PATNA: बिहार की सत्ता के सबसे बड़े दलाल रिशु श्री के मामले में स्पेशल विजलेंस यूनिट (SVU) की गिरफ्तारी से बचने के लिए फरार IAS अधिकारी संजीव हंस ने निगरानी विभाग के अपर मुख्य सचिव और डीजी को पत्र लिखा है. संजीव हंस ने कहा है कि उनका रिशु श्री मामले में कोई हाथ नहीं है और ना ही रिशु श्री से कोई कनेक्शन है. संजीव हंस ने दावा किया है कि उन्हें बिना किसी प्रारंभिक जांच के मामले में अभियुक्त बनाया गया है तथा उनके खिलाफ दर्ज प्राथमिकी तथ्यों के बजाय पूर्वाग्रहों पर आधारित है।
SVU की एफआईआर पर सवाल
दरअसल बिहार पुलिस की स्पेशल विजलेंस यूनिट संजीव हंस को रिशु श्री मामले में दर्ज एफआईआर संख्या-5/2025 में तलाश रही है. इस मामले में पूर्व अधिकारी मुमुक्षु चौधरी, पूर्व चीफ इंजीनियर तारणी दास समेत तीन लोगों को गिरफ्तार किया जा चुका है. एसवीयू ने इसी मामले में गिरफ्तारी के लिए संजीव हंस के ठिकानों पर छापेमारी की थी लेकिन वे फरार हो गये.
संजीव हंस ने अपने पत्र में कहा है कि जिस मामले को आधार बनाकर नई प्राथमिकी दर्ज की गई है, उसका मूल स्रोत प्रवर्तन निदेशालय (ED) की ECIR/PTZO/04/2024 है। उन्होंने दावा किया कि इस जांच का आधार बने रूपसपुर थाना कांड संख्या 18/2023 को पटना हाईकोर्ट ने निरस्त कर दिया था। बाद में उस आदेश के खिलाफ दायर अपील को भी सर्वोच्च न्यायालय ने खारिज कर दिया। इसके बावजूद उन्हीं तथ्यों को दोहराते हुए नई प्राथमिकी दर्ज की गई।
नई प्राथमिकी में केवल एक नया आरोप जोड़ा गया
दरअसल, संजीव हंस के खिलाफ पहले भी मामला दर्ज है और उस मामले में वे लंबे समय तक जेल में रह चुके हैं. अब निगरानी विभाग को लिखे गये पत्र में संजीव हंस ने कहा है कि SVU द्वारा दर्ज कांड संख्या 05/2025 में पुराने आरोपों को दोहराया गया है और केवल एक नया आरोप जोड़ा गया है। यह आरोप जल संसाधन विभाग में उनके सचिव रहते एक कंपनी को ठेका आवंटित किए जाने से जुड़ा है। उन्होंने दावा किया कि जांच एजेंसियों ने ऐसा कोई दस्तावेज या साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किया है जिससे यह साबित हो कि उन्होंनेकिसी प्रकार की अनियमितता या पक्षपात किया था।
रिशु श्री को टेंडर देने पर दी सफाई
दरअसल ईडी ने अपनी जांच में पाया है कि संजीव हंस ने जल संसाधन विभाग का सचिव रहते हुए रिशु श्री के कहने पर 125 करोड़ का टेंडर खास कंपनी को सौंपा. उस कंपनी से रिशु श्री ने पेटी कॉंट्रेक्ट पर काम लिया. टेंडर देने के खेल में संजीव हंस ने मोटा घूस लिया. लेकिन अपने पत्र में संजीव हंस कहा है कि संबंधित परियोजना विश्व बैंक पोषित योजना का हिस्सा थी और इसके लिए निविदा प्रक्रिया बिहार लोक निर्माण विभाग संहिता तथा विश्व बैंक के दिशा-निर्देशों के अनुरूप संचालित की गई थी। उन्होंने कहा कि 350 लाख रुपये से अधिक मूल्य की निविदाओं पर निर्णय लेने का अधिकार विभागीय निविदा समिति के पास होता है, न कि अकेले विभागीय सचिव के पास।
उन्होंने यह भी कहा कि संबंधित परियोजना के लिए तकनीकी मूल्यांकन, वित्तीय बोली और अंतिम निर्णय कई स्तरों की समितियों तथा विश्व बैंक की स्वीकृति के बाद लिया गया था। उनके अनुसार विभागीय सचिव के रूप में उनकी भूमिका केवल निर्धारित प्रशासनिक प्रक्रियाओं तक सीमित थी और उन्होंने किसी कंपनी को लाभ पहुंचाने के लिए कोई व्यक्तिगत निर्णय नहीं लिया।
किसी व्यक्तिगत लाभ का आरोप नहीं
संजीव हंस ने कहा कि प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) और अन्य एजेंसियों द्वारा उपलब्ध कराई गई सूचनाओं में ऐसा कोई उल्लेख नहीं है कि उन्हें संबंधित कंपनियों से कोई व्यक्तिगत लाभ प्राप्त हुआ हो। उन्होंने कहा कि कंपनियों के बीच होने वाले वित्तीय लेन-देन को उनसे जोड़ना तथ्यात्मक रूप से गलत है।
पत्र में उन्होंने विशेष रूप से उस आरोप का भी उल्लेख किया है जिसमें एक कंपनी द्वारा सुनील कुमार सिन्हा के बैंक खाते में 20 लाख रुपये भेजे जाने की बात कही गई है। हंस का कहना है कि उस अवधि में वे जल संसाधन विभाग में पदस्थापित भी नहीं थे। उन्होंने यह भी दावा किया कि जिस खाते को कमीशन भुगतान से जोड़ा जा रहा है, वह निजी कंपनियों के बीच का लेन-देन था और उसका उनसे कोई संबंध नहीं है।
सिर्फ परिचय के आधार पर जोड़ा गया नाम
संजीव हंस ने अपने पत्र में कहा है कि उन्हें मामले में इसलिए जोड़ा गया क्योंकि वे सुनील कुमार सिन्हा को जानते थे। उन्होंने इसे जांच का कमजोर आधार बताते हुए कहा कि किसी व्यक्ति को जानना और किसी कथित वित्तीय लेन-देन में शामिल होना दो अलग-अलग बातें हैं।
ईडी कार्रवाई और जमानत का भी किया जिक्र
आईएएस अधिकारी ने पत्र में यह भी उल्लेख किया है कि ईडी के केस ECIR/PTZO/04/2024 में उन्हें गिरफ्तार किया गया था, लेकिन बाद में पटना हाईकोर्ट ने उन्हें जमानत प्रदान कर दी। उन्होंने दावा किया कि न्यायालय ने अपने आदेश में स्पष्ट किया है कि उनके खिलाफ लगाए गए आरोप प्रथम दृष्टया सिद्ध नहीं होते हैं।
निष्पक्ष जांच की मांग
पत्र के अंत में संजीव हंस ने निगरानी विभाग और SVU से अनुरोध किया है कि मामले की निष्पक्ष जांच की जाए तथा उपलब्ध वास्तविक तथ्यों के आधार पर उनके खिलाफ लगाए गए आरोपों की समीक्षा की जाए। उन्होंने कहा है कि वे जांच में पूरा सहयोग करने को तैयार हैं।
मामला क्यों महत्वपूर्ण है?
SVU थाना कांड संख्या 05/2025 पहले से ही बिहार की नौकरशाही और राजनीतिक गलियारों में चर्चा का विषय बना हुआ है। ऐसे में मामले के प्रमुख अभियुक्तों में शामिल पूर्व आईएएस अधिकारी संजीव हंस का यह विस्तृत स्पष्टीकरण जांच की दिशा और कानूनी बहस दोनों को प्रभावित कर सकता है। हालांकि पत्र में किए गए दावों की स्वतंत्र पुष्टि जांच एजेंसियों या न्यायालयों द्वारा होना अभी बाकी है।





