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बिहार में यह क्या हो रहा है? हर साल गायब हो रहे हजारों बच्चे, कहीं यह तो नहीं है वजह!

Bihar Police: बिहार में बच्चों की गुमशुदगी के मामले हर साल बढ़ रहे हैं। 2025 में दर्ज 14,699 मामलों में से लगभग आधे बच्चे अब भी लापता हैं, जो राज्य में मानव तस्करी और अपहरण के खतरनाक नेटवर्क का संकेत देते हैं।

बिहार में यह क्या हो रहा है? हर साल गायब हो रहे हजारों बच्चे, कहीं यह तो नहीं है वजह!
Tejpratap
Tejpratap
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Bihar Police: बिहार से एक बेहद चिंता पैदा करने वाली खबर सामने आई है। राज्य में बच्चों की गुमशुदगी की घटनाएं लगातार बढ़ रही हैं और हर साल लगभग 12 से 14 हजार मामले दर्ज होते हैं। लेकिन इनमें से केवल आधे ही बच्चे बरामद हो पाते हैं। शेष हजारों बच्चे किसी न किसी रहस्यमय तरीके से गायब हो जाते हैं, जिससे पुलिस और समाज दोनों ही चिंतित हैं। विशेषज्ञों और पुलिस के अनुमान के मुताबिक यह खतरा न केवल बच्चों की सुरक्षा को प्रभावित कर रहा है, बल्कि मानव तस्करी जैसे जघन्य अपराधों के बढ़ते नेटवर्क को भी संकेत दे रहा है।


आंकड़ों पर नजर डालें तो यह स्थिति और भी गंभीर नजर आती है। केवल 2025 में बिहार में बच्चों की गुमशुदगी के 14,699 मामले दर्ज हुए थे। इनमें से 6,927 बच्चों की बरामदगी नहीं हो सकी। यानी सालाना औसतन 3,000 से 4,000 बच्चे ऐसे हैं, जिनका कोई पता नहीं चलता। पुलिस सूत्रों के अनुसार इन बच्चों को अक्सर मानव तस्करी के जाल में फंसाकर जबरन भिक्षावृत्ति, बाल श्रम, वेश्यावृत्ति और अन्य अनैतिक गतिविधियों में धकेला जा रहा है।


पुलिस को क्यों है चिंता

पुलिस अधिकारियों का कहना है कि 2013 के बाद से गुमशुदगी के मामलों में चार गुना वृद्धि हुई है। 2013 से पहले राज्य में सालाना औसतन तीन हजार गुमशुदगी के मामले दर्ज होते थे, जबकि अब यह आंकड़ा 14 हजार तक बढ़ गया है। इसी अवधि में लापता बच्चों की संख्या भी तेजी से बढ़ी है। इसके पीछे के प्रमुख कारणों में बच्चों के अपहरण और मानव तस्करी का बढ़ता नेटवर्क शामिल है।


बिहार पुलिस ने इस गंभीर समस्या को देखते हुए 2013 में नियम बनाया कि किसी भी गुमशुदगी के मामले में 24 घंटे के भीतर जांच शुरू करना और अपहरण की प्राथमिकी दर्ज करना अनिवार्य होगा। इसके साथ ही राज्यभर में मानव तस्करी विरोधी इकाइयों की स्थापना और विशेष कार्रवाई शुरू की गई।


नूनी और प्रशासनिक उपाय

बिहार पुलिस ने पूरे राज्य में प्रभावी कार्रवाई सुनिश्चित करने के लिए कई कदम उठाए हैं। प्रत्येक जिले में एंटी ह्यूमन ट्रैफिकिंग यूनिट (AHTU) और विशेष किशोर पुलिस इकाई (SJPUs) स्थापित की गई हैं। इसके अलावा पुलिस थानों में कल्याण अधिकारी और बच्चों की सुरक्षा के लिए समर्पित टीमों को नियुक्त किया गया है।


रेलवे स्टेशनों और हवाई अड्डों पर भी एंटी ह्यूमन ट्रैफिकिंग यूनिट तैनात की गई हैं। प्रमुख हवाई अड्डों जैसे पटना, गया और दरभंगा में विशेष टीम कार्यरत हैं और जल्द ही पूर्णिया हवाई अड्डे पर भी इकाई स्थापित करने की योजना है। इन इकाइयों का मुख्य उद्देश्य बच्चों के अपहरण और तस्करी के मामलों को रोकना और लापता बच्चों का तुरंत पता लगाना है।


राज्य के 1,196 पुलिस थानों को राष्ट्रीय मिशन ‘वात्सल्य’ पोर्टल से जोड़ा गया है। इस पोर्टल पर लापता बच्चों के लिए एम-फॉर्म और बरामद बच्चों के लिए आर-फॉर्म का उपयोग किया जाता है। इससे पुलिस को वास्तविक समय में जानकारी मिलती है और खोज प्रक्रिया तेज होती है।


राष्ट्रीय आंकड़े और स्थिति

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) के ताजे आंकड़ों के अनुसार, 2023 में बिहार मानव तस्करी के मामले में तेलंगाना, महाराष्ट्र और ओडिशा के बाद चौथे नंबर पर था। नाबालिग लड़कों की तस्करी में बिहार ओडिशा के बाद दूसरे नंबर पर है, जबकि नाबालिग लड़कियों की तस्करी में भी राज्य की स्थिति चिंताजनक बनी हुई है।


समाज और जागरूकता

पुलिस लगातार लोगों को बच्चों की सुरक्षा और मानव तस्करी के खतरे के प्रति जागरूक कर रही है। हालांकि, सोशल मीडिया और अफवाहों की वजह से कई बार लोग भ्रमित हो जाते हैं। पुलिस का कहना है कि किसी भी लापता बच्चे के मामले में तुरंत सूचना दें और अफवाहों पर ध्यान न दें।