुलन तक सीमित नहीं है, बल्कि संगठनात्मक सम्मान और भागीदारी भी उतनी ही अहम है।
इसके साथ ही एक बड़ी रणनीति बिहार की जातीय ध्रुवीकरण वाली राजनीति से बचने की भी दिखाई देती है। बिहार में दशकों से यादव, कुर्मी, पासवान, ब्राह्मण, भूमिहार और राजपूत जैसी प्रभावशाली जातियों के इर्द-गिर्द राजनीति होती रही है। अक्सर किसी एक बड़े सामाजिक समूह से नेता बनाए जाने पर दूसरे वर्गों में असंतोष और ध्रुवीकरण की स्थिति बन जाती है। भाजपा ने इस बार ऐसे समुदायों से नेताओं को आगे बढ़ाया है, जिनके नाम पर बड़े पैमाने पर ध्रुवीकरण की राजनीति संभव नहीं है।
नितिन नबीन और संजय सरावगी, दोनों की छवि अपेक्षाकृत मृदुभाषी, संगठनात्मक और सर्वसुलभ नेताओं की रही है। ऐसे नेताओं को आगे लाकर भाजपा यह संकेत भी दे रही है कि पार्टी जाति आधारित आक्रामक राजनीति के बजाय प्रशासनिक दक्षता और संगठनात्मक मजबूती पर जोर देना चाहती है। माना जा रहा है कि नितिन नबीन के जरिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की उस परिकल्पना को आगे बढ़ाया जा रहा है, जिसमें उन्होंने “चार जातियों” — युवा, महिला, किसान और गरीब — की बात कही है।
प्रधानमंत्री मोदी लगातार यह कहते रहे हैं कि उनकी राजनीति जातीय खांचों से ऊपर उठकर इन चार वर्गों के कल्याण पर केंद्रित है। ऐसे में महज 45 वर्ष के युवा नेता नितिन नबीन को राष्ट्रीय स्तर पर बड़ी जिम्मेदारी देना, नई पीढ़ी के नेतृत्व को तैयार करने की दिशा में भी एक कदम माना जा रहा है। पार्टी के भीतर यह संदेश भी गया है कि भविष्य की राजनीति के लिए अभी से नेतृत्व विकसित किया जा रहा है।
बहरहाल , भाजपा के ये तीनों फैसले संगठनात्मक संतुलन, कोर वोटर को साधने और जातीय ध्रुवीकरण से बचने की संयुक्त रणनीति का हिस्सा नजर आते हैं। बिहार जैसे राज्य में, जहां जाति राजनीति हमेशा निर्णायक भूमिका निभाती रही है, वहां इस प्रयोग के क्या नतीजे निकलते हैं, यह आने वाले दिनों में साफ होगा। लेकिन इतना तय है कि इन नियुक्तियों ने बिहार से लेकर दिल्ली तक राजनीतिक चर्चाओं को एक बार फिर गर्म कर दिया है।