पटना : बिहार के सरकारी स्कूलों में विकास और मरम्मत के नाम पर खर्च की गई सरकारी राशि को लेकर एक जांच रिपोर्ट ने कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। रिपोर्ट में ऐसे मामलों का उल्लेख किया गया है, जहां एक ही काम के लिए अलग-अलग एजेंसियों के माध्यम से दो से पांच बार तक बिल निकाले जाने की बात सामने आई है। इतना ही नहीं, अलग-अलग स्कूलों के बिल और वाउचर की जांच में कई जगह समान राशि दर्ज मिली है। इससे यह संदेह गहरा गया है कि कहीं काम की वास्तविक स्थिति देखे बिना केवल निर्धारित मानक या कागजी प्रक्रिया के आधार पर भुगतान तो नहीं कर दिया गया।
जांच समिति की रिपोर्ट के मुताबिक, स्कूलों में कराए गए विभिन्न कार्यों की पड़ताल के दौरान कई स्तरों पर प्रक्रियात्मक गड़बड़ियां सामने आईं। नियमों के अनुसार किसी भी काम को शुरू करने से पहले स्थल का भौतिक निरीक्षण, तकनीकी आकलन और माप पुस्तिका यानी एम-बुक में काम का रिकॉर्ड दर्ज किया जाना जरूरी है। लेकिन जांच में कई ऐसे मामले मिले, जहां इन जरूरी प्रक्रियाओं का पालन किए बिना ही काम आगे बढ़ाने और भुगतान किए जाने की स्थिति सामने आई।
सबसे गंभीर सवाल उन परियोजनाओं को लेकर उठाया गया है, जिनकी लागत पांच लाख रुपये से अधिक थी। रिपोर्ट में कहा गया है कि जिला शिक्षा कार्यालय की ओर से पांच लाख रुपये से अधिक के कार्यों के लिए औपचारिक प्रशासनिक स्वीकृति जारी किए जाने का रिकॉर्ड नहीं मिला। इसके बजाय आरोप है कि कुछ बड़े कामों को छोटे-छोटे हिस्सों में बांटकर उनकी लागत पांच लाख रुपये से कम दिखाई गई। अगर ऐसा हुआ है तो इससे न केवल काम की स्वीकृति प्रक्रिया पर सवाल उठता है, बल्कि निर्धारित प्रशासनिक और तकनीकी नियमों को दरकिनार करने की आशंका भी पैदा होती है।
दरअसल, सरकारी काम में राशि की सीमा केवल आंकड़ा नहीं होती। इसी के आधार पर प्रशासनिक स्वीकृति, तकनीकी मंजूरी, निरीक्षण और टेंडर जैसी प्रक्रियाएं तय होती हैं। ऐसे में किसी बड़े काम को छोटे हिस्सों में बांटकर दिखाना नियमों से बचने का रास्ता बन सकता है। जांच समिति ने इसी बिंदु को गंभीरता से लिया है।
रिपोर्ट में जिला शिक्षा कार्यालय की भूमिका को लेकर भी सवाल उठाए गए हैं। अतिरिक्त समाहर्ता (विभागीय जांच) की ओर से कई बार पत्र भेजे जाने के बावजूद जांच समिति को कथित तौर पर फाइलें, वर्क ऑर्डर, एम-बुक और भुगतान से जुड़े जरूरी दस्तावेज उपलब्ध नहीं कराए जा सके। यहां तक कि 6 अप्रैल को जांच समिति के सदस्यों के कार्यालय पहुंचने पर भी कर्मचारियों द्वारा फाइलों की तलाश किए जाने की बात सामने आई।
दस्तावेजों की गैरमौजूदगी ने जांच की मुश्किलें और बढ़ा दीं। समिति के सामने यह सत्यापित करना चुनौती बन गया कि जिन कार्यों के लिए भुगतान किया गया, वे वास्तव में भुगतान से पहले पूरे भी हुए थे या नहीं। साथ ही, किस स्तर पर काम का निरीक्षण किया गया और किस अधिकारी या तकनीकी कर्मी ने उसकी पुष्टि की, इसका जवाब भी दस्तावेजों के आधार पर स्पष्ट नहीं हो सका।
मामला मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के संज्ञान में भी लाए जाने की बात सामने आई है। इसके बाद शिक्षा विभाग में कार्रवाई की मांग तेज हुई। शिक्षा मंत्री मिथिलेश तिवारी ने मामले को गंभीर बताते हुए पूरी जानकारी मंगाने की बात कही है। उन्होंने कहा कि निरीक्षण रिपोर्ट के आधार पर पूरे मामले की गहन समीक्षा की जाएगी और यदि अनियमितता सामने आती है तो उचित कार्रवाई होगी।
फिलहाल जांच रिपोर्ट ने स्कूलों में विकास कार्यों के नाम पर हुए भुगतान की प्रक्रिया पर बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है। एक ही काम के लिए कई बार बिल, अलग-अलग स्कूलों में समान राशि के वाउचर, बिना पर्याप्त तकनीकी प्रक्रिया के काम और पांच लाख रुपये से अधिक के कार्यों को छोटे हिस्सों में बांटने के आरोप इन सभी बिंदुओं की आधिकारिक जांच अब महत्वपूर्ण हो गई है। हालांकि, रिपोर्ट में सामने आए आरोपों की अंतिम पुष्टि विभागीय जांच और आधिकारिक निष्कर्षों के बाद ही होगी। असली सवाल यही है कि सरकारी स्कूलों के विकास के लिए निकली रकम जमीन पर कितना काम बनकर उतरी और कागजों पर कितना?




