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Bihar MLC Result : भीड़ अनंत के साथ, बाजी नीरज के हाथ! 8 MLC नतीजों में कहीं बागी भारी तो कहीं जातीय गणित फेल, NDA ने ऐसे बचाई अपनी पकड़

बिहार MLC चुनाव के नतीजों ने सिर्फ जीत-हार तय नहीं की, बल्कि सियासत के कई समीकरण भी खोल दिए। कहीं संगठन भारी पड़ा तो कहीं बागी उम्मीदवारों ने खेल बिगाड़ा। अनंत सिंह की रणनीति से लेकर जनसुराज की एंट्री तक, रिजल्ट ने कई संकेत दिए।

Bihar MLC Result : भीड़ अनंत के साथ, बाजी नीरज के हाथ! 8 MLC नतीजों में कहीं बागी भारी तो कहीं जातीय गणित फेल, NDA ने ऐसे बचाई अपनी पकड़
Tejpratap
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7 मिनट

Bihar MLC Result : बिहार विधान परिषद की 8 सीटों के नतीजों ने सिर्फ उम्मीदवारों की जीत-हार तय नहीं की है, बल्कि प्रदेश की राजनीति के कई समीकरण भी सामने ला दिए हैं। कहीं संगठन की ताकत भारी पड़ी, कहीं जातीय समीकरण बदले, तो कहीं बागी उम्मीदवारों ने बड़े दलों का पूरा गणित बिगाड़ दिया। सबसे दिलचस्प बात यह रही कि पटना से लेकर दरभंगा और सारण से लेकर कोसी तक हर सीट की कहानी अलग रही।


इन चुनावों के बाद विधान परिषद में वाम दल CPI का पूरी तरह सफाया हो गया, जबकि कांग्रेस भी सिर्फ एक सीट तक सिमट गई। दूसरी तरफ NDA ने कई सीटों पर अपनी पकड़ कायम रखी। हालांकि विपक्ष के लिए पूरी तस्वीर निराशाजनक नहीं रही। जनसुराज ने भी अपनी मौजूदगी दर्ज कराई और खासकर शिक्षित मतदाताओं के बीच अपनी स्वीकार्यता का संकेत दिया।


पटना स्नातक सीट का मुकाबला सबसे ज्यादा चर्चा में रहा। यहां जेडीयू के मौजूदा MLC नीरज कुमार के सामने जनसुराज के डॉ. अनुज सिंह मैदान में थे। अनुज को मोकामा विधायक अनंत सिंह का खुला समर्थन मिला। चुनाव प्रचार के दौरान अनंत सिंह ने जिस तरह अनुज के पक्ष में मोर्चा संभाला, उससे मुकाबला केवल दो उम्मीदवारों की लड़ाई नहीं रह गया था। इसे जेडीयू के भीतर शक्ति प्रदर्शन से जोड़कर भी देखा जाने लगा। अनंत सिंह के रोड शो और जनसभाओं में भीड़ खूब दिखी, लेकिन नतीजों ने एक अलग कहानी सुनाई। जमीन पर जुटी भीड़ वोट में उसी अनुपात में नहीं बदल सकी। लगातार तीन बार MLC रह चुके नीरज कुमार का अपना संगठनात्मक नेटवर्क और क्षेत्र में तैयार वोट बैंक उनके काम आया। इसके साथ ही जेडीयू ने भी पूरी ताकत झोंक दी।


इस चुनाव में निशांत कुमार की सक्रियता भी खास चर्चा में रही। उन्होंने पटना स्नातक क्षेत्र के तीनों जिलों के नेताओं के साथ अलग-अलग बैठकें कीं और वोटों को बूथ स्तर तक मैनेज करने की रणनीति पर काम किया। नालंदा में लगातार कैंपेनिंग ने भी जेडीयू के पक्ष में माहौल बनाने में भूमिका निभाई। मतदान से ठीक पहले नीरज कुमार की तबीयत बिगड़ने और नीतीश कुमार के उनसे मिलने पहुंचने के बाद कुर्मी वोटों के बिखराव को लेकर जो आशंका थी, वह भी काफी हद तक खत्म होती दिखाई दी।


तिरहुत स्नातक सीट पर कहानी कुछ और रही। यहां अभिषेक झा को लगातार दूसरी बार हार का सामना करना पड़ा। क्षेत्र में देवेश चंद्र ठाकुर से जुड़ी नाराजगी और आनंद मोहन की चुपचाप सक्रियता को भी जेडीयू के कमजोर प्रदर्शन से जोड़कर देखा गया। वहीं बंशीधर ब्रजवासी के खिलाफ वोटों का बिखराव उनकी जीत का रास्ता साफ करने में मददगार साबित हुआ। पिछड़ा वोट एकजुट होने और विरोधी उम्मीदवारों के बीच सवर्ण वोट बंटने से पूरा समीकरण बदल गया।


जबकि, दरभंगा स्नातक सीट पर बीजेपी के सर्वेश कुमार ने अपनी लोकप्रियता और संगठन दोनों का फायदा उठाया। पहले पार्टी से बागी होकर जीत चुके सर्वेश इस बार बीजेपी में लौटकर मैदान में थे। उनके सामने RJD के अनिल झा और जनसुराज के डॉ. मो. इम्तियाज थे। मुकाबले को त्रिकोणीय बनाने की कोशिश हुई, लेकिन संगठनात्मक मजबूती और अपने पारंपरिक वोटरों के सहारे सर्वेश आगे निकल गए। वहीं, कोसी स्नातक सीट पर बीजेपी के एनके यादव ने सबसे बड़ी जीत दर्ज की। उन्होंने RJD के नितेश को 11 हजार से ज्यादा वोटों से हराया। विशाल भौगोलिक क्षेत्र वाली इस सीट पर NDA का मजबूत संगठन और विधानसभा स्तर तक नेताओं की सक्रियता निर्णायक रही। जनसुराज ने राजपूत चेहरे को उतारकर मुकाबला बदलने की कोशिश की, लेकिन वह प्रभाव सीमित इलाकों तक ही रह गया।


इन नतीजों का एक बड़ा संदेश यह है कि शिक्षित मतदाताओं के बीच NDA की पकड़ पूरी तरह कमजोर नहीं हुई है। हालिया राजनीतिक झटकों के बाद MLC चुनाव को सरकार और संगठन के लिए प्रतिष्ठा से जोड़कर देखा जा रहा था। बीजेपी पटना शिक्षक सीट नहीं बचा सकी, लेकिन तिरहुत शिक्षक में वापसी और जेडीयू द्वारा पटना स्नातक सीट बचाने से NDA ने कई मोर्चों पर संतुलन कायम रखा।विपक्ष के लिए सबसे बड़ा संदेश उसकी बिखरी हुई रणनीति है। अलग-अलग दलों ने कई सीटों पर एक-दूसरे के खिलाफ उम्मीदवार उतारे। इसका सीधा फायदा NDA को मिला। CPI विधान परिषद से बाहर हो गई और कांग्रेस भी अपनी पुरानी स्थिति बरकरार नहीं रख सकी। ऐसे में आने वाले चुनावों में विपक्षी एकता एक बड़ा सवाल बनने वाली है।


हालांकि जनसुराज के लिए तस्वीर पूरी तरह खराब नहीं रही। विधानसभा चुनाव में कमजोर प्रदर्शन के बाद पार्टी ने MLC चुनाव में लगभग हर सीट पर अपनी मौजूदगी दर्ज कराई। दरभंगा शिक्षक सीट जीतकर उसने विधान परिषद में प्रवेश किया। यानी सीटों की संख्या भले कम रही हो, लेकिन प्रशांत किशोर की पार्टी ने यह संकेत जरूर दिया है कि वह बिहार की राजनीति में अपनी जगह बनाने की कोशिश जारी रखे हुए है।


शिक्षक सीटों के नतीजे तो और भी ज्यादा दिलचस्प रहे। पटना शिक्षक सीट पर लंबे समय से कायम राजनीतिक समीकरण टूट गया। डॉ. संजीव कुमार ने नवल किशोर यादव को हराकर करीब तीन दशक बाद इस सीट पर भूमिहार चेहरे की वापसी कराई। पहली वरीयता में पीछे रहने के बावजूद दूसरी वरीयता के वोटों ने पूरा खेल पलट दिया। सारण शिक्षक सीट पर निर्दलीय राहुल राज ने NDA और विपक्ष दोनों को चौंका दिया। पहली वरीयता में बढ़त और दूसरी वरीयता के वोटों के बाद उन्होंने जीत हासिल की। स्थानीय राजनीति, राजपूत वोटों का समीकरण और BJP के स्थानीय समर्थकों का समर्थन उनके पक्ष में जाता दिखा। दूसरी तरफ NDA के उम्मीदवार पुष्कर आनंद को संगठन का जमीनी समर्थन अपेक्षित स्तर पर नहीं मिल सका।


सबसे बड़ा उलटफेर दरभंगा शिक्षक सीट पर हुआ, जहां जनसुराज के डॉ. सुरेश प्रसाद राय ने कांग्रेस के मदन मोहन झा को हरा दिया। सुरेश राय पहले बीजेपी से चुनाव लड़ चुके थे और चुनाव से कुछ दिन पहले जनसुराज में शामिल हुए थे। सीटों की अदला-बदली, कमजोर उम्मीदवार चयन और स्थानीय नाराजगी ने उन्हें बड़ा फायदा पहुंचाया।


कुल मिलाकर MLC चुनाव के नतीजे तीन बड़े संकेत देते हैं। पहला, NDA का संगठन अभी भी मजबूत है और उसके पारंपरिक वोट बैंक को पूरी तरह चुनौती देना आसान नहीं है। दूसरा, विपक्ष के बिखराव ने उसकी संभावनाओं को कमजोर किया है। तीसरा, जनसुराज धीरे-धीरे शिक्षित और राजनीतिक रूप से सक्रिय मतदाताओं के बीच अपनी जगह तलाश रहा है।यानी विधान परिषद की 8 सीटों का चुनाव भले खत्म हो गया हो, लेकिन इसके नतीजों से बिहार की अगली बड़ी राजनीतिक लड़ाई की कई पटकथा अभी से लिखती दिखाई दे रही हैं।