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19-Jun-2025 09:37 AM
By First Bihar
Bihar Politics: बिहार में आगामी विधानसभा चुनाव को लेकर राजनीतिक सरगर्मी तेज हो गई है। इसी बीच बेगूसराय जिले केमें जिला परिषद के तीन प्रमुख सदस्यों ने विधानसभा चुनाव लड़ने का एलान कर सियासी हलचल बढ़ा दी है। इन नेताओं में जिला परिषद अध्यक्ष सुरेंद्र पासवान, उपाध्यक्ष राजीव कुमार सिंह और भाजपा नेता सह जिला परिषद सदस्य अमित कुमार देव शामिल हैं।
सुरेंद्र पासवान बखरी विधानसभा सीट, राजीव कुमार सिंह तेघड़ा सीट और अमित कुमार देव बेगूसराय विधानसभा सीट से किस्मत आजमाएंगे। खास बात यह है कि तीनों को जिला परिषद के अन्य सदस्यों का भी समर्थन मिल रहा है।
सुरेंद्र पासवान
जिला परिषद अध्यक्ष सुरेंद्र पासवान ने स्पष्ट किया कि वे बखरी विधानसभा सीट से चुनाव लड़ेंगे। उन्होंने बताया कि वर्ष 2015 में उन्होंने इसी सीट से नामांकन दाखिल किया था, लेकिन उस समय तत्कालीन भाजपा राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह और प्रदेश अध्यक्ष मंगल पांडेय के आग्रह पर उन्होंने नामांकन वापस ले लिया था। इस बार वे किसी भी दबाव में न आते हुए चुनाव लड़ने को तैयार हैं।
राजीव कुमार सिंह
जिला परिषद उपाध्यक्ष राजीव कुमार सिंह ने तेघड़ा विधानसभा सीट से ताल ठोकने की घोषणा की है। उन्होंने कहा कि क्षेत्र की जनता का व्यापक समर्थन और लगातार मिल रही मांगों के चलते उन्होंने यह निर्णय लिया है। वे लंबे समय से क्षेत्र में सक्रिय हैं और जमीनी मुद्दों पर उनकी पकड़ मजबूत मानी जाती है।
अमित कुमार देव
सबसे बड़ा झटका भाजपा को तब लग सकता है जब उसके अपने नेता अमित कुमार देव पार्टी के टिकट के बगैर बेगूसराय विधानसभा सीट से चुनाव मैदान में उतरते हैं। जिला परिषद सदस्य के रूप में सक्रिय और प्रभावशाली अमित देव ने यह स्पष्ट नहीं किया है कि वे पार्टी टिकट पर लड़ेंगे या निर्दलीय। यदि उन्हें भाजपा से टिकट नहीं मिला, तो उनके चुनाव लड़ने से वोटों का बंटवारा तय माना जा रहा है, जिससे भाजपा के अधिकृत प्रत्याशी की राह मुश्किल हो सकती है।
तीनों नेताओं की लोकप्रियता को देखते हुए यह अनुमान लगाया जा रहा है कि अगर ये भाजपा के आधिकारिक प्रत्याशी नहीं होते हैं, तो पार्टी को नुकसान हो सकता है। खासकर अमित कुमार देव की उम्मीदवारी से बेगूसराय सीट पर भाजपा का समीकरण गड़बड़ा सकता है।
जिला परिषद के ये सदस्य फिलहाल अपने-अपने क्षेत्रों में सक्रियता बढ़ा चुके हैं और जनसंपर्क में जुटे हैं। इनकी उम्मीदवारी से जहां चुनावी मुकाबला रोचक होने वाला है, वहीं सत्ताधारी भाजपा के लिए यह स्थिति संकट भी पैदा कर सकती है, खासकर अगर पार्टी आंतरिक असंतुलन को समय रहते नहीं संभाल पाई।