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Bihar News: जिस सच की तलाश थी, वो मिला ही नहीं? पटना NEET छात्रा मौत केस में CBI को नहीं मिले ठोस सबूत, क्लोजर रिपोर्ट ने बढ़ाए सवाल

पटना के NEET छात्रा मौत मामले में CBI ने अदालत में क्लोजर रिपोर्ट दाखिल की है। जांच एजेंसी को किसी के खिलाफ ठोस सबूत नहीं मिले। 13 अक्टूबर को अदालत में सुनवाई होगी। रिपोर्ट के बाद कई बड़े सवाल खड़े हो रहे हैं।

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Tejpratap
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Bihar News : पटना में नीट की तैयारी कर रही छात्रा की मौत का मामला आखिरकार उस मोड़ पर पहुंच गया है, जहां सवालों के जवाब मिलने की उम्मीद थी, लेकिन सवाल ही और बढ़ गए। जिस मामले में छात्रा की मौत के बाद गंभीर आरोप लगे, जिस मामले की जांच बिहार पुलिस से होते हुए सीबीआई तक पहुंची, अब उसी मामले में सीबीआई ने अदालत में क्लोजर रिपोर्ट दाखिल कर दी है। जांच एजेंसी का कहना है कि किसी के खिलाफ कार्रवाई के लिए ठोस सबूत नहीं मिले। यानी महीनों की जांच के बाद नतीजा यह कि सबूत नहीं मिला। लेकिन सवाल है—क्या सबूत नहीं मिला या सच तक पहुंचने का रास्ता नहीं मिला?


मामला पटना के चित्रगुप्त नगर थाना क्षेत्र स्थित शंभू गर्ल्स हॉस्टल का है। जहानाबाद की रहने वाली नीट की तैयारी कर रही छात्रा 6 जनवरी 2026 को हॉस्टल में बेहोशी की हालत में मिली थी। उसकी हालत गंभीर थी और इलाज के दौरान 11 जनवरी को उसकी मौत हो गई। बेटी की मौत के बाद परिवार ने गंभीर आरोप लगाए। दुष्कर्म और हत्या की आशंका जताई गई और पुलिस से पूरे मामले की निष्पक्ष जांच की मांग की गई। इसके बाद मामला सामान्य मौत की जांच तक सीमित नहीं रहा, बल्कि पटना की कानून-व्यवस्था और जांच व्यवस्था पर भी सवाल खड़े होने लगे।


परिवार के आरोपों के बाद एफआईआर दर्ज हुई। बिहार पुलिस ने जांच के लिए एसआईटी बनाई। यानी व्यवस्था ने कहा कि जांच होगी, हर पहलू देखा जाएगा और सच सामने लाया जाएगा। लेकिन जब सवाल उठते रहे तो जांच की जिम्मेदारी सीबीआई को सौंप दी गई। सीबीआई आई तो लगा कि अब शायद वह हर बंद दरवाजा खोलेगी, हर संदिग्ध कड़ी को जोड़ेगी और उस सवाल का जवाब देगी जो एक परिवार लगातार पूछ रहा है—आखिर उनकी बेटी के साथ हुआ क्या था?


लेकिन अब अदालत में दाखिल क्लोजर रिपोर्ट ने कहानी को ही उलझा दिया है। सीबीआई को किसी के खिलाफ ठोस सबूत नहीं मिला। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर इतनी बड़ी जांच के बाद हासिल क्या हुआ? क्या शुरुआती आरोप गलत थे? अगर गलत थे तो उन्हें गलत साबित करने वाले ठोस तथ्य क्या हैं? और अगर परिवार के आरोपों में कुछ ऐसा था जिसकी जांच जरूरी थी, तो जांच उस बिंदु तक क्यों नहीं पहुंच सकी जहां तस्वीर पूरी तरह साफ हो जाती?


यहां यह समझना भी जरूरी है कि क्लोजर रिपोर्ट का मतलब अदालत का अंतिम फैसला नहीं है। सीबीआई ने अपनी जांच के आधार पर रिपोर्ट दाखिल की है। अब अदालत इस रिपोर्ट को स्वीकार करती है या नहीं, यह अदालत तय करेगी। इस मामले में पॉक्सो की विशेष अदालत में 13 अक्टूबर को सुनवाई होनी है और सूचक यानी शिकायतकर्ता पक्ष को भी अपनी बात रखने का मौका मिलेगा। इसलिए फिलहाल यह कहना जल्दबाजी होगी कि मामला पूरी तरह खत्म हो गया।


लेकिन सवाल पूछने से कौन रोक सकता है? आखिर जांच के दौरान कौन-कौन से सबूत जुटाए गए? हॉस्टल में लगे डीवीआर की जांच से क्या सामने आया? छात्रा के मोबाइल और दूसरे इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों से क्या पता चला? पोस्टमार्टम और मेडिकल जांच के निष्कर्षों ने क्या संकेत दिए? और सबसे अहम—जिस परिस्थिति में एक युवा छात्रा हॉस्टल में बेहोश मिली और कुछ दिन बाद उसकी मौत हो गई, उस पूरे घटनाक्रम की ऐसी कौन सी कड़ी थी जिसे जांच एजेंसी जोड़ नहीं सकी?


इस केस में हॉस्टल मालिक मनीष रंजन की गिरफ्तारी भी हुई थी। लेकिन निर्धारित समय के भीतर आरोपपत्र दाखिल नहीं हो सका और बाद में उसे नियमित जमानत मिल गई। अब जब सीबीआई ने भी ठोस सबूत नहीं मिलने की बात कहते हुए क्लोजर रिपोर्ट दाखिल कर दी है, तो स्वाभाविक रूप से सवाल उठना लाजिमी है कि आखिर जांच की शुरुआती दिशा क्या थी और वह आगे बढ़ते-बढ़ते यहां तक कैसे पहुंची?


तंज यही है कि जिस मामले में परिवार अपनी बेटी की मौत का सच मांग रहा था, उसे जांच की लंबी प्रक्रिया के बाद फिलहाल एक रिपोर्ट मिल गई—क्लोजर रिपोर्ट। जिस परिवार को जवाब चाहिए था, उसके सामने अब एक और सवाल खड़ा है। जिस एजेंसी से उम्मीद थी कि वह रहस्य की आखिरी परत भी खोल देगी, उसकी रिपोर्ट कह रही है कि किसी के खिलाफ मुकदमा चलाने लायक ठोस सबूत नहीं है। तो फिर उस बेटी की मौत का सच किसके पास है?


यहां सीबीआई पर सवाल उठाना भी उतना ही आसान है जितना किसी परिवार के आरोप को सच मान लेना। लेकिन न्याय व्यवस्था का काम आसान रास्ता चुनना नहीं, बल्कि उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर सच तक पहुंचना है। अगर साक्ष्य किसी अपराध की पुष्टि नहीं करते तो कानून किसी निर्दोष को सिर्फ शक के आधार पर दोषी नहीं ठहरा सकता। लेकिन दूसरी तरफ अगर परिवार के मन में आज भी सवाल हैं तो उनका जवाब भी जरूरी है।


क्योंकि किसी केस की फाइल बंद होना और किसी परिवार के सवाल खत्म होना—दो अलग-अलग बातें हैं। अदालत अगर क्लोजर रिपोर्ट स्वीकार कर लेती है तो कानूनी तौर पर जांच का यह अध्याय बंद हो सकता है, लेकिन क्या इससे उस परिवार की बेचैनी भी खत्म हो जाएगी? शायद नहीं।


अब निगाहें 13 अक्टूबर की सुनवाई पर हैं। अदालत क्या कहती है, सूचक पक्ष क्या आपत्ति दर्ज कराता है और क्या मामले में आगे जांच की कोई गुंजाइश बनती है, यह आने वाला वक्त बताएगा। फिलहाल पटना की इस नीट छात्रा की मौत के मामले में सबसे बड़ा सवाल यही है—सीबीआई को ठोस सबूत नहीं मिले, लेकिन क्या उस छात्रा की मौत का ठोस सच भी नहीं मिला? आखिर एक बेटी की मौत का जवाब सिर्फ ‘सबूत नहीं मिला’ कहकर खत्म हो जाएगा, या कभी यह भी पता चलेगा कि उस दिन वास्तव में हुआ क्या था?