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Food Sampling : न अपना दफ्तर, न पर्याप्त स्टाफ और न गाड़ियां! बिहार में 7 जिलों की खाद्य सुरक्षा व्यवस्था पर बड़ा सवाल

पटना समेत 7 जिलों में खाद्य सुरक्षा विभाग संसाधनों की कमी से जूझ रहा है। 150 वर्गफीट के कमरे से कामकाज और एक डेजिगनेटेड अफसर पर सात जिलों की जिम्मेदारी है। हालांकि विभाग का दावा है कि जांच और कार्रवाई नियमित जारी है।

Food Sampling : न अपना दफ्तर, न पर्याप्त स्टाफ और न गाड़ियां! बिहार में 7 जिलों की खाद्य सुरक्षा व्यवस्था पर बड़ा सवाल
Tejpratap
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6 मिनट

पटना :  राजधानी पटना समेत सात जिलों में लोगों की थाली तक पहुंचने वाले भोजन की शुद्धता की निगरानी करने वाले खाद्य सुरक्षा विभाग के सामने खुद संसाधनों का संकट खड़ा है। जिस विभाग पर मिलावटखोरी रोकने, खाद्य पदार्थों की गुणवत्ता जांचने और नियमों का उल्लंघन करने वालों पर कार्रवाई करने की जिम्मेदारी है, उसके पास न तो पर्याप्त कार्यालयी सुविधा है और न ही जांच से जुड़े सभी जरूरी संसाधन।

स्थिति का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि करीब 150 वर्गफीट के एक कमरे से सात जिलों से जुड़े खाद्य सुरक्षा संबंधी कामकाज को संचालित किया जा रहा है। वहीं, इन जिलों में खाद्य पदार्थों की गुणवत्ता की निगरानी की जिम्मेदारी फिलहाल एक ही डेजिगनेटेड अफसर के कंधों पर है। ऐसे में सवाल उठता है कि इतने बड़े क्षेत्र में फैले बाजार, होटल, रेस्टोरेंट, मिठाई दुकानों, डेयरी प्रतिष्ठानों और स्ट्रीट फूड की नियमित निगरानी किस तरह हो रही है?

एक अधिकारी के जिम्मे सात जिलों की जिम्मेदारी

पटना में पदस्थापित खाद्य संरक्षा अधिकारी को अकेले पटना ही नहीं, बल्कि नालंदा, भोजपुर, बक्सर, अरवल, रोहतास और कैमूर की भी जिम्मेदारी संभालनी पड़ रही है। यानी कुल सात जिलों में औचक निरीक्षण से लेकर खाद्य पदार्थों के नमूने लेने, उनकी जांच से जुड़ी प्रक्रिया, कोर्ट केस और कानूनी कार्रवाई तक की जिम्मेदारी एक ही अधिकारी को देखनी पड़ रही है।

खाद्य सुरक्षा विभाग का काम केवल दुकानों की जांच तक सीमित नहीं है। किसी प्रतिष्ठान से खाद्य पदार्थ का नमूना लेने के बाद उसकी प्रक्रिया, रिकॉर्ड, रिपोर्ट, संबंधित कार्रवाई और जरूरत पड़ने पर न्यायालय से जुड़े मामलों को भी आगे बढ़ाना होता है। सात जिलों का क्षेत्र होने के कारण यह जिम्मेदारी और भी चुनौतीपूर्ण हो जाती है।

न वाहन, न पर्याप्त फील्ड स्टाफ

विभाग के सामने एक और बड़ी समस्या पर्याप्त फील्ड स्टाफ और वाहनों की कमी की है। खाद्य सुरक्षा से जुड़े अधिकारियों को अलग-अलग जिलों में जाकर निरीक्षण और सैंपलिंग करनी होती है। लेकिन जब विभाग के पास पर्याप्त अपनी गाड़ियां और मानव संसाधन उपलब्ध नहीं हों, तो एक जिले से दूसरे जिले तक पहुंचना भी चुनौती बन जाता है।

खासकर ऐसे समय में जब पटना और आसपास के जिलों में खाद्य कारोबार का दायरा लगातार बढ़ रहा है, नियमित निरीक्षण के लिए पर्याप्त अमले की जरूरत और बढ़ जाती है। शहर में नए-नए रेस्टोरेंट, कैफे, मिठाई की दुकानें, डेयरी प्रतिष्ठान और स्ट्रीट फूड के कारोबार तेजी से सामने आ रहे हैं। ऐसे में सीमित अधिकारियों और संसाधनों के सहारे हर इलाके तक नियमित निगरानी पहुंचाना आसान काम नहीं है।

खाद्य नमूनों के सुरक्षित रखरखाव की भी चुनौती

खाद्य सुरक्षा व्यवस्था में सिर्फ नमूने लेना ही पर्याप्त नहीं होता। जांच के लिए उठाए गए खाद्य नमूनों को निर्धारित प्रक्रिया के तहत सुरक्षित रखना भी जरूरी होता है। इसके लिए उपयुक्त स्टोरेज और अन्य जरूरी सुविधाओं की आवश्यकता रहती है।विभाग के सामने कार्यालय और स्टोरेज से जुड़ी सुविधाओं की कमी भी इसी वजह से महत्वपूर्ण मुद्दा बन जाती है। एक छोटे से कमरे से कार्यालयी कामकाज संचालित होने के कारण रिकॉर्ड रखने और नमूनों के सुरक्षित रखरखाव के लिए पर्याप्त जगह की आवश्यकता महसूस होती है।

बढ़ते खाद्य कारोबार के बीच निगरानी का दबाव

पटना जैसे बड़े शहर में खाद्य सुरक्षा विभाग के सामने चुनौती सिर्फ क्षेत्रफल की नहीं, बल्कि खाद्य कारोबार की विविधता की भी है। सड़क किनारे लगने वाले ठेलों से लेकर बड़े रेस्टोरेंट और कैफे तक, खाद्य पदार्थों की बिक्री का दायरा काफी व्यापक है।मिठाइयों, डेयरी उत्पादों, मसालों, तेल, पैकेज्ड फूड और अन्य खाद्य पदार्थों की गुणवत्ता की निगरानी के लिए नियमित सैंपलिंग और निरीक्षण जरूरी है। इसके अलावा त्योहारों के मौसम में मिठाई, खोवा, दूध और अन्य खाद्य पदार्थों की मांग बढ़ने के साथ मिलावट की शिकायतों पर भी विभाग का दबाव बढ़ जाता है।

विभाग का दावा- संसाधनों की कमी से कार्रवाई प्रभावित नहीं

हालांकि खाद्य सुरक्षा विभाग के डेजिगनेटेड अफसर सुदामा चौधरी का कहना है कि संसाधनों की कमी जरूर है, लेकिन इसका विभाग की नियमित कार्रवाई पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ रहा है।सुदामा चौधरी के मुताबिक, पटना जैसे बड़े शहर में नियमित निरीक्षण, सैंपलिंग और खाद्य नमूनों के सुरक्षित रखरखाव के लिए अतिरिक्त मैनपावर, वाहन, कार्यालयी सुविधाओं और स्टोरेज की आवश्यकता रहती है। वर्तमान में उपलब्ध संसाधनों के आधार पर विभागीय कार्य नियमित रूप से संचालित किए जा रहे हैं। उन्होंने कहा कि संसाधनों की कमी के बावजूद नियमित निरीक्षण, सैंपलिंग और कार्रवाई की प्रक्रिया प्रभावित नहीं हो रही है।

सवाल सिर्फ विभाग का नहीं, लोगों की थाली का भी

खाद्य सुरक्षा का सीधा संबंध आम लोगों की सेहत और रोजमर्रा की जिंदगी से है। ऐसे में सात जिलों की निगरानी का जिम्मा सीमित संसाधनों और एक अधिकारी के भरोसे होने की स्थिति व्यवस्था के सामने बड़ी चुनौती जरूर खड़ी करती है।एक तरफ खाद्य कारोबार का लगातार विस्तार हो रहा है, दूसरी तरफ निगरानी तंत्र को पर्याप्त संसाधन और मैनपावर की जरूरत है। विभाग का दावा है कि मौजूदा व्यवस्था में भी कार्रवाई जारी है, लेकिन बढ़ते बाजार के साथ खाद्य सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत करने के लिए अधिक अधिकारी, फील्ड स्टाफ, वाहन, कार्यालय और सुरक्षित स्टोरेज जैसी सुविधाओं की जरूरत साफ दिखाई देती है।

आखिर लोगों की थाली तक पहुंचने वाले भोजन की गुणवत्ता की निगरानी जितनी महत्वपूर्ण है, उतनी ही जरूरी है उस निगरानी तंत्र को मजबूत बनाना। फिलहाल सात जिलों की खाद्य सुरक्षा व्यवस्था सीमित संसाधनों के बीच किस तरह आगे बढ़ रही है, यह आने वाले समय में भी अहम सवाल बना रहेगा।