पटना: बिहार की राजनीति में मोकामा विधायक अनंत सिंह को लेकर बड़ा उलटफेर हो गया है। विधान परिषद चुनाव में JDU के उम्मीदवार नीरज कुमार के खिलाफ खुलकर मोर्चा लेने वाले अनंत सिंह पर आखिरकार पार्टी ने कार्रवाई कर दी। 23 अक्टूबर को MLC चुनाव के लिए मतदान हुआ और ठीक अगले दिन यानी 24 अक्टूबर को JDU ने अनंत सिंह को पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा दिया।
सिर्फ अनंत सिंह ही नहीं, उनकी पत्नी और पूर्व विधायक नीलम देवी की भी पार्टी सदस्यता खत्म कर दी गई है। इसके साथ ही JDU प्रदेश अध्यक्ष उमेश कुशवाहा की ओर से विधानसभा अध्यक्ष से अनंत सिंह की विधानसभा सदस्यता समाप्त करने की अनुशंसा भी की गई है।
यहीं से मामला और बड़ा हो जाता है। सवाल अब सिर्फ इतना नहीं है कि अनंत सिंह JDU में रहेंगे या नहीं। असली सवाल यह है कि क्या पार्टी से निकाले जाने के बाद उनकी मोकामा विधायक की कुर्सी भी जा सकती है? और अगर ऐसा हुआ तो फैसला कौन करेगा?आइए, पूरे घटनाक्रम को सिलसिलेवार समझते हैं।
कहानी की शुरुआत नीरज कुमार के विरोध से हुई
दरअसल, बिहार विधान परिषद की पटना स्नातक सीट के चुनाव में JDU ने अपने मौजूदा MLC नीरज कुमार को उम्मीदवार बनाया था। दूसरी तरफ जनसुराज समर्थित प्रत्याशी अनुज सिंह मैदान में थे और मोकामा विधायक अनंत सिंह खुलकर अनुज सिंह के समर्थन में उतर गए।अनंत सिंह का यह रुख JDU नेतृत्व को लगातार असहज करता रहा। उन्होंने कई मौकों पर पार्टी के उम्मीदवार नीरज कुमार के खिलाफ बयान दिए और उनके समर्थन में प्रचार भी किया। यही नहीं, मामला धीरे-धीरे नीरज कुमार और अनंत सिंह के व्यक्तिगत राजनीतिक टकराव से निकलकर पार्टी नेतृत्व तक पहुंच गया।
निशांत कुमार पर टिप्पणी के बाद बढ़ी नाराजगी
सूत्रों के मुताबिक, अनंत सिंह के एक बयान से नीतीश कुमार के बेटे और स्वास्थ्य मंत्री निशांत कुमार भी नाराज हुए थे।अनंत सिंह ने सवाल उठाया था कि निशांत कुमार को MLC चुनाव के प्रचार में जाने की जरूरत नहीं थी। उनका कहना था कि यह छोटा चुनाव है और इसे पार्टी के बड़े चुनाव की तरह नहीं देखा जाना चाहिए।बताया जाता है कि इस बयान के बाद निशांत कुमार ने पार्टी के शीर्ष नेतृत्व के सामने अपनी नाराजगी जाहिर की थी। इसके बाद अनंत सिंह के खिलाफ कार्रवाई को लेकर चर्चा और तेज हो गई।
फिर नीतीश कुमार को लेकर बयान से बढ़ा विवाद
अनंत सिंह का हमला सिर्फ निशांत कुमार तक सीमित नहीं रहा। उन्होंने पूर्व मुख्यमंत्री और JDU के राष्ट्रीय अध्यक्ष नीतीश कुमार को लेकर भी कई तीखे बयान दिए।अनंत सिंह ने अपने राजनीतिक संघर्ष का जिक्र करते हुए कहा था कि उन्होंने पार्टी के लिए काफी कुर्बानी दी है। उन्होंने यह भी दावा किया कि नीतीश कुमार की वजह से उन्हें राजनीतिक और व्यक्तिगत नुकसान झेलना पड़ा और उनके ऊपर गोली चली तथा कई लोगों की हत्या हुई।अनंत सिंह के इस बयान को पार्टी नेतृत्व ने गंभीरता से लिया। क्योंकि अब विवाद किसी स्थानीय उम्मीदवार तक सीमित नहीं था, बल्कि पार्टी के शीर्ष नेतृत्व तक पहुंच चुका था।
ललन सिंह को सौंपी गई थी सुलह की जिम्मेदारी
विवाद बढ़ने के बाद JDU नेतृत्व ने मामले को संभालने की कोशिश भी की थी। पार्टी के राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष संजय झा की ओर से वरिष्ठ नेता और केंद्रीय मंत्री ललन सिंह को अनंत सिंह और नीरज कुमार के बीच विवाद खत्म कराने की जिम्मेदारी दी गई।ललन सिंह ने उस समय अनंत सिंह का बचाव करते हुए यह तक कहा था कि गलती दोनों तरफ से हुई है। उन्होंने साफ शब्दों में कहा था कि ताली एक हाथ से नहीं बजती।बताया गया कि ललन सिंह ने अनंत सिंह से बातचीत की और उन्हें पार्टी लाइन के खिलाफ बयानबाजी नहीं करने के लिए समझाया।लेकिन इसके बाद भी विवाद पूरी तरह खत्म नहीं हुआ।
समझाने के बाद भी नहीं रुके अनंत सिंह
ललन सिंह की कोशिश के बावजूद अनंत सिंह लगातार जनसुराज समर्थित प्रत्याशी अनुज सिंह के समर्थन में सक्रिय रहे। उन्होंने रोड शो और जनसंपर्क कार्यक्रमों में हिस्सा लिया।इस दौरान उनके निशाने पर JDU नेतृत्व और नीरज कुमार भी रहे।23 अक्टूबर को मतदान के दिन भी अनंत सिंह का रुख बदला नहीं। उन्होंने ललन सिंह को लेकर भी तंज कसा और यहां तक कहा कि वह उन्हें नहीं जानते। साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि वह चाहते हैं कि JDU उनके खिलाफ कार्रवाई करे।यानी जिस कार्रवाई की संभावना कई दिनों से जताई जा रही थी, उसे लेकर अनंत सिंह खुद भी चुनौती देने के अंदाज में दिखाई दिए।
24 अक्टूबर को पटना पहुंचे ललन सिंह, फिर बनी बात
MLC चुनाव का मतदान खत्म होने के अगले दिन 24 अक्टूबर को केंद्रीय मंत्री ललन सिंह दिल्ली से पटना पहुंचे। इसके बाद उन्होंने JDU के राष्ट्रीय अध्यक्ष नीतीश कुमार से मुलाकात की।दोनों नेताओं के बीच करीब 20 मिनट तक बातचीत हुई। इसके बाद अनंत सिंह के खिलाफ कार्रवाई को लेकर अंतिम सहमति बनने की बात सामने आई।शाम होते-होते JDU प्रदेश अध्यक्ष उमेश कुशवाहा ने कार्रवाई का ऐलान कर दिया।यानी जिस फैसले की चर्चा कई दिनों से राजनीतिक गलियारों में चल रही थी, वह MLC चुनाव खत्म होते ही जमीन पर उतर गया।
चुनाव तक क्यों रोकी गई कार्रवाई?
अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि अगर अनंत सिंह के खिलाफ कार्रवाई का फैसला पहले ही हो चुका था, तो उन्हें चुनाव तक पार्टी से बाहर क्यों नहीं किया गया?सूत्रों के मुताबिक, नेतृत्व को आशंका थी कि अगर चुनाव के बीच अनंत सिंह पर कार्रवाई की जाती है तो इसका राजनीतिक फायदा अनुज सिंह को मिल सकता है।अनंत सिंह के समर्थकों में सहानुभूति पैदा हो सकती थी और उसका असर पटना स्नातक सीट के चुनाव परिणाम पर पड़ सकता था।इसी वजह से कार्रवाई को मतदान तक रोककर रखने की रणनीति अपनाई गई। जैसे ही 23 अक्टूबर को मतदान खत्म हुआ, अगले ही दिन पार्टी ने कार्रवाई कर दी।
अनंत सिंह के घर बन रही थी मिठाई, तभी आ गया JDU का फैसला
इस पूरी कहानी का सबसे दिलचस्प पहलू यह रहा कि 24 अक्टूबर को अनंत सिंह के आवास पर समर्थकों के लिए मिठाई तैयार की जा रही थी।अनंत सिंह पहले ही दावा कर चुके थे कि अनुज सिंह की जीत तय है और सिर्फ औपचारिक रूप से मतगणना का इंतजार है।इसी माहौल के बीच शाम को JDU ने उन्हें पार्टी से बाहर करने का फैसला सुना दिया।एक तरफ अनंत सिंह समर्थक जीत का जश्न मनाने की तैयारी में थे, दूसरी तरफ उनके राजनीतिक भविष्य पर ही बड़ा सवाल खड़ा हो गया।
क्या पार्टी से निकलते ही चली जाएगी विधायकी?
यहीं सबसे महत्वपूर्ण कानूनी पेच है।JDU से निष्कासन और विधानसभा की सदस्यता खत्म होना दो अलग-अलग बातें हैं।प्रदेश अध्यक्ष उमेश कुशवाहा का फैसला पार्टी संगठन के स्तर पर लागू होगा। विधानसभा की सदस्यता खत्म करने का अंतिम फैसला विधानसभा अध्यक्ष के अधिकार क्षेत्र में आएगा।यानी पार्टी से बाहर किए जाने का मतलब यह नहीं है कि अनंत सिंह की विधायक की कुर्सी उसी समय खत्म हो गई।अब विधानसभा अध्यक्ष के सामने यह सवाल होगा कि क्या अनंत सिंह की गतिविधियां दल-बदल विरोधी कानून के दायरे में आती हैं।
दल-बदल कानून में क्या है प्रावधान?
संविधान की दसवीं अनुसूची यानी दल-बदल विरोधी कानून के तहत किसी विधायक की सदस्यता कुछ परिस्थितियों में समाप्त हो सकती है।सबसे महत्वपूर्ण स्थिति तब बनती है जब विधायक स्वेच्छा से अपनी राजनीतिक पार्टी की सदस्यता छोड़ देता है। यहां सिर्फ लिखित इस्तीफा ही जरूरी नहीं होता। विधायक के आचरण और सार्वजनिक गतिविधियों से भी यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि उसने पार्टी छोड़ दी है।दूसरा प्रमुख आधार पार्टी के निर्देश यानी व्हिप का उल्लंघन है। अगर विधानसभा में किसी मतदान के दौरान पार्टी व्हिप जारी करती है और विधायक उसके खिलाफ वोट करता है या निर्देश का पालन नहीं करता, तो अयोग्यता का मामला बन सकता है।हालांकि अनंत सिंह के मौजूदा मामले में सिर्फ पार्टी से निकाले जाने को सीधे विधानसभा में वोटिंग के दौरान व्हिप तोड़ने के बराबर नहीं माना जा सकता। यही वजह है कि आगे की कानूनी प्रक्रिया महत्वपूर्ण होगी।
मामला कोर्ट तक भी जा सकता है
अगर विधानसभा अध्यक्ष अनंत सिंह की सदस्यता खत्म करने का फैसला लेते हैं, तो उनके पास उस फैसले को अदालत में चुनौती देने का रास्ता भी खुला रहेगा।ऐसे मामलों में कानूनी विवाद विधानसभा अध्यक्ष के फैसले से आगे हाईकोर्ट और जरूरत पड़ने पर सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच सकता है।इसलिए फिलहाल यह कहना जल्दबाजी होगी कि JDU से निष्कासन के साथ ही अनंत सिंह की विधायकी भी खत्म हो गई है।
2022 में भी जा चुकी है विधायकी
अनंत सिंह के राजनीतिक करियर में यह पहली बार नहीं है जब उनकी विधानसभा सदस्यता पर संकट आया हो।2022 में एक आपराधिक मामले में सजा मिलने के बाद उनकी मोकामा विधानसभा की सदस्यता समाप्त हो गई थी। इसके बाद मोकामा सीट पर उपचुनाव हुआ और उनकी पत्नी नीलम देवी विधायक बनी थीं।बाद में कानूनी घटनाक्रम बदला और 2025 में अनंत सिंह ने एक बार फिर मोकामा विधानसभा सीट से चुनाव जीतकर विधानसभा में वापसी की।अब एक बार फिर उनकी विधायकी पर सवाल खड़ा हो गया है।
आगे क्या होगा?
फिलहाल तीन चीजों पर सबकी नजर रहेगी। पहला, विधानसभा अध्यक्ष अनंत सिंह की सदस्यता समाप्त करने की अनुशंसा पर क्या फैसला लेते हैं।दूसरा, अगर फैसला उनके खिलाफ जाता है तो क्या अनंत सिंह अदालत का रुख करते हैं।और तीसरा, JDU से बाहर होने के बाद अनंत सिंह की अगली राजनीतिक चाल क्या होगी।एक बात साफ है कि MLC चुनाव में नीरज कुमार के खिलाफ खुलकर खड़े होने की कीमत अब अनंत सिंह को चुकानी पड़ी है। चुनाव खत्म होते ही JDU ने संगठनात्मक कार्रवाई कर दी है। अब लड़ाई पार्टी के अंदर से निकलकर विधानसभा और संभवत: अदालत तक पहुंच सकती है। यानी अनंत सिंह की राजनीतिक कहानी का एक अध्याय JDU ने बंद कर दिया है, लेकिन उनकी विधायकी का फैसला अभी बाकी है।





