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13-Feb-2025 10:16 AM
By First Bihar
liquor ban in bihar : बिहार में शराबबंदी कानून लागू हैं। राज्य के अंदर कहीं भी शराब पीना या इससे जुड़ा किसी भी तरह का कारोबार करना अवैध और गैरकानूनी माना गया है। इसके बाद भी इस कानून हकीकत क्या है इसकी बानगी आए दिन कहीं न कहीं से देखने को मिल ही जाती हैं। इसी कड़ी में अब एक ताजा मामला कैमूर से सामने आया है। जहां उत्पाद विभाग की पुलिस और शराब तस्करों के बीच गठजोड़ का खुलासा हुआ है।
दरअसल, यहां उत्पाद पुलिस द्वारा शराब तस्करी के मामले में बंद शराब तस्करों के खिलाफ 90 दिनों के अंदर चार्जशीट दाखिल नहीं किये जाने के कारण उन्हें न्यायालय से जमानत मिल रही है। खास बात यह है कि उत्पाद पुलिस के द्वारा ऐसा किसी एक मामले में नहीं किया गया है, बल्कि हाल के दिनों में चार मामलों में इसी तरह कि बातें देखने को मिली है कि उत्पाद विभाग के तरफ 90 दिनों के अंदर चार्जशीट दाखिल नहीं किये जाने के कारण शराब तस्करों को न्यायालय से जमानत मिली है।
इतना ही नहीं कोर्ट के तरफ से इसकी सूचना उत्पाद अधीक्षक को भी दी गई है। इसके बाद भी इसको लेकर कोई एक्शन नहीं लिया गया और ऐसे में यह शराब माफिया बड़ी आसानी से जामानत लेकर बाहर आ रहे हैं। लिहाजा अब इस ममाले को लेकर उत्पाद न्यायालय द्वितीय के विशेष न्यायाधीश धर्मेंद्र कुमार तिवारी ने कैमूर डीएम को कार्रवाई के लिए पत्र लिखा है। इस पत्र में पत्र में विशेष न्यायाधीश धर्मेंद्र कुमार तिवारी ने कहा है कि उत्पाद थाना कांड संख्या 830/ 2024 में शराब तस्करी के आरोपित मनीष कुमार उर्फ चंदन कुमार एवं उत्पाद थाना कांड संख्या 877/ 2024 में शराब तस्करी के आरोपित मनीष कुमार एवं रोशन कुमार के खिलाफ अनुसंधानकर्ता मंजू कुमारी एवं पवन कुमार राय ने 90 दिनों में आरोपपत्र (चार्जशीट) न्यायालय में समर्पित नहीं किया।
इससे उन्हें 167 (2) का लाभ देते हुए जमानत दी गयी। इसी तरह पहले भी दो मामलों में निर्धारित समय में चार्ज शीट न्यायालय में दाखिल नहीं किये जाने के कारण आरोपितों को बेल दे दी गयी। जबकि मामलों में अनुसंधानकर्ताओं की लापरवाही की सूचना उत्पाद अधीक्षक को दी गयी। लेकिन, इसके बाद भी कार्रवाई नहीं हुई। इससे स्पष्ट होता है कि उत्पाद अधीक्षक के संरक्षण में अनुसंधानकर्ता समय से अनुसंधान पूर्ण नहीं कर लगातार शराब तस्करों को मदद पहुंचाने का काम कर रहे हैं।
इधर, डीएम सावन कुमार ने बताया कि उक्त मामले को काफी गंभीरता से लिया गया है इसमें अनुसंधानकर्ता के खिलाफ विभागीय कार्रवाई प्रारंभ करते हुए निलंबित करने के लिए विभाग को पत्र लिखा गया है। इसके अलावा अन्य जो लोग भी दोषी हैं, उनके खिलाफ भी कार्रवाई के लिए उत्पाद विभाग को लिखा गया है।