बेगूसराय: बिहार की राजनीति में आरक्षण का मुद्दा एक बार फिर गरमाने लगा है। पूर्व सांसद आनंद मोहन ने आरक्षण व्यवस्था को लेकर ऐसा सवाल खड़ा किया है, जिस पर आने वाले दिनों में सियासी बहस तेज हो सकती है। आनंद मोहन ने कहा कि वह आरक्षण के विरोधी नहीं हैं, लेकिन अब इसकी समीक्षा का वक्त आ गया है। उन्होंने दावा किया कि पिछड़ों के बीच भी नए सामंत पैदा हो गए हैं, जो लंबे समय से आरक्षण के लाभ का फायदा उठा रहे हैं।
आनंद मोहन का सवाल सीधा है—जब आरक्षण का मकसद समाज के सबसे पिछड़े और वंचित लोगों को आगे लाना था, तो क्या इसका लाभ लगातार उन्हीं परिवारों और प्रभावशाली लोगों तक सीमित रहना चाहिए, जो पहले ही सामाजिक और आर्थिक रूप से मजबूत हो चुके हैं?
‘आरक्षण का विरोध नहीं, लेकिन समीक्षा जरूरी’
पूर्व सांसद ने कहा कि बाबा साहब डॉ. भीमराव आंबेडकर ने पिछड़े और वंचित समाज को मुख्यधारा में लाने के उद्देश्य से आरक्षण की व्यवस्था की पैरवी की थी। उस दौर में उद्देश्य था कि जिन वर्गों को सामाजिक भेदभाव और अवसरों की कमी के कारण पीछे रखा गया, उन्हें आगे आने का मौका मिले।
लेकिन आनंद मोहन के मुताबिक अब आरक्षण व्यवस्था को लागू हुए करीब 80 साल हो चुके हैं। ऐसे में समय के साथ इसकी समीक्षा होना जरूरी है।उनका कहना है कि आरक्षण खत्म करने की बात नहीं हो रही है, बल्कि यह देखा जाना चाहिए कि इसका वास्तविक लाभ किसे मिल रहा है। यही बयान अब राजनीतिक बहस का केंद्र बन सकता है। क्योंकि सवाल सिर्फ आरक्षण जारी रखने या खत्म करने का नहीं है, बल्कि यह तय करने का भी है कि इसके लाभ का सबसे बड़ा हकदार कौन है।
‘पिछड़ों में भी पैदा हो गए नए सामंत’
आनंद मोहन ने पिछड़े वर्गों के भीतर सामाजिक और आर्थिक रूप से मजबूत हो चुके लोगों पर निशाना साधते हुए कहा कि अब पिछड़ों में भी नए सामंत पैदा हो गए हैं। उनका तर्क है कि पिछड़े समाज के कई लोग आज बड़े-बड़े पदों तक पहुंच चुके हैं। उनके परिवार आर्थिक और सामाजिक रूप से मजबूत हो चुके हैं। इसके बावजूद अगर उसी परिवार और उसके करीबी लोगों को लगातार आरक्षण का लाभ मिलता रहे, तो फिर उस व्यक्ति का क्या होगा जो आज भी गरीबी, पिछड़ेपन और अवसरों की कमी से जूझ रहा है?यानी आनंद मोहन की आपत्ति आरक्षण की व्यवस्था से ज्यादा आरक्षण के लाभ के असमान वितरण को लेकर है। उन्होंने सवाल उठाया कि जो लोग व्यवस्था में अपनी जगह बना चुके हैं, क्या उनके बाद भी उनके परिवारों को लगातार वही अवसर मिलते रहने चाहिए? अगर ऐसा होता है तो सामाजिक न्याय का लाभ समाज के सबसे कमजोर व्यक्ति तक कब पहुंचेगा?
‘बड़े पद पर पहुंच गए, फिर भी करीबियों को फायदा क्यों?’
आनंद मोहन ने कहा कि पिछड़े समाज से आने वाले कई लोग आज सत्ता, प्रशासन और दूसरे महत्वपूर्ण क्षेत्रों में ऊंचे पदों पर हैं। ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या उनके परिवारों और नजदीकी लोगों को भी लगातार आरक्षण का लाभ मिलना चाहिए?उनकी मांग है कि आरक्षण की समीक्षा करते समय यह भी देखा जाए कि कौन व्यक्ति वास्तव में सामाजिक और आर्थिक रूप से पिछड़ा है और कौन पहले ही मजबूत स्थिति में पहुंच चुका है।यह मुद्दा इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि आरक्षण की बहस में अक्सर जातीय प्रतिनिधित्व और सामाजिक न्याय की बात होती है, लेकिन आरक्षण के लाभ के भीतर मौजूद असमानता पर चर्चा अपेक्षाकृत कम होती है।आनंद मोहन ने इसी खाली जगह पर सवाल खड़ा किया है।
जाति की दीवार खत्म करने की भी बात
पूर्व सांसद ने सिर्फ आरक्षण की समीक्षा की मांग नहीं की, बल्कि समाज में जातिगत भेदभाव और विभाजन को खत्म करने की जरूरत भी बताई। उन्होंने कहा कि समाज में समरसता होनी चाहिए और सभी वर्गों को समान अवसर और सम्मान मिलना चाहिए।
हालांकि यहां एक बड़ा सवाल भी खड़ा होता है—अगर जातिगत व्यवस्था को खत्म करना है, तो आरक्षण की मौजूदा व्यवस्था में बदलाव का रास्ता क्या होगा? और क्या आर्थिक एवं सामाजिक आधार को ज्यादा महत्व देने पर सभी राजनीतिक दल सहमत होंगे?बिहार की राजनीति में इन सवालों का जवाब आसान नहीं है। आरक्षण और जातीय समीकरण लंबे समय से राज्य की राजनीति के अहम मुद्दे रहे हैं।
नीतीश कुमार को सत्ता से हटाने पर भी सवाल
आरक्षण के मुद्दे के साथ आनंद मोहन ने बिहार की मौजूदा राजनीतिक स्थिति पर भी सवाल उठाया। उन्होंने चुनाव के दौरान दिए गए ‘25 से 30, एक बार फिर नीतीश’ वाले नारे का जिक्र करते हुए पूछा कि आखिर ऐसी कौन-सी परिस्थिति बनी कि नीतीश कुमार को सत्ता से अलग होना पड़ा?
आनंद मोहन का सवाल सीधे सत्ता के राजनीतिक समीकरणों पर है। उनका कहना है कि जब चुनाव के समय नीतीश कुमार को लेकर एक खास राजनीतिक संदेश दिया गया था, तो बाद में परिस्थितियां ऐसी क्यों बदलीं कि सत्ता की तस्वीर ही बदल गई?
क्या इसके पीछे कोई राजनीतिक मजबूरी थी?क्या गठबंधन की रणनीति बदली?या फिर चुनावी वादे और सत्ता की वास्तविक राजनीति में फर्क सामने आया?इन सवालों के जवाब भले ही अभी राजनीतिक दलों के पास हों, लेकिन आनंद मोहन ने उन्हें सार्वजनिक बहस में जरूर ला दिया है।
अब सबसे बड़ा सवाल—किसे मिले आरक्षण का लाभ?
आनंद मोहन के बयान के बाद आरक्षण पर बहस का फोकस एक बार फिर बदल सकता है। सवाल अब यह नहीं रह जाता कि आरक्षण होना चाहिए या नहीं, बल्कि यह भी है कि आरक्षण का लाभ किसे और कितने समय तक मिलना चाहिए?क्या सामाजिक और आर्थिक रूप से मजबूत हो चुके परिवारों को लगातार इसका लाभ मिलना चाहिए?क्या पिछड़े वर्गों के भीतर सबसे कमजोर तबके को प्राथमिकता देने का कोई नया मॉडल बनाया जा सकता है?और क्या राजनीतिक दल इस संवेदनशील मुद्दे पर खुलकर चर्चा करने को तैयार होंगे? आनंद मोहन ने सवाल दाग दिया है। अब देखना यह है कि बिहार की राजनीति में इस पर जवाब आता है या फिर यह मुद्दा भी बाकी कई राजनीतिक बहसों की तरह कुछ दिनों बाद ठंडे बस्ते में चला जाता है।




