Lakhisarai ROB : लखीसराय बाइपास स्थित रेल ओवर ब्रिज (ROB) को देखकर शायद किसी को अंदाजा भी न हो कि जिस पुल से रोजाना लोग और वाहन गुजरते हैं, उसकी मजबूती को लेकर इतनी गंभीर चिंता सामने आ चुकी है। लेकिन सूचना के अधिकार (RTI) के तहत सामने आए दस्तावेजों ने इस पुल के निर्माण की गुणवत्ता पर बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है। भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (IIT) पटना की तकनीकी जांच में पुल के गर्डरों में कई जगह गंभीर दरारें मिलीं। इतना ही नहीं, पुल में इस्तेमाल किए गए PTFE बेयरिंग और सुदृढ़ीकरण के लिए लगाए गए सरियों में भी जंग के संकेत मिले हैं।
मामला सामने आने के बाद पथ निर्माण विभाग ने निर्माण एजेंसी बाबा हंस कंस्ट्रक्शन प्राइवेट लिमिटेड के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की। विभाग ने कंपनी को 15 वर्षों के लिए ब्लैकलिस्ट कर दिया। सवाल सिर्फ इतना नहीं है कि निर्माण एजेंसी पर कार्रवाई क्यों हुई, बल्कि बड़ा सवाल यह है कि आखिर निर्माण पूरा होने के महज छह साल के भीतर पुल की संरचनात्मक स्थिति इतनी चिंताजनक कैसे हो गई?
गर्डरों में एक के बाद एक दरार, IIT की रिपोर्ट ने बढ़ाई चिंता
RTI के जरिए प्राप्त विभागीय दस्तावेजों के मुताबिक, IIT पटना की उच्चस्तरीय तकनीकी जांच में ROB के अधिकांश गर्डरों में एक-दूसरे के काफी नजदीक कई दरारें पाई गईं। जांच में पुल के PTFE बेयरिंग और सुदृढ़ीकरण के लिए इस्तेमाल किए गए सरियों में भी जंग पाए जाने की बात सामने आई।
ये महज सतही खामियां नहीं मानी गईं। IIT पटना ने अपनी रिपोर्ट में इन कमियों को पुल की Structural Safety के लिहाज से अत्यंत चिंताजनक बताया। यानी मामला केवल पुल की खूबसूरती या मामूली टूट-फूट का नहीं, बल्कि उसकी संरचनात्मक मजबूती से जुड़ा हुआ है। तकनीकी जांच के बाद IIT पटना ने विस्तृत जांच और जरूरी मरम्मत या पुनर्निर्माण पूरा होने तक पुल पर भारी वाहनों की आवाजाही को तत्काल सीमित करने की सिफारिश भी की थी।
छह साल में ही खुल गई निर्माण की परतें
लखीसराय ROB का निर्माण कार्य 31 मार्च 2020 को पूरा हुआ था। ऐसे में निर्माण पूरा होने के लगभग छह साल के भीतर गर्डरों में दरार, बेयरिंग में खराबी और सरियों में जंग जैसी गंभीर कमियां सामने आना कई सवाल खड़े करता है।सबसे बड़ा सवाल निर्माण सामग्री की गुणवत्ता को लेकर है। इसके साथ ही पुल निर्माण के दौरान गुणवत्ता जांच, तकनीकी निगरानी और संबंधित अभियंताओं की भूमिका भी सवालों के घेरे में आ जाती है।
आखिर जिस पुल का निर्माण पूरा होने के बाद नियमित रूप से इस्तेमाल होना था, उसकी संरचनात्मक स्थिति इतनी जल्दी खराब कैसे हुई? क्या निर्माण के दौरान गुणवत्ता मानकों का सही तरीके से पालन हुआ था? क्या समय-समय पर इसकी तकनीकी जांच की गई? और अगर जांच हुई तो ये खामियां पहले क्यों नहीं पकड़ी गईं?
पहले अनुशंसा, फिर नोटिस और आखिर में 15 साल का प्रतिबंध
विभागीय दस्तावेजों के अनुसार, मामले में कार्रवाई की प्रक्रिया भी सामने आई है। मुख्य अभियंता (दक्षिण) ने 18 मई 2026 को निर्माण एजेंसी को काली सूची में डालने की अनुशंसा की थी।इसके बाद पथ निर्माण विभाग ने 1 जून 2026 को बाबा हंस कंस्ट्रक्शन प्राइवेट लिमिटेड को कारण बताओ नोटिस जारी किया। एजेंसी ने 8 जून को अपना स्पष्टीकरण विभाग के सामने प्रस्तुत किया, लेकिन विभाग ने उसे संतोषजनक नहीं माना।इसके बाद 13 जून 2026 को पथ निर्माण विभाग ने निर्माण एजेंसी को 15 वर्षों के लिए ब्लैकलिस्ट करने का आधिकारिक आदेश जारी कर दिया। 15 साल का प्रतिबंध अपने आप में कार्रवाई की गंभीरता को दिखाता है। हालांकि, एजेंसी पर कार्रवाई होने के बाद अब असली चिंता पुल की सुरक्षा को लेकर है।
एजेंसी पर कार्रवाई हुई, लेकिन पुल का क्या?
RTI के जरिए दस्तावेज सामने आने के बाद यह तो स्पष्ट हो गया कि निर्माण एजेंसी के खिलाफ विभाग ने कठोर कदम उठाया है। लेकिन स्थानीय लोगों के लिए सबसे अहम सवाल अभी भी यही है—पुल की मरम्मत कब होगी और तब तक उसकी सुरक्षा कैसे सुनिश्चित की जाएगी? IIT पटना की रिपोर्ट में भारी वाहनों की आवाजाही सीमित करने की सिफारिश की गई थी। ऐसे में पुल की वर्तमान स्थिति, यातायात व्यवस्था और जरूरी मरम्मत को लेकर विभाग की स्पष्ट कार्ययोजना बेहद महत्वपूर्ण हो जाती है।
किसी निर्माण एजेंसी को ब्लैकलिस्ट करना निश्चित तौर पर जवाबदेही तय करने की दिशा में बड़ा कदम है, लेकिन इससे पुल की समस्या अपने आप खत्म नहीं होती। पुल को सुरक्षित बनाना, जरूरी तकनीकी सुधार कराना और आम लोगों की आवाजाही को सुरक्षित रखना उससे भी बड़ी जिम्मेदारी है।
लखीसराय के इस ROB की कहानी अब सिर्फ एक पुल की खराब गुणवत्ता की कहानी नहीं रह गई है। यह सरकारी निर्माण कार्यों में गुणवत्ता, निगरानी और जवाबदेही की पूरी व्यवस्था पर सवाल खड़ा करती है। छह साल में सामने आईं ये तकनीकी खामियां इस बात की पड़ताल भी जरूरी बनाती हैं कि गलती आखिर निर्माण के स्तर पर हुई, निगरानी में हुई या फिर गुणवत्ता जांच की पूरी प्रक्रिया ही कहीं कमजोर रह गई।





