1st Bihar Published by: First Bihar Updated Apr 08, 2026, 8:18:04 AM
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Bihar Politics : बिहार की राजनीति में इन दिनों बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है। कभी मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के खिलाफ खुलकर मोर्चा खोलने वाले सम्राट चौधरी आज उनके सबसे भरोसेमंद सहयोगियों में गिने जा रहे हैं। यही वजह है कि अब उन्हें भविष्य में भारतीय जनता पार्टी की ओर से मुख्यमंत्री पद का संभावित चेहरा भी माना जा रहा है। हाल ही में कई नेताओं और जेडीयू के एक विधायक के बयान ने इस चर्चा को और तेज कर दिया, जिसमें उन्होंने सम्राट को BJP का सबसे बेहतर CM विकल्प बताया।
इन तमाम नेताओं का बयान यदि भूल भी जाएं तो विधायक का बयान नहीं भुला जा सकता है। उनका बयान इसलिए भी अहम माना जा रहा है क्योंकि उनकी जेडीयू और नीतीश कुमार से नजदीकियां किसी से छिपी नहीं हैं। ऐसे समय में जब राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) का कोई भी बड़ा नेता खुलकर मुख्यमंत्री चेहरे पर बात नहीं कर रहा, इस तरह का बयान राजनीतिक संकेत देता है।
दरअसल, सम्राट चौधरी का यह बदलाव अचानक नहीं हुआ है। इसके पीछे पिछले कुछ वर्षों की रणनीति और परिस्थितियों का बड़ा योगदान है। साल 2022 और 2023 के दौरान सम्राट चौधरी नीतीश कुमार के सबसे बड़े आलोचकों में शामिल थे। उन्होंने अपनी मां के निधन के बाद सिर पर ‘मुरेठा’ बांधा था और सार्वजनिक मंचों से कहते थे कि यह उन्होंने नीतीश को सत्ता से हटाने के संकल्प के रूप में धारण किया है। उस समय बिहार में महागठबंधन की सरकार थी और भाजपा विपक्ष में थी, जिससे दोनों दलों के रिश्ते बेहद तल्ख थे।
लेकिन नवंबर 2023 के आसपास राजनीतिक माहौल बदलने लगा। संकेत मिलने लगे कि भाजपा और जेडीयू के बीच फिर से गठबंधन हो सकता है। इसी दौरान सम्राट चौधरी के तेवर भी बदलने लगे। उन्होंने नीतीश कुमार पर सीधा हमला कम कर दिया और पार्टी की रणनीति के अनुसार खुद को ढालना शुरू कर दिया। यह बदलाव उनके राजनीतिक भविष्य के लिहाज से काफी अहम साबित हुआ।
जनवरी 2024 में जब नीतीश कुमार ने महागठबंधन छोड़कर फिर से NDA के साथ सरकार बनाई, तो सम्राट चौधरी को उपमुख्यमंत्री बनाया गया। यह उनके राजनीतिक कद में बड़ी छलांग थी। इसके बाद उन्होंने अपने व्यवहार और कार्यशैली में और ज्यादा संतुलन लाया। उन्होंने समझ लिया कि अगर उन्हें आगे बढ़ना है, तो नीतीश कुमार का भरोसा जीतना बेहद जरूरी है।
सम्राट ने इस दिशा में कई स्तरों पर काम किया। उन्होंने हर सार्वजनिक मंच से प्रधानमंत्री के साथ-साथ मुख्यमंत्री की भी तारीफ करनी शुरू की। वे हर कार्यक्रम में नीतीश कुमार के साथ दिखाई देने लगे और पूरी तरह से सहयोगी भूमिका निभाने लगे। उनकी यही रणनीति धीरे-धीरे रंग लाने लगी और वे नीतीश के भरोसेमंद नेताओं में शामिल हो गए।
उनके इस बदलाव का सबसे बड़ा प्रतीक जुलाई 2024 में देखने को मिला, जब उन्होंने अयोध्या यात्रा के दौरान अपना मुरेठा उतारकर सरयू नदी में विसर्जित कर दिया। यह सिर्फ एक धार्मिक या व्यक्तिगत निर्णय नहीं था, बल्कि एक राजनीतिक संदेश भी था कि अब उनकी भूमिका बदल चुकी है और वे टकराव की राजनीति से आगे बढ़ चुके हैं।
सम्राट चौधरी ने अपने पारिवारिक संबंधों का भी सही इस्तेमाल किया। उनके पिता शकुनी चौधरी, जो समता पार्टी के संस्थापकों में रहे हैं, नीतीश कुमार के पुराने सहयोगी हैं। इस रिश्ते ने भी दोनों नेताओं के बीच दूरी कम करने में मदद की। हाल ही में एक कार्यक्रम में नीतीश कुमार ने खुद सम्राट की तारीफ करते हुए उनके उज्ज्वल भविष्य की बात कही, जो उनके रिश्तों की मजबूती को दर्शाता है।
इसके अलावा, सरकार बनने के बाद गृह विभाग जैसे महत्वपूर्ण मंत्रालय को लेकर भी संभावित विवाद की स्थिति बनी थी। यह विभाग पहले हमेशा नीतीश कुमार के पास रहता था, लेकिन इस बार यह सम्राट चौधरी को मिला। ऐसे में कयास लगाए जा रहे थे कि इससे दोनों नेताओं के बीच टकराव हो सकता है। लेकिन सम्राट ने अपने बयानों से इन अटकलों पर पूरी तरह विराम लगा दिया।
उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि भले ही विभाग उनके पास है, लेकिन अंतिम निर्णय मुख्यमंत्री का ही होता है। इस बयान ने यह साबित कर दिया कि वे सत्ता में रहते हुए भी खुद को नीतीश कुमार से ‘दो कदम पीछे’ रखने की रणनीति पर काम कर रहे हैं। यही उनकी राजनीतिक समझदारी भी मानी जा रही है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि भाजपा भी अब बिहार में अपने नए नेतृत्व को स्थापित करना चाहती है, लेकिन वह यह भी समझती है कि नीतीश कुमार का समर्थन और उनके वोट बैंक का ट्रांसफर बेहद अहम है। ऐसे में सम्राट चौधरी एक ऐसे चेहरे के रूप में उभरे हैं, जो भाजपा और जेडीयू के बीच संतुलन बना सकते हैं।
कुल मिलाकर, सम्राट चौधरी का यह सफर—एक आक्रामक विरोधी नेता से लेकर मुख्यमंत्री के भरोसेमंद सहयोगी तक—बिहार की राजनीति में एक बड़ा उदाहरण बन गया है। आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या वे वास्तव में मुख्यमंत्री पद तक पहुंच पाते हैं या नहीं, लेकिन फिलहाल वे इस दौड़ में सबसे मजबूत दावेदार के रूप में उभर चुके हैं।