ब्रेकिंग
Neeraj Kumar Victory: कभी अनंत सिंह ने दिलाया था टिकट, अब उन्हीं के विरोध के बावजूद चौथी बार जीते नीरज✦विक्रमशिला एक्सप्रेस के समय में बदलाव... अब इतनी देरी से पहुंचेगी दिल्ली, जानें नया शेड्यूल✦Lakhisarai ROB : लखीसराय ROB में बड़ा खेल? IIT की जांच में गर्डर में दरार और सरिया में जंग, निर्माण एजेंसी 15 साल के लिए ब्लैकलिस्ट✦बिहार में ट्रक ने ऑटो को मारी जोरदार टक्कर... मां-बेटे समेत 4 की मौत, गैस कटर से काटकर निकाले गए लोग✦Bihar BJP : आखिर अपने ही गढ़ में बार-बार क्यों पिट रही भाजपा? पहले बांकीपुर, अब पटना शिक्षक MLC सीट भी हाथ से गई✦Neeraj Kumar Victory: कभी अनंत सिंह ने दिलाया था टिकट, अब उन्हीं के विरोध के बावजूद चौथी बार जीते नीरज✦विक्रमशिला एक्सप्रेस के समय में बदलाव... अब इतनी देरी से पहुंचेगी दिल्ली, जानें नया शेड्यूल✦Lakhisarai ROB : लखीसराय ROB में बड़ा खेल? IIT की जांच में गर्डर में दरार और सरिया में जंग, निर्माण एजेंसी 15 साल के लिए ब्लैकलिस्ट✦बिहार में ट्रक ने ऑटो को मारी जोरदार टक्कर... मां-बेटे समेत 4 की मौत, गैस कटर से काटकर निकाले गए लोग✦Bihar BJP : आखिर अपने ही गढ़ में बार-बार क्यों पिट रही भाजपा? पहले बांकीपुर, अब पटना शिक्षक MLC सीट भी हाथ से गई

Bihar BJP : आखिर अपने ही गढ़ में बार-बार क्यों पिट रही भाजपा? पहले बांकीपुर, अब पटना शिक्षक MLC सीट भी हाथ से गई

बिहार में सत्ता और संगठन की कमान BJP के पास है, लेकिन अपने मजबूत माने जाने वाले इलाकों में पार्टी को लगातार झटके मिल रहे हैं। बांकीपुर के बाद पटना शिक्षक MLC सीट पर नवल किशोर यादव की हार ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं।

Bihar BJP : आखिर अपने ही गढ़ में बार-बार क्यों पिट रही भाजपा? पहले बांकीपुर, अब पटना शिक्षक MLC सीट भी हाथ से गई
Tejpratap
Tejpratap
9 मिनट

Bihar BJP : सत्ता भाजपा के पास, मुख्यमंत्री की कुर्सी भाजपा के पास, संगठन की कमान भी बिहार के नेता के हाथ में, फिर अपने ही गढ़ में चुनाव जीतने के लाले क्यों? बांकीपुर के बाद पटना शिक्षक MLC सीट पर हार ने पार्टी की रणनीति, नेतृत्व और कोर वोट बैंक पर यह गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। दरअसल,  बिहार में भारतीय जनता पार्टी सत्ता के शीर्ष पर बैठी है। शीर्ष कुर्सी भी पार्टी के पास है और भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन का गृह राज्य भी बिहार ही है। इसके बावजूद पार्टी को उन सीटों पर हार का सामना करना पड़ रहा है, जिन्हें कभी उसका सबसे सुरक्षित चुनावी किला माना जाता था। सवाल यह है कि जब सत्ता भी अपने पास है, संगठन भी मजबूत होने का दावा करता है और चुनावी समीकरण भी अनुकूल बताए जाते हैं, तो फिर नतीजे भाजपा के पक्ष में क्यों नहीं आ रहे हैं?


बांकीपुर में मिली हार के बाद अब पटना शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र की MLC सीट गंवाना भाजपा के लिए महज एक चुनावी झटका नहीं है। यह पार्टी की रणनीति, उम्मीदवार चयन और अपने परंपरागत समर्थकों के बीच उसकी पकड़ की परीक्षा भी है। लगातार पांच बार जीत दर्ज करने वाले नवल किशोर यादव की हार ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि - क्या भाजपा का मजबूत गढ़ अब उसके लिए कमजोर पड़ने लगा है? 


मालूम हो कि, भाजपा की राजनीति लंबे समय से शहरी क्षेत्रों और अपने परंपरागत समर्थक वर्गों में मजबूत पकड़ के दावे पर टिकी रही है। पटना जैसे इलाके में पार्टी को अपेक्षाकृत मजबूत स्थिति में माना जाता है। ऐसे में यहां हार का मतलब सिर्फ एक सीट का नुकसान नहीं है, बल्कि यह समझने की जरूरत है कि पार्टी के चुनावी गणित में आखिर गड़बड़ी कहां हो रही है। इसके बाद सवाल यह कि - क्या भाजपा के रणनीतिकार जमीनी नाराजगी को समझने में नाकाम हो रहे हैं? क्या पार्टी का भरोसा अपने पुराने चुनावी समीकरणों पर जरूरत से ज्यादा बढ़ गया है? या फिर उम्मीदवार चयन और स्थानीय मुद्दों को लेकर ऐसी गलतियां हो रही हैं, जिनकी कीमत चुनाव में चुकानी पड़ रही है? इन सवालों का जवाब भाजपा को खुद तलाशना होगा। क्योंकि चुनाव में सिर्फ सत्ता का प्रभाव और संगठन की ताकत ही काम नहीं आती, मतदाताओं का भरोसा भी जीतना पड़ता है।


जानकारी हो कि, भाजपा के लिए बांकीपुर विधानसभा क्षेत्र या पटना शिक्षक निर्वाचन सीट इन दोनों की राजनीतिक अहमियत किसी से छिपी नहीं है। यह सीट लंबे समय से पार्टी के मजबूत प्रभाव वाले इलाकों में गिनी जाती रही है। बांकीपुर विधानसभा के लिए नितिन नवीन यहां से लगातार चुनाव जीतते रहे थे। लेकिन उनके राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने और राज्यसभा जाने के बाद सीट खाली हुई तो उपचुनाव में भाजपा को अपनी रणनीति नए सिरे से बनानी पड़ी। इस चुनाव में उम्मीदवार को लेकर पार्टी की रणनीति भी चर्चा में रही। पहले अभिषेक के नाम पर चर्चा हुई, लेकिन बाद में अंतिम समय में उम्मीदवार बदलकर नीरज को टिकट दिया गया। इसके बावजूद भाजपा को जीत नहीं मिली।


ऐसे में  इस हार ने उम्मीदवार चयन और संगठन के भीतर चुनावी तैयारी को लेकर सवाल खड़े किए। इसके साथ ही साथ पार्टी के समर्थक वर्गों में नाराजगी की चर्चाएं भी सामने आईं। UGC कानून को लेकर सवर्ण समाज के एक हिस्से में असंतोष की अटकलों ने भी राजनीतिक बहस को हवा दी। हालांकि, इस नाराजगी को हार का निर्णायक कारण मानने के लिए ठोस चुनावी आंकड़ों की जरूरत होगी। लेकिन इतना साफ है कि जिस सीट को भाजपा अपनी मजबूत पकड़ का उदाहरण बताती रही, वहां हार ने पार्टी के आत्मविश्वास को जरूर चुनौती दी।


इधर, बांकीपुर की हार के बाद पटना शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र का नतीजा भाजपा के लिए दूसरा बड़ा झटका बनकर सामने आया है। यहां पार्टी के मौजूदा MLC नवल किशोर यादव को राष्ट्रीय जनता दल के उम्मीदवार डॉ. संजीव कुमार ने 1,058 वोटों से हरा दिया। नवल किशोर यादव का इस सीट पर करीब तीन दशक से दबदबा रहा था। उन्होंने 1996 में पहली बार जीत दर्ज की थी। इसके बाद 2002, 2008, 2014 और 2020 में भी लगातार जीत हासिल की। इस तरह पांच बार लगातार जीत दर्ज करने वाले नवल किशोर यादव को 2026 में हार का सामना करना पड़ा।


यह वही सीट थी, जहां भाजपा अपने पुराने जनाधार और नवल किशोर यादव के साथ ही साथ संगठन के प्रभाव के भरोसे मजबूत स्थिति में मानी जाती थी। लेकिन इस बार मतदाताओं ने ऐसा फैसला सुनाया कि पार्टी के पुराने चुनावी गणित पर सवाल उठने लगे। चुनाव परिणाम से पहले नवल किशोर यादव अपनी जीत को लेकर आश्वस्त नजर आ रहे थे। मतगणना केंद्र के बाहर बैंड-बाजे और घोड़े-ऊंट के साथ जश्न की तैयारी की चर्चा भी रही। लेकिन चुनावी मैदान में जीत की घोषणा से पहले जश्न की तैयारी करना कितना जोखिम भरा हो सकता है, इसका एहसास नतीजे आने के बाद हुआ।


मतगणना पूरी हुई तो जीत का सेहरा भाजपा के उम्मीदवार के बजाय राजद के डॉ. संजीव कुमार के सिर बंधा। नवल किशोर यादव का किला ढह गया और भाजपा को उस सीट पर हार मिली, जहां पार्टी लगातार जीत की उम्मीद लगाए बैठी थी। राजनीति में पुराने रिकॉर्ड भविष्य की जीत की गारंटी नहीं होते। पांच बार की जीत भी छठी जीत सुनिश्चित नहीं कर सकी। यही इस चुनाव का सबसे बड़ा संदेश है।


पटना शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र में पटना, नवादा और नालंदा जिले के मतदाता शामिल थे। इस चुनाव में कुल 11,720 मतदाता थे, जिनमें से 8,758 शिक्षकों ने मतदान किया। मतगणना के दौरान 2,658 वोट खारिज हुए और 8,490 मत वैध पाए गए।जीत के लिए निर्धारित कोटा 4,246 वोट था। राजद उम्मीदवार डॉ. संजीव कुमार ने 4,487 वोट हासिल कर जीत दर्ज की और भाजपा के निवर्तमान MLC नवल किशोर यादव को 1,058 मतों से शिकस्त दी। ये आंकड़े बताते हैं कि शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र में मुकाबला केवल राजनीतिक दलों की प्रतिष्ठा का नहीं था। यहां मतदाताओं के फैसले ने तीन दशक से कायम एक मजबूत राजनीतिक पकड़ को भी चुनौती दे दी।


अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या बांकीपुर और पटना शिक्षक सीट के नतीजों को अलग-अलग घटनाएं मानकर भाजपा नजरअंदाज कर सकती है? या फिर इन नतीजों में कोई ऐसा संकेत छिपा है, जिसे पार्टी को गंभीरता से समझना चाहिए? बांकीपुर में उम्मीदवार चयन को लेकर उठे सवाल और पटना शिक्षक सीट पर पांच बार के MLC की हार, दोनों ही घटनाएं पार्टी के लिए आत्ममंथन का मौका हैं। हालांकि, दोनों चुनावों की प्रकृति और मतदाता वर्ग अलग हैं, लेकिन भाजपा का संगठन की पहचान की इसी तरह से चुनावी रणनीति को लेकर रही है। फिर भी दोनों जगह हार ने भाजपा के मजबूत गढ़ की धारणा को जरूर चुनौती दी है।अगर पार्टी यह मानकर चलती रही कि शहरी सीटों और परंपरागत समर्थक वर्गों में उसका प्रभाव अपने आप वोट में बदल जाएगा, तो उसे आगे भी अप्रत्याशित नतीजों का सामना करना पड़ सकता है।


बहरहाल, बिहार में सत्ता की ताकत होने के बावजूद भाजपा को अपने ही मजबूत माने जाने वाले इलाकों में हार क्यों मिल रही है? क्या पार्टी का संगठन जमीनी नाराजगी को समय रहते पहचान नहीं पा रहा? क्या टिकट वितरण और चुनावी प्रबंधन में ऐसी गलतियां हो रही हैं, जिन्हें नेतृत्व नजरअंदाज कर रहा है? या फिर मतदाता अब पुराने राजनीतिक समीकरणों से आगे बढ़कर नए विकल्प तलाश रहे हैं? इन सवालों के जवाब केवल बयानबाजी से नहीं मिलेंगे। भाजपा को अपने चुनावी प्रदर्शन की समीक्षा करनी होगी और यह समझना होगा कि आखिर उन सीटों पर भी मतदाता उससे दूर क्यों जा रहे हैं, जहां जीत को कभी लगभग तय माना जाता था।


बांकीपुर से पटना शिक्षक MLC सीट तक के नतीजे भाजपा को एक ही संदेश दे रहे हैं—गढ़ कितना भी मजबूत क्यों न हो, उसे बचाने के लिए जनता का भरोसा बनाए रखना पड़ता है। सत्ता में होना और चुनाव जीतना दो अलग-अलग बातें हैं। अब देखना यह है कि भाजपा इन झटकों से सबक लेती है या अपने पुराने चुनावी गणित के भरोसे आगे भी मैदान में उतरती है।