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Bihar News : मोतिहारी DEO की हिम्मत तो देखिए...CM सम्राट कार्यक्रम से भी गायब रहे, सरकार के 100 दिन पूरे होने पर मुख्यमंत्री VC से जुड़े और अफसर....

पूर्वी चंपारण के मोतिहारी में मुख्यमंत्री के निर्देश पर आयोजित कार्यक्रम से जिला शिक्षा पदाधिकारी की गैरहाजिरी चर्चा का विषय बन गई। मंच से प्रभारी DM और DDC ने नाराजगी जताते हुए रिपोर्ट तैयार कर कार्रवाई करने के निर्देश दिए।

Bihar News : मोतिहारी DEO की हिम्मत तो देखिए...CM सम्राट कार्यक्रम से भी गायब रहे, सरकार के 100 दिन पूरे होने पर मुख्यमंत्री VC से जुड़े और अफसर....
Tejpratap
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5 मिनट

Bihar News : बिहार की शिक्षा व्यवस्था की बदहाली पर अक्सर सवाल उठते रहे हैं। कभी स्कूलों में शिक्षकों की कमी, कभी बच्चों की पढ़ाई का स्तर और कभी विभागीय लापरवाही सुर्खियां बनती है। लेकिन अब जो मामला पूर्वी चंपारण (मोतिहारी) से सामने आया है, उसने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है—क्या शिक्षा विभाग के कुछ अधिकारियों को अब मुख्यमंत्री के कार्यक्रम में शामिल होना भी जरूरी नहीं लगता?


जब सरकार जनता के बीच अपनी योजनाओं और सुशासन का संदेश देने की कोशिश कर रही थी, उसी समय शिक्षा विभाग के एक बड़े अधिकारी की गैरहाजिरी ने पूरे कार्यक्रम की गंभीरता पर सवाल खड़े कर दिए। सवाल सिर्फ एक अधिकारी के अनुपस्थित रहने का नहीं है, बल्कि उस कार्यशैली का है जिसमें जिम्मेदार पद पर बैठे लोग सरकारी कार्यक्रमों को भी हल्के में लेने लगे हैं।


मोतिहारी में मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के निर्देश पर जिला प्रशासन की ओर से एक महत्वपूर्ण कार्यक्रम आयोजित किया गया था। कार्यक्रम में प्रभारी डीएम सह एडीएम मुकेश कुमार सिन्हा, डीडीसी डॉ. प्रदीप कुमार सहित जिले के लगभग सभी विभागों के अधिकारी मौजूद थे। लेकिन जब शिक्षा विभाग की बारी आई तो पता चला कि जिला शिक्षा पदाधिकारी (DEO) राजन गिरी कार्यक्रम में पहुंचे ही नहीं।


शुरुआत में अधिकारियों को लगा कि शायद वे रास्ते में होंगे या किसी अन्य सरकारी कार्य में व्यस्त होंगे। लेकिन जब काफी देर तक उनका कोई अता-पता नहीं चला तो प्रभारी डीएम और डीडीसी ने विभागीय कर्मियों से जानकारी मांगी। जवाब मिला कि जिला शिक्षा पदाधिकारी कार्यक्रम में नहीं आए हैं। बस फिर क्या था। मंच पर बैठे प्रभारी डीएम और डीडीसी का गुस्सा सबके सामने फूट पड़ा। कार्यक्रम के दौरान ही उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि जो भी अधिकारी बिना उचित कारण के इस महत्वपूर्ण सरकारी कार्यक्रम से गायब हैं, उनकी रिपोर्ट तत्काल तैयार की जाए और उनके खिलाफ कार्रवाई की जाएगी।


प्रभारी डीएम मुकेश कुमार सिन्हा ने साफ कहा कि मुख्यमंत्री का संदेश बिल्कुल स्पष्ट है कि सरकारी अधिकारी और कर्मचारी जनता के सेवक हैं, शासक नहीं। ऐसे में यदि कोई अधिकारी सरकारी जिम्मेदारियों से ही दूरी बना ले, तो यह स्वीकार्य नहीं हो सकता।


अब सवाल यह है कि आखिर जिला शिक्षा पदाधिकारी इतने व्यस्त किस काम में थे कि मुख्यमंत्री के निर्देश पर आयोजित सरकारी कार्यक्रम में भी शामिल नहीं हो सके? अगर कोई अपरिहार्य कारण था तो क्या इसकी सूचना प्रशासन को दी गई? या फिर यह मान लिया गया कि "कार्यक्रम तो चलता रहेगा, हमारी मौजूदगी से क्या फर्क पड़ता है?" यही सोच सबसे बड़ा सवाल खड़ा करती है। क्योंकि जब जिले का शीर्ष प्रशासन पूरे समय कार्यक्रम में मौजूद रह सकता है तो फिर शिक्षा विभाग का सबसे बड़ा अधिकारी क्यों नहीं?


यह घटना सिर्फ एक अधिकारी की अनुपस्थिति नहीं बल्कि पूरे सिस्टम की कार्यशैली पर सवाल खड़ा करती है। शिक्षा विभाग पहले ही अपनी कार्यप्रणाली को लेकर आलोचनाओं का सामना करता रहा है। स्कूलों में निरीक्षण कम, कार्यालयों में फाइलें लंबित और शिक्षा की गुणवत्ता पर लगातार उठते सवालों के बीच यदि जिम्मेदार अधिकारी सरकारी कार्यक्रमों से भी दूरी बनाने लगें, तो जनता का भरोसा कैसे कायम रहेगा?


सरकारी कर्मचारी अक्सर यह कहते हैं कि सरकारी आदेश सर्वोपरि होता है। लेकिन क्या यह नियम सिर्फ छोटे कर्मचारियों पर लागू होता है? बड़े अधिकारियों के लिए अलग व्यवस्था है? यदि कोई शिक्षक स्कूल से बिना सूचना गायब मिले तो विभाग तुरंत कार्रवाई की बात करता है। ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या वही पैमाना जिला शिक्षा पदाधिकारी पर भी लागू होगा? मंच से कार्रवाई की घोषणा तो हो गई है, लेकिन अब निगाहें इस बात पर हैं कि क्या यह घोषणा सिर्फ भाषण तक सीमित रहेगी या वास्तव में जिम्मेदारी तय होगी। क्योंकि अगर कार्रवाई नहीं हुई तो यह संदेश जाएगा कि बड़े अधिकारियों के लिए नियम अलग हैं और छोटे कर्मचारियों के लिए अलग।


आखिर में सबसे बड़ा सवाल यही है—जब मुख्यमंत्री के कार्यक्रम को ही कुछ अधिकारी गंभीरता से नहीं लेते, तो फिर आम जनता की समस्याओं और सरकारी योजनाओं को लेकर उनकी संवेदनशीलता का अंदाजा लगाया जा सकता है। अब देखना दिलचस्प होगा कि जिला प्रशासन की चेतावनी के बाद जिला शिक्षा पदाधिकारी से जवाब मांगा जाता है या फिर यह मामला भी सरकारी फाइलों में दबकर रह जाएगा। जनता को सिर्फ बयान नहीं, जवाबदेही चाहिए। क्योंकि सरकारी कुर्सी मौज-मस्ती के लिए नहीं, जनता की सेवा के लिए होती है।