Dussehra 2026: आज देशभर में विजयादशमी का पर्व हर्षोल्लास और श्रद्धा के साथ मनाया जा रहा है। दशहरे की शाम होते ही जगह-जगह रावण, कुंभकर्ण और मेघनाद के विशाल पुतलों का दहन किया जाएगा। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि रावण दहन की परंपरा शाम के समय ही क्यों निभाई जाती है? पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, भगवान श्रीराम ने रावण का वध किस समय किया था और विजय मुहूर्त का क्या महत्व है? आइए, जानते हैं इस धार्मिक परंपरा से जुड़ी मान्यताओं के बारे में।
रावण का वध किस समय हुआ था?
रामायण की प्रचलित धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, भगवान श्रीराम और रावण के बीच भयंकर युद्ध हुआ था। रावण एक शक्तिशाली योद्धा होने के साथ-साथ महान विद्वान और भगवान शिव का भक्त भी था। उसे अनेक वरदान प्राप्त थे, जिसके कारण उसका पराभव करना आसान नहीं था।
मान्यता है कि आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को भगवान श्रीराम ने रावण का वध किया था। यह समय अपराह्न काल यानी दोपहर के बाद का माना जाता है। धार्मिक परंपराओं में इसी अवसर को विजयादशमी के रूप में मनाया जाता है। हालांकि, रावण वध के सटीक समय को लेकर अलग-अलग धार्मिक परंपराओं में वर्णन भिन्न हो सकते हैं।
क्या है विजय मुहूर्त का महत्व?
हिंदू धर्म में विजय मुहूर्त को शुभ और महत्वपूर्ण समय माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस अवधि में किए गए कार्यों में विजय, सफलता और उन्नति की कामना की जाती है। विजयादशमी के दिन इस मुहूर्त का विशेष महत्व होता है।
इस अवसर पर भगवान श्रीराम की पूजा-अर्चना के साथ देवी अपराजिता की आराधना और शमी वृक्ष की पूजा करने की परंपरा भी प्रचलित है। कई स्थानों पर लोग इस दिन नए कार्यों की शुरुआत करते हैं और शस्त्र पूजन भी करते हैं।
शाम को ही क्यों किया जाता है रावण दहन?
दशहरे पर शाम के समय रावण दहन करने की परंपरा भगवान श्रीराम की विजय और बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक है। देश के विभिन्न हिस्सों में विजयादशमी के दिन रावण, कुंभकर्ण और मेघनाद के पुतले जलाए जाते हैं।
शाम के समय होने वाले इन आयोजनों में बड़ी संख्या में लोग शामिल होते हैं। हालांकि, रावण दहन का समय स्थानीय परंपराओं, आयोजन की व्यवस्था और निर्धारित मुहूर्त के अनुसार अलग-अलग हो सकता है। इसलिए यह कहना सही नहीं होगा कि हर जगह रावण दहन केवल एक ही निश्चित समय पर किया जाता है।
रावण दहन क्यों मनाया जाता है?
पौराणिक कथा के अनुसार, रावण ने माता सीता का हरण किया था। इसके बाद भगवान श्रीराम ने धर्म की रक्षा और माता सीता को मुक्त कराने के लिए रावण से युद्ध किया। अंततः श्रीराम ने रावण का वध किया और अधर्म पर धर्म की विजय हुई।
रावण विद्वान होने के साथ भगवान शिव का परम भक्त भी था, लेकिन उसका अहंकार और अधर्म उसके पतन का कारण बना। इसी वजह से दशहरे पर रावण दहन को केवल एक पौराणिक घटना की स्मृति नहीं, बल्कि अहंकार, अन्याय और बुराइयों को त्यागने के प्रतीक के रूप में भी देखा जाता है।





