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Bihar politics : सिलेंडर वाले नेता जी के पास भड़की ऐसी आग की बिहार वाली क्विक रिस्पॉन्स टीम भी हो गई बेदम, अब दिल्ली वाले डॉक्टर साहब से मिलेगी सही सलाह; लेकिन वजह क्या समझिए

Bihar politics : बिहार में एनडीए गठबंधन के भीतर सीटों को लेकर बढ़ता विवाद जारी है। फूल वाली पार्टी, तीर वाले नेता और गैस सिलेंडर वाले नेता के बीच गठबंधन में संतुलन बनाने की कोशिशें चल रही हैं। दिल्ली से निर्देश और चुनावी रणनीति इस राजनीतिक अस्थिरता क

Bihar politics : सिलेंडर वाले नेता जी के पास भड़की ऐसी आग की बिहार वाली क्विक रिस्पॉन्स टीम भी हो गई बेदम, अब दिल्ली वाले डॉक्टर साहब से मिलेगी सही सलाह; लेकिन वजह क्या समझिए
Tejpratap
Tejpratap
5 मिनट

Bihar politics : बिहार की राजनीति हमेशा से अपने अप्रत्याशित घटनाक्रमों के लिए जानी जाती है। यहां कब कौन-सी पार्टी किससे नाराज़ हो जाए और कौन-सा गठबंधन कब टूट जाए, इसकी भविष्यवाणी करना बड़े-बड़े राजनीतिक पंडितों के लिए भी आसान नहीं होता। यही वजह है कि बिहार की सियासत को "अनिश्चित राजनीति" कहा जाता है — जहां हवा के रुख के साथ समीकरण बदलते देर नहीं लगती। इस बार भी बिहार में एनडीए के अंदर कुछ ऐसा ही देखने को मिल रहा है। पहले विवाद सिर्फ "फूल वाली पार्टी" और "तीर वाले दल" के बीच था, लेकिन जैसे ही दोनों के बीच मामला सुलझा, अब एक नई नाराज़गी "सिलेंडर वाले नेता जी" की ओर से सामने आ गई है।


दरअसल, शुरुआत में फूल वाली पार्टी को तीर वालों से नाराज़गी थी, और इसकी वजह बनी थी “हेलीकॉप्टर”। दिल्ली दरबार से इस पर साफ़ संदेश भेजा गया कि पटना में बैठकर तीर वाले नेता जी को मनाया जाए, बाकी हेलीकॉप्टर की उड़ान दिल्ली से तय होगी। इसके बाद फूल वाली पार्टी के वरिष्ठ नेताओं ने सियासी गणित साधते हुए तीर वाले नेता जी को मना लिया। मामला थमता दिखा तो फूल वाली पार्टी ने अपने पहले लिस्ट में प्रत्याशियों की घोषणा कर दी। दूसरी तरफ, तीर वाले नेता जी ने भी बिना लिस्ट जारी किए ही अपने सिंबल बांटने शुरू कर दिए। यहीं से गठबंधन के भीतर नई खींचतान की शुरुआत हो गई।


“सिलेंडर वाले नेता जी” की नाराज़गी

गैस सिलेंडर वाले नेता जी को यह बात नागवार गुज़री। उनका कहना था कि अगर हम सब मिलकर चुनाव लड़ रहे हैं, तो सीटों की घोषणा भी साझा रूप से होनी चाहिए थी। उन्होंने सवाल उठाया — “दिल्ली में जो सीटें तय हुई थीं, वे पटना आते-आते बदल कैसे गईं?”


सिलेंडर वाले नेता जी का तर्क था कि गठबंधन की एकता तभी कायम रह सकती है जब पारदर्शिता बनी रहे। उन्होंने यह भी कहा कि दिल्ली में जो फार्मूला तय हुआ था, उसे बिहार में लागू नहीं किया जा रहा है। ऐसे में गठबंधन में बने रहने का फायदा क्या, अगर सम्मान और भागीदारी बराबर न हो?


“वोट बैंक की राजनीति” पर भी उठे सवाल

नेता जी ने आगे यह भी कहा कि फूल वाली पार्टी को हमसे इसलिए लगाव है क्योंकि हमारे समुदाय में उनका वोट बैंक मजबूत हो रहा है। उनके मुताबिक, फूल वाली पार्टी यह समझती है कि उनके वर्तमान नेताओं पर या तो आरोप लगे हैं या फिर वे हाल ही में पार्टी में आए हैं, ऐसे में समुदाय पर प्रभाव डालने वाला चेहरा वही हैं — यानी सिलेंडर वाले नेता जी। उन्होंने तंज कसते हुए कहा, “जब हम आपके लिए इतने महत्वपूर्ण हैं, तो फिर हमारे साथ न्याय क्यों नहीं हो रहा? दिल्ली में तय सीटों में फेरबदल आखिर किसके इशारे पर हुआ?”


दिल्ली दरबार तक पहुंची शिकायत

सिलेंडर वाले नेता जी की नाराज़गी यहीं तक सीमित नहीं रही। उन्होंने दिल्ली दरबार में संपर्क साधने की कोशिश की, लेकिन उस समय कॉल रिसीव नहीं हो सका। इसके बाद उन्होंने बिहार में मौजूद एक वरिष्ठ नेता से संपर्क किया और पूरी बात साझा की। हालात बिगड़ते देख गठबंधन की क्विक रिस्पॉन्स टीम तुरंत सक्रिय हुई। उन्हें समझाने-बुझाने के लिए कुछ वरिष्ठ नेता उनके आवास पहुंचे। लेकिन सिलेंडर वाले नेता जी का गुस्सा इस बार कुछ ज्यादा ही भड़क चुका था। क्विक रिस्पॉन्स टीम उन्हें मनाने में नाकाम रही।


दिल्ली में “डैमेज कंट्रोल” की कोशिश

हालात और न बिगड़ें, इसके लिए दिल्ली में बैठे “डॉक्टर साहब” ने खुद मोर्चा संभाला। उन्होंने सिलेंडर वाले नेता जी को सीधे अपने पास बुलाया है ताकि आमने-सामने बैठकर सुलह की जा सके। बताया जा रहा है कि बातचीत में सीट बंटवारे को लेकर कुछ लचीला रुख अपनाने का संकेत दिया जा सकता है।


गठबंधन में अंदरूनी खींचतान का संकेत

एनडीए में चल रही यह तकरार भले ही सार्वजनिक रूप से सामने न आई हो, लेकिन अंदरूनी स्तर पर असंतोष की लहर तेज है। चुनावी मौसम में इस तरह की दरारें गठबंधन के लिए मुश्किलें बढ़ा सकती हैं। खासकर तब जब विपक्ष भी अपने गठजोड़ को मजबूत करने में जुटा हुआ है।


बिहार की राजनीति में यह नया सियासी ड्रामा एक बार फिर साबित करता है कि यहां सत्ता का समीकरण सिर्फ वोटों से नहीं, बल्कि रिश्तों, नाराज़गियों और समझौतों से भी तय होता है। अब देखना दिलचस्प होगा कि दिल्ली का “डैमेज कंट्रोल” ऑपरेशन इस बार सफल होता है या फिर एनडीए के भीतर एक नई दरार गहराने वाली है।

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