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घूंघट में सास-बहुओं का दंगल! यहां 500 साल पुरानी महिला कुश्ती परंपरा आज भी कायम

यह अनोखा महिला दंगल रक्षाबंधन के दूसरे दिन आयोजित किया जाता है। जहां सास-बहुएं घूंघट में कुश्ती लड़ती हैं, इस दौरान पुरुषों की एंट्री नहीं होती है। महिलाएं 500 साल पुरानी परंपरा को आज भी निभाते आ रही है।

उत्तर प्रदेश न्यूज
© सोशल मीडिया
Jitendra Vidyarthi
3 मिनट

UP: उत्तर प्रदेश के हमीरपुर जिले में महिलाओं का एक अनोखा दंगल आज भी सदियों पुरानी परंपरा को जीवित रखे हुए है। यहां गांव की बहुएं, सासें और बुजुर्ग महिलाएं साड़ी और घूंघट में अखाड़े में उतरती हैं और एक-दूसरे को कुश्ती की चुनौती देती हैं।


खास बात यह है कि इस दंगल में पुरुषों की एंट्री पर पूरी तरह रोक रहती है। अखाड़े से लेकर दर्शकों तक हर तरफ सिर्फ महिलाओं की मौजूदगी होती है।


यह अनोखा आयोजन हमीरपुर जिले के लोदीपुर निवादा गांव में रक्षाबंधन के दूसरे दिन वर्षों पुरानी परंपरा के तहत आयोजित किया जाता है। इस दौरान गांव की महिलाएं पूरे उत्साह के साथ अखाड़े में उतरती हैं और कुश्ती के दांव-पेंच दिखाती हैं। साड़ी और घूंघट में महिलाओं को कुश्ती करते देखना अपने आप में बेहद खास नजारा होता है।


हर साल होता है महिलाओं का दंगल

आयोजकों के अनुसार, इस साल भी महिला दंगल में 20 से अधिक कुश्तियां कराई गईं। बड़ी संख्या में महिलाओं ने इसमें हिस्सा लिया। मुकाबले में जीत हासिल करने वाली महिला पहलवानों को सम्मानित भी किया गया।


इस दंगल की सबसे खास बात यह है कि आयोजन की पूरी व्यवस्था महिलाएं ही संभालती हैं। महिला पहलवानों के अलावा रेफरी भी महिलाएं होती हैं और अखाड़े के आसपास मौजूद दर्शकों में भी सिर्फ महिलाएं शामिल रहती हैं। ढोल बजाने से लेकर आयोजन की अन्य जिम्मेदारियां भी महिलाएं ही संभालती हैं।


अंग्रेजी हुकूमत से जुड़ी है परंपरा की कहानी

गांव की स्थानीय मान्यता के अनुसार, इस महिला दंगल की परंपरा करीब 500 साल पुरानी है। बताया जाता है कि अंग्रेजी हुकूमत के दौर में गांव के पुरुष अत्याचारों से बचने के लिए कई बार गांव से बाहर चले जाते थे। ऐसे समय में महिलाओं ने अपनी और परिवार की सुरक्षा के लिए आत्मरक्षा के तरीके और कुश्ती के दांव-पेंच सीखना शुरू किया।


धीरे-धीरे महिलाओं की यह कुश्ती एक परंपरा में बदल गई और पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ती चली गई। हालांकि, इस परंपरा से जुड़े ऐतिहासिक दावों का आधार स्थानीय मान्यताएं हैं।


घूंघट में दिखाती हैं कुश्ती के दांव-पेंच

आज भी लोदीपुर निवादा गांव की महिलाएं इस परंपरा को पूरे उत्साह के साथ निभाती हैं। रक्षाबंधन के दूसरे दिन आयोजित होने वाला यह महिला दंगल अब गांव की सांस्कृतिक पहचान बन चुका है।


घूंघट में अखाड़े में उतरकर दमखम दिखाती बहुएं, सासें और बुजुर्ग महिलाएं इस आयोजन को खास बना देती हैं। अखाड़े में जोर आजमाइश, कुश्ती के दांव-पेंच और चारों ओर महिलाओं का उत्साह इस अनोखे दंगल की सबसे बड़ी पहचान है। करीब पांच सदियों से चली आ रही यह परंपरा आज भी महिलाओं की अगली पीढ़ी तक पहुंच रही है।

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