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Risk of Diabetes: बच्चों और बुजुर्गों को तेजी से बढ़ रहा डायबिटीज का खतरा, पटना में स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने किया अलर्ट

पटना में बढ़ते वायु प्रदूषण के कारण इंसुलिन का असर कम हो रहा है, जिससे बच्चों और बुजुर्गों में डायबिटीज का खतरा बढ़ रहा है। विशेषज्ञों ने एसजीएलटी-2 दवाओं और व्यायाम सहित प्रिसिजन डायबिटीज मेडिसिन के महत्व पर जोर दिया।

Risk of Diabetes
प्रतिकात्मक
© AI
Mukesh Srivastava
4 मिनट

Risk of Diabetes: पटना में बढ़ते वायु प्रदूषण का असर अब मधुमेह (डायबिटीज) के इलाज पर भी पड़ने लगा है। विशेषज्ञों का कहना है कि प्रदूषित हवा के कारण इंसुलिन का प्रभाव कम हो रहा है, जिससे बच्चों और बुजुर्गों में डायबिटीज का खतरा बढ़ रहा है। प्रदूषित वातावरण में सांस लेने से शरीर की इंसुलिन संवेदनशीलता घट जाती है, जिससे रक्त शर्करा का स्तर अनियंत्रित हो सकता है और डायबिटीज के मामलों में वृद्धि हो सकती है।


यह जानकारी रिसर्च सोसाइटी फॉर द स्टडी ऑफ डायबिटीज इन इंडिया (RSSDI) बिहार कॉन्फ्रेंस के दूसरे दिन रविवार को सामने आई, जहाँ देश और प्रदेश के प्रसिद्ध मधुमेह रोग विशेषज्ञों ने अपने वैज्ञानिक शोध और क्लिनिकल अनुभव साझा किए।


डॉ. के.पी. सिन्हा ने बताया कि वायु प्रदूषण केवल फेफड़ों और श्वसन तंत्र को ही नहीं, बल्कि डायबिटीज के उपचार को भी गंभीर रूप से प्रभावित करता है। प्रदूषित हवा में मौजूद सूक्ष्म कण पीएम 2.5 और पीएम 10 शरीर में प्रवेश कर अंदरूनी सूजन पैदा करते हैं, जिससे इंसुलिन का असर कम हो जाता है और ब्लड शुगर बढ़ने लगती है।


उन्होंने कहा कि प्रदूषण के कारण इंसुलिन शुगर कोशिकाओं तक नहीं पहुंच पाती और खून में ही बनी रहती है, जिससे शुगर नियंत्रण से बाहर हो जाती है। इसके साथ ही वायु प्रदूषण से तनाव हार्मोन कॉर्टिसोल का स्राव बढ़ता है, जो ब्लड शुगर को और अधिक बढ़ा देता है। खराब हवा के कारण लोग टहलना और व्यायाम भी कम कर देते हैं, जिससे वजन बढ़ता है और शुगर नियंत्रण और मुश्किल हो जाता है।


विशेषज्ञों के अनुसार, पहले से डायबिटीज से पीड़ित लोगों में दिल और किडनी से जुड़ी जटिलताएं भी तेजी से बढ़ती हैं। वहीं, लंबे समय तक प्रदूषित हवा में रहने से खासकर बच्चों और बुजुर्गों में मधुमेह होने का खतरा भी बढ़ जाता है। इस सत्र में डॉ. अतुल कुमार, डॉ. सुरेन्द्र कुमार, डॉ. सुभाष कुमार, डॉ. शैबाल गुहा, डॉ. आनंद शंकर और डॉ. मनोज कुमार ने भी अपने विचार रखे।


डॉ. आर.के. मोदी ने एसजीएलटी-2 इनहिबिटर नामक नई दवाओं के बारे में बताया, जो शरीर से अतिरिक्त शुगर को पेशाब के जरिए बाहर निकालती हैं। इससे न केवल ब्लड शुगर नियंत्रित होती है, बल्कि डायबिटीज से जुड़ी हृदय विफलता और किडनी खराब होने का खतरा भी कम होता है।


वहीं, डॉ. ए.के. विरमानी ने कहा कि खासकर टाइप-1 डायबिटीज में केवल दवाइयों पर निर्भर रहना पर्याप्त नहीं है। एरोबिक व्यायाम (तेज चलना), रेजिस्टेंस एक्सरसाइज (हल्का वजन उठाना) और फ्लेक्सिबिलिटी एक्सरसाइज (स्ट्रेचिंग) बेहद जरूरी हैं, जिससे इंसुलिन बेहतर तरीके से काम करता है और शरीर फिट रहता है।


इसके अलावा, डॉ. डी.पी. सिंह ने प्रिसिजन प्रिवेंशन की आवश्यकता पर जोर दिया। डॉ. वसंथ कुमार ने बताया कि सीमित संसाधनों में भी प्रिसिजन डायबिटीज मेडिसिन को प्रभावी ढंग से लागू किया जा सकता है। डॉ. अजय तिवारी ने एचबीए1सी को एकमात्र लक्ष्य मानने को कम प्रासंगिक बताया, जबकि डॉ. अमित कुमार दास ने कहा कि एचबीए1सी आज भी क्लिनिकल प्रैक्टिस का एक महत्वपूर्ण आधार बना हुआ है।

रिपोर्टिंग
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रिपोर्टर

FIRST BIHAR

FirstBihar संवाददाता