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Mokama Politics : मोकामा में विरासत की नई जंग! अनंत सिंह के बाद अब सूरजभान सिंह के बेटे की एंट्री, मरांची में दिखा सियासत का नया रंग

मोकामा की राजनीति में अब अगली पीढ़ी की दस्तक सुनाई दे रही है। अनंत सिंह के बेटे के बाद सूरजभान सिंह के बेटे भी मैदान में सक्रिय हो गए हैं। मरांची में एक ही पीड़ित परिवार से दोनों की मुलाकात ने सियासी चर्चा तेज कर दी है।

Mokama Politics : मोकामा में विरासत की नई जंग! अनंत सिंह के बाद अब सूरजभान सिंह के बेटे की एंट्री, मरांची में दिखा सियासत का नया रंग
Tejpratap
Tejpratap
9 मिनट

Mokama Politics : बिहार की राजनीति में इन दिनों विधान परिषद चुनाव की चर्चा भले ही सबसे ज्यादा हो रही हो, लेकिन इसी राजनीतिक हलचल के बीच मोकामा की राजनीति में एक ऐसी तस्वीर सामने आई है, जिसने आने वाले दिनों की सियासत की झलक दिखा दी है। मोकामा की राजनीति में लंबे समय से अपनी-अपनी पकड़ रखने वाले दो बड़े नामों की अगली पीढ़ी अब धीरे-धीरे मैदान में उतरती दिखाई दे रही है।

एक तरफ मौजूदा विधायक अनंत सिंह अपने बेटे को अपनी राजनीतिक विरासत सौंपने का संकेत दे चुके हैं, तो दूसरी तरफ पूर्व सांसद और मोकामा की राजनीति में लंबे समय से प्रभाव रखने वाले सूरजभान सिंह के बेटे ने भी इलाके में अपनी सक्रियता बढ़ा दी है। दिलचस्प बात यह है कि दोनों की मौजूदगी एक ही गांव में, एक ही पीड़ित परिवार के बीच देखने को मिली। यही तस्वीर अब मोकामा की नई राजनीतिक कहानी का हिस्सा बन गई है।

अनंत सिंह ने बेटे के हाथों में सौंपी विरासत की कमान

मोकामा की राजनीति का जिक्र हो और अनंत सिंह का नाम न आए, ऐसा मुश्किल है। मोकामा विधानसभा क्षेत्र से लगातार चुनाव जीतते रहे अनंत सिंह की इलाके में अपनी मजबूत राजनीतिक पकड़ रही है। समर्थकों के बीच उनका एक अलग प्रभाव माना जाता है और लंबे समय से मोकामा की राजनीति उनके इर्द-गिर्द घूमती रही है। लेकिन बिहार की राजनीति में बड़े बदलाव के बीच अनंत सिंह ने जब सक्रिय राजनीति से दूरी बनाने का संकेत दिया तो सबसे बड़ा सवाल यही उठा कि उनकी राजनीतिक विरासत कौन संभालेगा? इस सवाल का जवाब भी उन्होंने खुद दे दिया।

अनंत सिंह ने साफ किया कि अब उनकी राजनीतिक विरासत को आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी उनके बेटे संभालेंगे। इसके बाद से उनके बेटे लगातार मोकामा विधानसभा क्षेत्र के गांवों में पहुंच रहे हैं। लोगों से मुलाकात, जनसंपर्क और स्थानीय समस्याओं को समझने की कोशिश करते हुए उनकी सक्रियता लगातार दिखाई दे रही है। यानी मोकामा में एक पुराना चेहरा धीरे-धीरे पीछे हटने की तैयारी में है और उसकी जगह परिवार की अगली पीढ़ी मैदान में उतर रही है।

मरांची में एक परिवार के दुख ने आमने-सामने ला दिया दो चेहरे

मोकामा की इसी बदलती राजनीतिक तस्वीर के बीच मरांची गांव की एक घटना ने कहानी को और दिलचस्प बना दिया। मरांची में एक व्यक्ति की हत्या के बाद परिवार पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा। घटना की जानकारी के बाद अनंत सिंह के बेटे पीड़ित परिवार से मिलने पहुंचे। उन्होंने परिजनों से मुलाकात की, उन्हें सांत्वना दी और उनकी समस्याओं को समझने की कोशिश की। उनके साथ जेडीयू के कई नेता और अनंत सिंह के समर्थक भी दिखाई दिए।लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं हुई।

अगले ही दिन इसी पीड़ित परिवार के दरवाजे पर एक और राजनीतिक परिवार की अगली पीढ़ी पहुंची। यह चेहरा था सूरजभान सिंह के बेटे का। एक ही परिवार, एक ही दुख और दो अलग-अलग राजनीतिक विरासतों के उत्तराधिकारी।यहीं से मोकामा की राजनीति में चल रही नई कहानी का एक दिलचस्प अध्याय सामने आया।

सूरजभान सिंह की राजनीति में भी अगली पीढ़ी की दस्तक

सूरजभान सिंह का नाम भी मोकामा की राजनीति में लंबे समय से प्रभावशाली रहा है। वे खुद सांसद और विधायक रह चुके हैं। बाद के दौर में जब उनके खुद चुनाव लड़ने पर रोक रही, तो उन्होंने अपनी राजनीतिक विरासत को आगे बढ़ाने के लिए परिवार के दूसरे सदस्यों को मैदान में उतारा।उनके भाई चंदन सिंह नवादा से सांसद रहे, जबकि उनकी पत्नी वीणा देवी मुंगेर से सांसद बनीं।मोकामा की स्थानीय राजनीति में भी सूरजभान सिंह का प्रभाव अलग-अलग समय पर दिखाई देता रहा है। कभी उन्होंने नलिनी रंजन शर्मा उर्फ ललन सिंह का समर्थन किया तो कभी उनकी पत्नी सोनम देवी के पक्ष में खड़े दिखाई दिए। हालांकि अनंत सिंह और उनकी पत्नी नीलम देवी को चुनौती देने की कोशिशों को अपेक्षित सफलता नहीं मिली।अब जब अनंत सिंह की अगली पीढ़ी मोकामा की राजनीति में सक्रिय हो रही है, सूरजभान सिंह के बेटे की सक्रियता ने मुकाबले की चर्चाओं को नया रंग दे दिया है।

पिता की तबीयत खराब, बेटा लौटा तो सीधे पहुंचा मोकामा

सूरजभान सिंह पिछले कुछ समय से बीमार चल रहे थे और बिहार से बाहर इलाज करा रहे थे। इस दौरान उनका बेटा भी उनके साथ बाहर था।बीते दिनों जब वह बिहार लौटा तो सीधे अपने पैतृक इलाके मोकामा पहुंचा। यहां पहुंचने के बाद उसने राजनीतिक कार्यक्रमों से ज्यादा स्थानीय लोगों के बीच अपनी मौजूदगी दर्ज कराई।मरांची में जिस परिवार के घर एक दिन पहले अनंत सिंह के बेटे पहुंचे थे, उसी परिवार के दरवाजे पर अगले दिन सूरजभान सिंह का बेटा भी पहुंच गया। लेकिन दोनों की बातचीत का अंदाज अलग नजर आया।

'कैमरा देखकर बोलने वाला नहीं हूं...'—बेटे ने क्या कहा?

पीड़ित परिवार से मुलाकात के दौरान सूरजभान सिंह के बेटे ने अपने अंदाज में भरोसा दिलाने की कोशिश की। उन्होंने कहा कि वह ऐसा व्यक्ति नहीं हैं जो कैमरा देखकर कुछ बोल दे और वहां से निकलने के बाद परिवार की परेशानी भूल जाए।उन्होंने परिवार से कहा कि जब भी जरूरत हो, फोन करने पर वह उनके लिए खड़े मिलेंगे।उन्होंने मृतक के बेटे को भरोसा दिलाते हुए कहा कि स्कूल की फीस से लेकर घर के खर्च और दूसरी जरूरतों के लिए उसे किसी के सामने जाने या झुकने की जरूरत नहीं पड़ेगी।उनकी बातचीत का एक और हिस्सा चर्चा में रहा।उन्होंने कहा कि परिवार के पास अपना घर नहीं है, इसलिए इस परिवार के लिए प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत घर की व्यवस्था कराने की कोशिश की जाएगी और इसके लिए विधायक अनंत सिंह से भी बात की जाएगी। यानी राजनीतिक विरोध के बीच भी उन्होंने कम से कम इस मामले में विधायक के साथ मिलकर परिवार की मदद की बात कही।

'साथ हो या विरोध में, मोकामा की जनता के लिए खड़ा रहूंगा'

मरांची में बातचीत के दौरान सूरजभान सिंह के बेटे ने प्रशासन और कानून-व्यवस्था को लेकर भी अपनी बात रखी।उन्होंने कहा कि यदि प्रशासन सही तरीके से काम करे तो मंदिर के बाहर से चप्पल तक चोरी नहीं हो सकती। उनके इस बयान को इलाके की कानून-व्यवस्था को लेकर उनके नजरिए के तौर पर देखा जा रहा है।इसके साथ ही उन्होंने मोकामा की जनता को लेकर कहा कि जब भी मोकामा के लोग उन्हें याद करेंगे, वह उनके सामने खड़े मिलेंगे। खास बात यह रही कि उन्होंने यह भी कहा कि कोई उनके साथ है या विरोध में, इससे उन्हें फर्क नहीं पड़ता। उनका दावा था कि वह मोकामा की जनता के लिए हमेशा उपलब्ध रहेंगे।

असली कहानी अब शुरू हुई है...

मोकामा की राजनीति में यह तस्वीर सिर्फ दो युवाओं के एक ही पीड़ित परिवार से मिलने की कहानी नहीं है। इसके पीछे आने वाले वर्षों की राजनीति की एक झलक भी दिखाई देती है।एक तरफ अनंत सिंह की राजनीतिक विरासत को आगे बढ़ाने के लिए उनका बेटा लगातार गांवों में पहुंच रहा है। दूसरी तरफ सूरजभान सिंह के बेटे ने भी इलाके में अपनी मौजूदगी दर्ज करानी शुरू कर दी है।

दोनों के परिवारों का मोकामा की राजनीति से पुराना रिश्ता है। दोनों के पिता अपने-अपने दौर में यहां की राजनीति के बड़े चेहरे रहे हैं। अब सवाल यह नहीं है कि पिता कितने मजबूत थे, बल्कि सवाल यह है कि अगली पीढ़ी जनता के बीच अपनी जगह कितनी मजबूत कर पाती है।मरांची की यह मुलाकात इसलिए भी खास बन गई है क्योंकि यहां राजनीति किसी मंच पर भाषण से नहीं, बल्कि एक पीड़ित परिवार के दरवाजे पर पहुंचकर दिखाई दी।

मोकामा की राजनीति में अभी चुनाव की घोषणा और भविष्य की तस्वीर के बीच काफी वक्त है। लेकिन जिस तरह दो राजनीतिक परिवारों की अगली पीढ़ी गांवों में पहुंच रही है, उससे इतना जरूर साफ है कि मोकामा की सियासत में अब कहानी सिर्फ पुराने चेहरों की नहीं रहने वाली।

पुराने पहलवान अखाड़े में हैं या नहीं, लेकिन उनके उत्तराधिकारी धीरे-धीरे अखाड़े की मिट्टी को पहचानने लगे हैं। अब देखना यह है कि जनता किसे अपना भरोसा देती है और कौन सिर्फ विरासत के नाम से आगे बढ़ता है, जबकि कौन अपनी अलग पहचान बनाने में सफल होता है।