Bihar MLC Election 2026 : बिहार में विधान परिषद की 8 सीटों पर होने वाले स्नातक और शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र के चुनाव को लेकर NDA ने अपनी पूरी ताकत झोंक दी है। मुख्यमंत्री आवास पर 9 अक्टूबर को हुई NDA विधानमंडल दल की बैठक में सभी विधायकों और विधान पार्षदों को साफ संदेश दिया गया—गठबंधन के अधिकृत उम्मीदवारों को हर हाल में जिताना है। बागी उम्मीदवारों के खिलाफ सख्ती का संकेत भी दिया गया और सभी 8 सीटें जीतने का लक्ष्य रखा गया।
लेकिन NDA के सामने सबसे बड़ा सवाल विपक्ष नहीं, बल्कि गठबंधन के भीतर उठ रहे विरोध के सुर हैं। एक तरफ मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी साझा प्रचार और गठबंधन की एकजुटता पर जोर दे रहे हैं, तो दूसरी तरफ पटना स्नातक सीट पर JDU विधायक अनंत सिंह खुलकर अपनी ही पार्टी के उम्मीदवार नीरज कुमार के खिलाफ जनसुराज प्रत्याशी अनुज सिंह के समर्थन में मैदान में हैं। ऐसे में सवाल है कि आखिर NDA की राह में असली मुश्किल क्या है? क्या बगावत वोटों का गणित बिगाड़ सकती है? और क्या CM सम्राट चौधरी के सामने पार्टी और गठबंधन को एकजुट रखने की चुनौती बढ़ गई है?
पहले 9 अक्टूबर के दो बयान समझिए
9 अक्टूबर को NDA की बैठक के दौरान दो बयान खास तौर पर चर्चा में रहे। JDU के राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष संजय झा ने कहा कि MLC चुनाव का सरकार पर सीधा असर नहीं पड़ेगा, लेकिन इससे मनोबल पर फर्क पड़ता है। उन्होंने चुनाव लड़ रहे नेताओं पर तंज करते हुए कहा कि जो लोग घूम रहे हैं, उनका शिक्षा से कोई लेना-देना नहीं है।
वहीं, मुख्यमंत्री आवास से बैठक में शामिल होकर बाहर निकले अनंत सिंह ने साफ कहा कि वह जनसुराज प्रत्याशी अनुज सिंह का समर्थन कर रहे हैं और नीरज कुमार को हराना चाहते हैं। उनका तर्क था कि यह पार्टी का नहीं, बल्कि व्यक्ति-व्यक्ति का चुनाव है और जब नीरज ने उनका विरोध किया है तो वह उनका समर्थन कैसे कर सकते हैं। यही दोनों बयान NDA की मौजूदा राजनीतिक स्थिति को समझने के लिए काफी हैं।
अनंत सिंह के सामने पार्टी नेतृत्व की परीक्षा
पटना स्नातक सीट इस पूरे चुनाव की सबसे हॉट सीट बन गई है और इसकी सबसे बड़ी वजह हैं मोकामा विधायक अनंत सिंह। अनंत सिंह सितंबर के पहले सप्ताह से ही JDU के अधिकृत उम्मीदवार नीरज कुमार के खिलाफ मोर्चा खोले हुए हैं। वह जनसुराज प्रत्याशी डॉ. अनुज सिंह के समर्थन में लगातार इलाकों का दौरा कर रहे हैं, रोड शो कर रहे हैं और मतदाताओं से अनुज सिंह को वोट देने की अपील कर रहे हैं। यानी यह विरोध सिर्फ बयानबाजी तक सीमित नहीं है। अनंत सिंह जमीन पर उतरकर अपने पसंदीदा उम्मीदवार के लिए वोट मांग रहे हैं। यही वजह है कि अब सवाल सिर्फ यह नहीं है कि अनंत सिंह नाराज हैं या नहीं। सवाल यह है कि क्या उनकी नाराजगी JDU के अधिकृत उम्मीदवार नीरज कुमार के चुनावी गणित को प्रभावित कर सकती है?
अनंत को मनाने की कोशिश, लेकिन बात नहीं बनी
अनंत सिंह को शांत कराने की कोशिश भी हुई। 2 अक्टूबर को JDU के राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष संजय झा ने केंद्रीय मंत्री ललन सिंह को इस मामले को संभालने की जिम्मेदारी दी थी। तर्क था कि यह ललन सिंह के क्षेत्र से जुड़ा मामला है।लेकिन 5 अक्टूबर को ललन सिंह ने अनंत सिंह के विरोध को 'क्रिया की प्रतिक्रिया' बताया। उन्होंने यह भी कहा कि जब अनंत सिंह के खिलाफ प्रचार हो रहा था, तब पार्टी को कार्रवाई करनी चाहिए थी और बिहार JDU से इस मामले में चूक हुई।इसके बाद भी अनंत सिंह का रुख नहीं बदला। 9 अक्टूबर को NDA की बैठक में शामिल होने के बाद भी उन्होंने खुले तौर पर कहा कि वह अनुज सिंह का समर्थन कर रहे हैं।इससे साफ है कि फिलहाल पार्टी की अपील और अनंत सिंह की राजनीतिक नाराजगी के बीच दूरी बनी हुई है।
लेकिन क्या अनंत सिंह नीरज कुमार को हरा सकते हैं?
यहां चुनावी आंकड़े तस्वीर को थोड़ा अलग बनाते हैं।नीरज कुमार के पास अपना मजबूत वोट बैंक है और उन्हें NDA के आधिकारिक उम्मीदवार के तौर पर गठबंधन का समर्थन हासिल है। पिछले चुनावों में भी उन्हें विरोधियों की तुलना में अच्छी बढ़त मिली थी।2020 के चुनाव में नीरज कुमार को प्रथम वरीयता के करीब 17 हजार से ज्यादा वोट मिले थे। उनके मुकाबले दूसरे उम्मीदवार काफी पीछे रहे थे। पिछले चुनाव में कांग्रेस उम्मीदवार दिलीप कुमार को 5,739 वोट, जबकि आजाद गांधी को 11,238 वोट मिले थे।यानी नीरज कुमार के सामने चुनौती जरूर है, लेकिन उन्हें हराने के लिए सिर्फ अनंत सिंह का समर्थन पर्याप्त होगा या नहीं, यह बड़ा सवाल है।अनंत सिंह का प्रभाव निश्चित रूप से कुछ इलाकों और वोटरों पर है, लेकिन नीरज कुमार का अपना संगठनात्मक और व्यक्तिगत वोट बैंक भी है। ऊपर से NDA का पूरा गठबंधन उनके पीछे खड़ा है।इसलिए पटना स्नातक सीट पर मुकाबला दिलचस्प जरूर हुआ है, लेकिन अनंत सिंह की बगावत को सीधे नीरज कुमार की हार से जोड़ना अभी जल्दबाजी होगी।
सारण शिक्षक सीट ने भी बढ़ाई टेंशन
NDA के लिए परेशानी सिर्फ पटना स्नातक सीट तक सीमित नहीं है। सारण शिक्षक सीट पर भी गठबंधन के भीतर वोटों के बंटवारे का खतरा दिखाई दे रहा है। यहां NDA की सहयोगी RLM ने JDU उम्मीदवार आनंद पुष्कर के खिलाफ अपना उम्मीदवार उतार दिया है। RLM के तीन विधायकों माधव आनंद, आलोक सिंह और रामेश्वर महतो के समर्थन से पार्टी नेता रामपुकार सिन्हा चुनाव मैदान में हैं।इससे मुकाबला त्रिकोणीय हो गया है।इस सीट पर मौजूदा MLC अफाक अहमद हैं। 2023 के चुनाव में उन्होंने आनंद पुष्कर को करीब 700 वोट से हराया था। उस समय आनंद पुष्कर JDU से चुनाव मैदान में थे और अफाक अहमद को जनसुराज का समर्थन मिला था।अब तस्वीर यह है कि एक तरफ JDU का उम्मीदवार है, दूसरी तरफ RLM का बागी उम्मीदवार और तीसरी तरफ जनसुराज के अफाक अहमद। ऐसे में अगर RLM उम्मीदवार कुछ हजार वोट भी हासिल करता है तो सीधा असर NDA के आधिकारिक उम्मीदवार के वोट पर पड़ सकता है।
NDA ने अब बनाया '8 सीट' वाला प्लान
इन्हीं चुनौतियों के बीच NDA ने चुनावी रणनीति को और आक्रामक करने का फैसला किया है। मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने साफ कहा है कि सभी दलों को साझा प्रचार करना होगा। दल से ज्यादा गठबंधन को प्राथमिकता देनी होगी। यानी BJP, JDU और सहयोगी दल अपने-अपने उम्मीदवार की बजाय NDA के अधिकृत उम्मीदवार को जिताने के लिए एक साथ मैदान में उतरेंगे। बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन ने नेताओं को डोर-टू-डोर कैंपेन का टास्क दिया है। टारगेट वोटर्स की पहचान कर उनसे संपर्क करने और मतदान के दिन तक उन्हें गठबंधन के पक्ष में बनाए रखने की रणनीति बनाई जा रही है। बैठक में यह भी स्पष्ट किया गया कि गठबंधन के उम्मीदवार के खिलाफ नामांकन करने वालों के मामले में पार्टी स्तर पर कार्रवाई हो सकती है।
विपक्ष के लिए 'ख्याली पुलाव' या NDA के लिए असली खतरा?
बैठक के बाद मंत्री रामकृपाल यादव ने दावा किया कि NDA एकजुट है और विपक्ष को एक भी सीट नहीं मिलने वाली। उन्होंने विपक्ष पर 'ख्याली पुलाव पकाने' का तंज भी कसा। वहीं JDU MLC नीरज कुमार ने बताया कि मुख्यमंत्री ने सभी 8 सीटों को जीतने का लक्ष्य सामने रखा है।यानी NDA नेतृत्व का संदेश बिल्कुल स्पष्ट है—बगावत हो या अंदरूनी नाराजगी, चुनावी मैदान में गठबंधन का उम्मीदवार ही अंतिम चेहरा होगा।लेकिन राजनीति में सिर्फ बैठक और निर्देश से वोट ट्रांसफर नहीं होते। असली परीक्षा बूथ और मतदाता के बीच होगी।पटना स्नातक सीट पर अनंत सिंह की खुली बगावत, सारण शिक्षक सीट पर सहयोगी दल की चुनौती और अलग-अलग सीटों पर संभावित वोट कटवा उम्मीदवार NDA के सामने असली परीक्षा हैं। अब देखना यह है कि मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी की अगुवाई में NDA इन अंदरूनी चुनौतियों को कितना जल्दी सुलझाता है। क्योंकि 8 सीटों पर जीत का लक्ष्य बैठक में तय हो चुका है, लेकिन उसे वोट में बदलने के लिए सबसे पहले गठबंधन के भीतर की दरार भरनी होगी।





