बिहार की राजनीति में राष्ट्रीय जनता दल (राजद) एक बार फिर चर्चा के केंद्र में है। लेकिन इस बार वजह कोई बड़ा आंदोलन, चुनावी रैली या सरकार पर हमला नहीं, बल्कि पार्टी के भीतर बढ़ती बेचैनी और लगातार सामने आ रहे राजनीतिक झटके हैं। माना जा रहा है कि विधानसभा चुनाव 2025 में मिली करारी हार के बाद शुरू हुआ आत्ममंथन अब एक निर्णायक मोड़ पर पहुंच चुका है। बांकीपुर विधानसभा उपचुनाव में राजद उम्मीदवार रेखा गुप्ता की जमानत जब्त होना इस संकट को और गहरा कर गया। राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि इन घटनाओं ने नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव को यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि यदि समय रहते संगठन को नहीं संभाला गया तो आने वाले चुनावों में पार्टी के सामने और बड़ी चुनौती खड़ी हो सकती है।
हार ने बढ़ाई चिंता, उपचुनाव ने बजा दी खतरे की घंटी
राजद ने विधानसभा चुनाव 2025 में सत्ता में वापसी का सपना देखा था, लेकिन नतीजों ने पार्टी की उम्मीदों पर पानी फेर दिया। चुनावी हार के बाद पार्टी नेताओं ने सार्वजनिक रूप से भले ही संयम बनाए रखा, लेकिन अंदरखाने संगठन की कमजोरी, रणनीति की खामियां और कार्यकर्ताओं की नाराजगी पर लगातार चर्चा होती रही। इसी बीच बांकीपुर विधानसभा उपचुनाव में भी पार्टी को करारा झटका लगा। राजद प्रत्याशी रेखा गुप्ता न केवल चुनाव हार गईं बल्कि उनकी जमानत भी जब्त हो गई। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि राजधानी पटना की इस सीट पर इतना कमजोर प्रदर्शन पार्टी के लिए गंभीर चेतावनी माना जा रहा है।
मृत्युंजय तिवारी का बीजेपी जाना बना बड़ा झटका
राजद की मुश्किलें यहीं खत्म नहीं हुईं। पार्टी के तेज-तर्रार और आक्रामक प्रवक्ता रहे मृत्युंजय तिवारी का बीजेपी में शामिल होना भी संगठन के लिए बड़ा झटका माना जा रहा है। वर्षों तक टीवी डिबेट और मीडिया के जरिए राजद का पक्ष मजबूती से रखने वाले मृत्युंजय तिवारी के अचानक पार्टी छोड़ने से राजनीतिक संदेश भी गया कि संगठन के भीतर सबकुछ सामान्य नहीं है। विपक्षी दलों ने भी इस घटनाक्रम को राजद की कमजोरी बताते हुए तेजस्वी यादव पर निशाना साधा।
भाई वीरेंद्र और शक्ति सिंह यादव की अनबन भी बनी चर्चा
इधर पार्टी के वरिष्ठ नेता और पूर्व विधायक भाई वीरेंद्र तथा मुख्य प्रवक्ता शक्ति सिंह यादव के बीच सार्वजनिक तौर पर सामने आई तल्खी ने भी राजद नेतृत्व की चिंता बढ़ा दी है। पार्टी के दो बड़े नेताओं के बीच बयानबाजी ने यह सवाल खड़ा कर दिया कि क्या राजद में अनुशासन कमजोर पड़ रहा है? राजनीतिक जानकार मानते हैं कि यदि ऐसे विवाद समय रहते नहीं सुलझाए गए तो इसका असर कार्यकर्ताओं के मनोबल पर भी पड़ सकता है।
क्या संगठन में होगा बड़ा बदलाव?
सूत्रों की मानें तो इन सभी घटनाओं के बाद तेजस्वी यादव लगातार पार्टी के वरिष्ठ नेताओं के साथ बैठकें कर रहे हैं। संगठन की वर्तमान स्थिति, जिलों की सक्रियता, प्रवक्ताओं की भूमिका और कार्यकर्ताओं के फीडबैक पर गंभीरता से चर्चा हो रही है।चर्चा यह भी है कि आने वाले दिनों में संगठनात्मक स्तर पर कई बड़े फैसले लिए जा सकते हैं। जिला इकाइयों से लेकर प्रदेश स्तर तक जिम्मेदारियों में बदलाव की संभावना से इनकार नहीं किया जा रहा।हालांकि पार्टी की ओर से अभी तक किसी बड़े फेरबदल की आधिकारिक घोषणा नहीं की गई है।
कार्यकर्ताओं को जोड़ने पर रहेगा फोकस
राजनीतिक जानकारों का कहना है कि पिछले कुछ समय से राजद में जमीनी कार्यकर्ताओं और शीर्ष नेतृत्व के बीच संवाद को लेकर भी सवाल उठते रहे हैं।ऐसे में माना जा रहा है कि तेजस्वी यादव अब संगठन को बूथ स्तर तक फिर से मजबूत करने, पुराने नेताओं को सक्रिय भूमिका देने और नए चेहरों को अवसर देने की रणनीति पर काम कर सकते हैं।पार्टी के अंदर यह भावना भी उभर रही है कि केवल सोशल मीडिया और प्रेस कॉन्फ्रेंस से चुनाव नहीं जीते जा सकते। इसके लिए गांव-गांव और वार्ड स्तर तक मजबूत संगठन की जरूरत होगी।
विपक्ष की नजर भी राजद पर
राजद के अंदर चल रही हलचल पर सत्ताधारी एनडीए भी लगातार नजर बनाए हुए है। बीजेपी और जेडीयू के नेता लगातार यह दावा कर रहे हैं कि राजद में असंतोष बढ़ रहा है और आने वाले समय में कई और नेता पार्टी छोड़ सकते हैं।हालांकि राजद के नेता सार्वजनिक मंचों पर इन दावों को खारिज करते रहे हैं और इसे विपक्ष का प्रचार बताते हैं।
तेजस्वी के सामने सबसे बड़ी चुनौती
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि तेजस्वी यादव के सामने इस समय दोहरी चुनौती है। पहली, पार्टी के भीतर बढ़ रही असंतोष की भावना को खत्म करना और दूसरी, जनता के बीच राजद की नई राजनीतिक छवि तैयार करना।युवा नेतृत्व होने के कारण तेजस्वी से पार्टी कार्यकर्ताओं की अपेक्षाएं भी काफी अधिक हैं। ऐसे में यदि संगठन में समय रहते सुधारात्मक कदम उठाए जाते हैं तो राजद एक बार फिर मजबूती के साथ वापसी की कोशिश कर सकती है।
आने वाले दिनों पर रहेगी नजर
फिलहाल बिहार की राजनीति में सबसे बड़ी चर्चा यही है कि क्या राजद अब बड़े संगठनात्मक बदलाव की ओर बढ़ रहा है? क्या तेजस्वी यादव नई टीम के साथ नई शुरुआत करेंगे? क्या पार्टी के भीतर चल रही नाराजगी को दूर किया जा सकेगा?इन सवालों के जवाब आने वाले दिनों में साफ होंगे। लेकिन इतना तय माना जा रहा है कि चुनावी हार, उपचुनाव में निराशाजनक प्रदर्शन, नेताओं के पार्टी छोड़ने और अंदरूनी विवादों ने राजद नेतृत्व को गंभीर आत्ममंथन के लिए मजबूर कर दिया है।





