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शव तक के लिए नहीं मिली व्यवस्था! सीतामढ़ी सदर अस्पताल में लापरवाही की हद पार, ठेले पर ले जाया गया शव

Bihar News: अस्पताल के अंदर एक परिवार मदद की गुहार लगाता रहा, लेकिन जवाब में सिर्फ खामोशी मिली… और फिर जो दृश्य सामने आया, उसने पूरे सिस्टम पर सवाल खड़े कर दिए। आखिर क्यों एक शव को ठेले पर ले जाना पड़ा?

शव तक के लिए नहीं मिली व्यवस्था! सीतामढ़ी सदर अस्पताल में लापरवाही की हद पार, ठेले पर ले जाया गया शव
Ramakant kumar
3 मिनट

Bihar News: बिहार के सीतामढ़ी से सामने आई एक तस्वीर ने सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था की हकीकत को एक बार फिर बेनकाब कर दिया है। जहां एक ओर सरकार बेहतर इलाज और सुविधाओं के बड़े-बड़े दावे करती है, वहीं दूसरी ओर जमीनी सच्चाई इतनी दर्दनाक है कि मृतक के परिजनों को शव तक ले जाने के लिए ठेले का सहारा लेना पड़ा।


यह मामला सीतामढ़ी जिले के डुमरा प्रखंड स्थित चक्का रसलपुर गांव का है। यहां के रहने वाले अमर कुमार को अचानक बिजली का करंट लग गया, जिससे उनकी हालत गंभीर हो गई। आनन-फानन में परिजन उन्हें इलाज के लिए सदर अस्पताल लेकर पहुंचे, लेकिन वहां डॉक्टरों ने जांच के बाद उन्हें मृत घोषित कर दिया।


इसके बाद जो हुआ, उसने इंसानियत और व्यवस्था दोनों पर सवाल खड़े कर दिए।


अस्पताल में न तो स्ट्रेचर उपलब्ध कराया गया और न ही शव वाहन की कोई व्यवस्था की गई। परिजन बार-बार अस्पताल कर्मियों से मदद की गुहार लगाते रहे, लेकिन उन्हें कोई सहयोग नहीं मिला। आखिरकार मजबूर होकर परिजनों ने एक ठेला का इंतजाम किया और उसी पर शव को रखकर अस्पताल से बाहर निकले।


अस्पताल परिसर में यह दृश्य जिसने भी देखा, वह सन्न रह गया। एक तरफ परिजन गम में डूबे थे, दूसरी ओर उन्हें इस तरह की अमानवीय परिस्थिति का सामना करना पड़ा। यह सिर्फ एक परिवार की पीड़ा नहीं, बल्कि उस सिस्टम की नाकामी है, जो संकट के समय पूरी तरह फेल नजर आता है।


मृतक के परिजन उपदेश राय ने आरोप लगाया कि अस्पताल में किसी तरह की कोई सुविधा नहीं दी गई। उन्होंने कहा कि न स्ट्रेचर मिला, न ही एंबुलेंस या शव वाहन। ऐसे में उन्हें मजबूरन ठेले का सहारा लेना पड़ा। उन्होंने प्रशासन से मांग की है कि इस मामले की जांच कर जिम्मेदार लोगों पर सख्त कार्रवाई की जाए।


सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि जब सरकार हर महीने स्वास्थ्य सेवाओं पर करोड़ों रुपये खर्च करने का दावा करती है, तो आखिर ऐसी बुनियादी सुविधाएं भी क्यों उपलब्ध नहीं हो पातीं? क्या यह लापरवाही नहीं, बल्कि संवेदनहीनता का उदाहरण नहीं है?


सीतामढ़ी की यह घटना यह सोचने पर मजबूर करती है कि क्या आम आदमी की जिंदगी और मौत की कोई कीमत नहीं रह गई है? जब अस्पताल जैसे संवेदनशील स्थान पर भी ऐसी स्थिति हो, तो फिर आम जनता किस पर भरोसा करे?


यह कोई पहली घटना नहीं है, जब बिहार के सरकारी अस्पतालों की बदहाल स्थिति सामने आई हो। लेकिन हर बार की तरह अगर इस मामले में भी केवल जांच और आश्वासन तक बात सीमित रह गई, तो हालात कभी नहीं बदलेंगे।