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रावण के मौत पर शोक: दशहरे पर राजस्थान में क्यों नहीं जलाते दशानन को? जानिए 5 अनोखी परंपराओं की कहानी

राजस्थान में दशहरे की 5 अनोखी परंपराएं बेहद खास हैं। प्रतापगढ़ में रावण को 20 फीट लंबी बीड़ी पिलाई जाती है, जोधपुर के मंडोर में रावण की मौत पर शोक मनाया जाता है और कोटा के नांता में पहलवान पैरों से कुचलकर रावण का वध करते हैं। जानिए इन परंपराओं को...

बिहार न्यूज
दशहरे पर अनोखी परंपरा
© सोशल मीडिया
Jitendra Vidyarthi
5 मिनट

DESK:दशहरा बुराई पर अच्छाई की जीत का पर्व है। इस दिन देशभर में रावण का दहन किया जाता है। लेकिन राजस्थान में दशहरे की कुछ ऐसी परंपराएं हैं, जो आपको हैरान कर देंगी। कहीं रावण को 20 फीट लंबी बीड़ी पिलाई जाती है, तो कहीं उसकी मौत पर शोक मनाया जाता है।


एक जगह रावण को हाथियों से कुचलकर मारा जाता था, तो दूसरी जगह पहलवान पैरों से कुचलकर उसका वध करते हैं। आइए जानते हैं राजस्थान में दशहरे की 5 अनोखी परंपराओं के बारे में।


1. रावण को प्रतापगढ़ में पिलाई जाती है 20 फीट लंबी बीड़ी

राजस्थान के प्रतापगढ़ में दशहरे पर रावण को 20 फीट लंबी बीड़ी पिलाने की अनोखी रस्म निभाई जाती है। यहां रावण का पुतला अलग-अलग पोशाकों में तैयार किया जाता है। इस परंपरा की शुरुआत साल 2011 में नगर परिषद ने की थी। इसका मकसद लोगों को नशे से दूर रहने का संदेश देना है। इस दौरान करीब एक घंटे तक आतिशबाजी भी होती है।


2. यहां पूरा गांव बन जाता है अयोध्या और लंका

राजस्थान में एक जगह दशहरे के दिन पूरा गांव राम और रावण की सेना में बंट जाता है। करीब 300 लोग मुखौटे पहनकर दोनों सेनाओं का हिस्सा बनते हैं। नगाड़ों की आवाज, शंखनाद और जयकारों के बीच राम-रावण युद्ध का मंचन किया जाता है। इस परंपरा की खास बात यह है कि विदेशों में काम करने वाले लोग भी इसमें हिस्सा लेने के लिए अपने गांव लौटते हैं। इस तरह पूरा गांव मिलकर दशहरे की परंपरा को जीवंत रखता है।


3. जोधपुर के मंडोर में रावण की मौत पर मनाया जाता है शोक

देश के ज्यादातर हिस्सों में दशहरे पर रावण दहन के बाद खुशी मनाई जाती है, लेकिन जोधपुर के मंडोर में इससे जुड़ी परंपरा अलग है। यहां रावण का मंदिर है और दवे गोधा ब्राह्मण समाज के लोग उसकी पूजा करते हैं। मान्यता है कि रावण की पत्नी मंदोदरी मंडोर के राजा मयसुर की बेटी थीं। कहा जाता है कि रावण जब मंदोदरी से विवाह करने मंडोर आया था, तब उसके साथ दवे गोधा ब्राह्मण भी आए थे। बाद में इस समाज के कुछ लोग यहीं बस गए। विजयादशमी के दिन रावण दहन के बाद मंदिर को धोया जाता है। इसके बाद आरती होती है और खीर-पूड़ी का भोग लगाया जाता है। समाज के कुछ परिवार इस दिन सूतक भी रखते हैं।


4. कोटा में कभी हाथियों से कुचलकर किया जाता था रावण का वध

कोटा का दशहरा मेला अपने लंबे इतिहास के लिए मशहूर है। यहां साल 1723 में महाराजा दुर्जनशाल सिंह हाड़ा के शासनकाल में मेले की शुरुआत हुई थी। पहले यहां रावण, मेघनाद, कुंभकर्ण, मंदोदरी और खर-दूषण के मिट्टी के विशाल पुतले बनाए जाते थे। परंपरा के मुताबिक, पहले रावण को युद्ध न करने के लिए समझाया जाता था। जब वह नहीं मानता, तो युद्ध का दृश्य दिखाया जाता था। इसके बाद शाही सेना के हाथी पुतलों को गिराकर पैरों से कुचलते थे।


बाद में इस परंपरा में बदलाव आया और पुतलों को जलाने की शुरुआत हुई। आज कोटा के दशहरा मेले में 200 फीट से भी ऊंचे रावण, कुंभकर्ण और मेघनाद के पुतले आकर्षण का केंद्र बनते हैं। यहां पूर्व राजपरिवार की ओर से पुरानी परंपराएं भी निभाई जाती हैं।


5. कोटा के नांता में पहलवान पैरों से कुचलकर करते हैं रावण का वध

कोटा के नांता में दशहरे पर रावण को जलाने के बजाय उसका प्रतीकात्मक वध किया जाता है। यहां जेठी समाज के पहलवान अपनी परंपरा के अनुसार एकत्र होते हैं। यह आयोजन समाज की कुलदेवी लिंबजा माता के मंदिर में होता है। इस दौरान पहलवान रावण के मिट्टी के पुतले को पैरों से कुचलकर उसका वध करते हैं। यह परंपरा दशहरे को एक अलग पहचान देती है।


तो ये थीं राजस्थान में दशहरे की पांच अनोखी परंपराएं। कहीं रावण को बीड़ी पिलाने की रस्म है, तो कहीं उसकी मौत पर शोक मनाया जाता है। ये परंपराएं बताती हैं कि भारत के अलग-अलग इलाकों में एक ही त्योहार को मनाने के तरीके कितने अलग हो सकते हैं।


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