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20-Jan-2026 01:52 PM
By First Bihar
Bihar Expressway : बिहार में सड़क कनेक्टिविटी को नई ऊंचाई देने की दिशा में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की सरकार अब हाईवे के बाद एक्सप्रेसवे नेटवर्क पर जोर देने जा रही है। राज्य में एक्सप्रेसवे का निर्माण तय समय पर पूरा हो, गुणवत्ता बनी रहे और परियोजनाओं की प्रभावी निगरानी हो सके—इसके लिए बिहार सरकार एक नई एक्सप्रेसवे अथॉरिटी के गठन पर विचार कर रही है। यह अथॉरिटी उत्तर प्रदेश एक्सप्रेसवे औद्योगिक विकास प्राधिकरण (यूपीडा) की तर्ज पर काम करेगी।
सरकारी अधिकारियों के मुताबिक, इस नई अथॉरिटी का मुख्य उद्देश्य पीपीपी मॉडल के तहत निजी निवेश को बढ़ावा देना, भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया में तेजी लाना और परियोजनाओं को समयबद्ध तरीके से पूरा कराना है। सरकार का लक्ष्य है कि बिहार में भी मुंबई–पुणे एक्सप्रेसवे जैसी आधुनिक और हाई-स्पीड सड़कें बनें, जहां वाहन 100 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से फर्राटा भर सकें।
मुंबई–पुणे एक्सप्रेसवे को देश के बेहतरीन एक्सप्रेसवे मॉडल के रूप में देखा जाता है। यह 6 लेन की 94.5 किलोमीटर लंबी सड़क है, जिस पर ढाई घंटे में मुंबई से पुणे की दूरी तय की जाती है। इस एक्सप्रेसवे से रोजाना 65 हजार से अधिक वाहन गुजरते हैं। नवी मुंबई के कलांबोली से शुरू होकर यह पुणे के किवाले तक जाती है। दोनों ओर 3 लेन की कंक्रीट सर्विस लेन, 100 किमी प्रति घंटे की तय स्पीड और कार के लिए एक साइड का 320 रुपये टोल—ये सभी विशेषताएं इसे आदर्श बनाती हैं। बिहार सरकार इसी तरह के इंफ्रास्ट्रक्चर मॉडल को राज्य में लागू करना चाहती है।
मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के सात निश्चय कार्यक्रम के तहत बिहार में 5 नए एक्सप्रेसवे बनाए जाने की योजना है। पथ निर्माण मंत्री दिलीप जायसवाल का कहना है कि मुख्यमंत्री का पूरा फोकस राज्य में कनेक्टिविटी बढ़ाने पर है। उनका सपना है कि बिहार के किसी भी कोने से अधिकतम 5 घंटे में पटना पहुंचा जा सके। इसी लक्ष्य को ध्यान में रखकर एक्सप्रेसवे नेटवर्क की रूपरेखा तैयार की जा रही है।
एक्सप्रेसवे निर्माण में तेजी लाने के लिए सरकार ने एक हाई लेवल कमेटी का गठन किया है। इस कमेटी में पथ निर्माण विभाग के सचिव, पथ विकास निगम के महाप्रबंधक और विभाग के मुख्य कार्यपालक अभियंता शामिल हैं। कमेटी का काम न सिर्फ एक्सप्रेसवे निर्माण की तकनीकी प्रक्रिया को समझना है, बल्कि उन कारकों की पहचान करना भी है, जिनसे परियोजनाओं की रफ्तार बढ़ाई जा सके।
कमेटी प्रमुख रूप से उत्तर प्रदेश, गुजरात और महाराष्ट्र का दौरा करेगी। इन राज्यों में सबसे अधिक एक्सप्रेसवे बने हैं या निर्माणाधीन हैं। अध्ययन के दौरान कमेटी केवल निर्माण तकनीक ही नहीं, बल्कि वित्तीय मॉडल, सामाजिक प्रभाव, भूमि अधिग्रहण और पीपीपी स्ट्रक्चर की भी गहराई से समीक्षा करेगी। दौरे के बाद कमेटी अपनी रिपोर्ट राज्य सरकार को सौंपेगी, जिसके आधार पर बिहार में एक्सप्रेसवे परियोजनाओं को और गति मिलेगी।
वर्तमान स्थिति की बात करें तो बिहार में आज की तारीख में केंद्र सरकार की मदद से 4 एक्सप्रेसवे निर्माणाधीन हैं। इनमें पहला पटना–पूर्णिया एक्सप्रेसवे है, जिसे एनएचएआई ने एनई-09 नंबर दिया है। दूसरा गोरखपुर–सिलीगुड़ी एक्सप्रेसवे है, जिसका बड़ा हिस्सा बिहार से होकर गुजरता है। तीसरा रक्सौल–हल्दिया एक्सप्रेसवे है, जो नेपाल को सीधे पश्चिम बंगाल के हल्दिया बंदरगाह से जोड़ेगा। चौथा वाराणसी–रांची–कोलकाता एक्सप्रेसवे है, जिसके बिहार वाले हिस्से में जमीन अधिग्रहण की समस्या थी, लेकिन अब वह सुलझ चुकी है और काम तेजी से आगे बढ़ रहा है।
कुल मिलाकर, बिहार सरकार की यह पहल राज्य को आर्थिक विकास, निवेश और रोजगार के नए अवसरों से जोड़ने की दिशा में एक बड़ा कदम मानी जा रही है। यदि योजनाएं तय समय पर जमीन पर उतरती हैं, तो बिहार भी जल्द ही देश के अग्रणी एक्सप्रेसवे राज्यों की कतार में खड़ा नजर आ सकता है।