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Ashokdham Temple : 2019 में भी अशोकधाम में मची थी भगदड़, तब भी उठे थे सुरक्षा पर सवाल; 7 साल बाद फिर गई 7 जानें, क्या नहीं लिया सबक?

लखीसराय के अशोकधाम मंदिर में 2026 में भगदड़ से 7 महिला श्रद्धालुओं की मौत हुई। 2019 में भी यहां हादसा हुआ था। जानिए दोनों घटनाओं में क्या समानता रही और क्यों उठ रहे सुरक्षा व्यवस्था पर सवाल।

Ashokdham Temple : 2019 में भी अशोकधाम में मची थी भगदड़, तब भी उठे थे सुरक्षा पर सवाल; 7 साल बाद फिर गई 7 जानें, क्या नहीं लिया सबक?
Tejpratap
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लखीसराय: लखीसराय के प्रसिद्ध अशोकधाम मंदिर में सावन की सोमवारी पर हुई भीषण भगदड़ ने सात साल पुराने जख्म को फिर ताजा कर दिया है। 12 अगस्त 2019 को भी इसी मंदिर में सावन की अंतिम सोमवारी के दौरान भगदड़ जैसी स्थिति बनी थी। उस घटना में एक श्रद्धालु की मौत और कई लोगों के घायल होने की खबर सामने आई थी। उस समय भी मंदिर में भारी भीड़, धक्का-मुक्की, बैरिकेडिंग और भीड़ प्रबंधन को लेकर सवाल उठे थे। लेकिन 17 अगस्त 2026 को एक बार फिर अशोकधाम में भगदड़ हुई और इस बार सात महिला श्रद्धालुओं की मौत हो गई, जबकि 19 लोग घायल हुए हैं।

यानी सवाल सिर्फ आज के हादसे का नहीं है। सवाल यह भी है कि 2019 की घटना के बाद आखिर क्या बदला? क्या उससे कोई सबक लिया गया? और अगर लिया गया तो सात साल बाद उसी तरह की स्थिति दोबारा कैसे पैदा हो गई?

2019 में भी भीड़ हुई थी बेकाबू

12 अगस्त 2019 को सावन की अंतिम सोमवारी के मौके पर अशोकधाम मंदिर में हजारों श्रद्धालु पहुंचे थे। उस दौरान भी भीड़ अचानक बेकाबू हो गई और धक्का-मुक्की के बाद भगदड़ जैसी स्थिति बन गई थी। अलग-अलग रिपोर्टों में एक श्रद्धालु की मौत और कई लोगों के घायल होने की जानकारी सामने आई थी।उस समय पुलिस की ओर से बताया गया था कि भीड़ बेचैन होने लगी थी और श्रद्धालु आगे बढ़ने के लिए धक्का-मुक्की करने लगे थे। कुछ रिपोर्टों में बैरिकेडिंग पार करने और भीड़ प्रबंधन की समस्या का भी उल्लेख किया गया था। हादसे के बाद सबसे बड़ा सवाल यही था कि सावन की सोमवारी पर भारी भीड़ जुटने की जानकारी पहले से होने के बावजूद भीड़ को नियंत्रित करने के लिए पर्याप्त इंतजाम क्यों नहीं थे।

2019 के बाद भी चेतावनी साफ थी

अशोकधाम कोई ऐसा मंदिर नहीं है जहां अचानक भीड़ पहुंचती है। सावन की सोमवारी, महाशिवरात्रि और दूसरे बड़े धार्मिक अवसरों पर यहां बड़ी संख्या में श्रद्धालु आते हैं। वर्ष 2019 में ही सावन की दूसरी सोमवारी पर दो लाख से अधिक श्रद्धालुओं के जलाभिषेक करने की रिपोर्ट सामने आई थी। 

इसका मतलब साफ था कि प्रशासन के पास भीड़ के आकार का अंदाजा लगाने के लिए पर्याप्त अनुभव और आंकड़े मौजूद थे। 2019 की घटना भी एक चेतावनी थी कि अगर भीड़ को सही तरीके से नियंत्रित नहीं किया गया तो छोटी सी अफवाह या धक्का-मुक्की बड़ी दुर्घटना में बदल सकती है। इसके बावजूद 2026 में फिर वही स्थिति सामने आ गई।

2026 में क्या हुआ?

17 अगस्त 2026 को सावन की तीसरी सोमवारी पर सुबह से ही अशोकधाम मंदिर में श्रद्धालुओं की भारी भीड़ थी। जलाभिषेक के लिए लंबी कतारें लगी थीं। इसी दौरान बैरिकेडिंग के पास बिजली का पोल गिरने की घटना हुई या उसके गिरने की अफवाह फैली। इसके बाद भीड़ में करंट फैलने की बात तेजी से फैल गई और श्रद्धालुओं में दहशत पैदा हो गई।

प्रत्यक्षदर्शियों के मुताबिक लोग जान बचाने के लिए अचानक भागने लगे। भीड़ के दबाव में बैरिकेडिंग टूट गई और कई लोग जमीन पर गिर पड़े। पीछे से आ रही भीड़ के कारण लोगों को संभलने का मौका नहीं मिला। देखते ही देखते भगदड़ की स्थिति बन गई। इस हादसे में सात महिला श्रद्धालुओं की मौत हुई और 19 लोग घायल हुए। घटना की पुष्टि जिला प्रशासन की ओर से की गई है। 

वही भीड़, वही बैरिकेडिंग का सवाल

2019 और 2026 की घटनाओं में परिस्थितियां पूरी तरह एक जैसी नहीं थीं, लेकिन दोनों हादसों के बीच एक समानता जरूर दिखाई देती है—भारी भीड़ और उसे नियंत्रित करने की चुनौती। 2019 में भीड़ के दबाव और धक्का-मुक्की से भगदड़ जैसी स्थिति बनी थी। 2026 में बिजली के पोल को लेकर फैली अफवाह ने भीड़ को अचानक भागने पर मजबूर कर दिया। ऐसे हालात में मजबूत बैरिकेडिंग, अलग-अलग प्रवेश और निकास मार्ग, पर्याप्त पुलिस बल, मेडिकल टीम और प्रशिक्षित भीड़ प्रबंधन दल बेहद जरूरी होते हैं। यही वजह है कि अब यह सवाल गंभीर हो गया है कि इतने वर्षों में अशोकधाम की भीड़ प्रबंधन व्यवस्था कितनी मजबूत हुई?

सवालों के घेरे में सुरक्षा व्यवस्था

बड़े धार्मिक आयोजनों में प्रशासन को केवल श्रद्धालुओं की संख्या का अनुमान लगाना ही पर्याप्त नहीं होता। यह भी देखना पड़ता है कि किसी आपात स्थिति में भीड़ किस दिशा में जाएगी, निकास के रास्ते कितने खुले हैं और अफवाह फैलने पर लोगों को कैसे नियंत्रित किया जाएगा। आज के हादसे ने इन सभी सवालों को फिर सामने ला दिया है। खासकर तब, जब इस मंदिर में सात साल पहले भी ऐसी स्थिति बन चुकी थी।

2019 में एक जान गई थी, 2026 में सात जानें चली गईं। यही आंकड़ा अपने आप में बताता है कि अब केवल हादसे के बाद राहत और बचाव पर्याप्त नहीं है। जरूरी है कि घटना की पूरी जांच हो, जिम्मेदारी तय हो और अशोकधाम में स्थायी भीड़ प्रबंधन व्यवस्था लागू की जाए।

अब सिर्फ जांच नहीं, व्यवस्था बदलने की जरूरत

अशोकधाम हादसे के बाद प्रशासन के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही है कि भविष्य में ऐसी घटना दोबारा न हो। श्रद्धालुओं की संख्या, मंदिर तक पहुंचने वाले रास्ते, रेलवे हॉल्ट से आने वाली भीड़, बैरिकेडिंग, बिजली व्यवस्था, मेडिकल सुविधाएं और आपातकालीन निकास—हर पहलू की समीक्षा जरूरी है।क्योंकि 2019 की घटना एक चेतावनी थी और 2026 का हादसा उस चेतावनी की अनदेखी का गंभीर सवाल बनकर सामने खड़ा है। अब लोगों की नजर इस बात पर है कि इस बार जांच रिपोर्ट में क्या सामने आता है और क्या प्रशासन ऐसी व्यवस्था तैयार करता है, जिससे अगली सोमवारी पर श्रद्धालुओं की आस्था सुरक्षित रहे और किसी परिवार को अपने प्रियजन की मौत का मातम न मनाना पड़े।