BIHAR NEWS : बिहार में BJP का उदय ! पढ़िए JDU के आगे 'सीनियर' बनने की पूरी टाइमलाइन; कब कैसे बदली रणनीति

बिहार में जेडीयू-भाजपा गठबंधन में शक्ति संतुलन बदल रहा है। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने राज्यसभा नामांकन दाखिल किया, जबकि भाजपा एनडीए की सीनियर पार्टी बनकर उभर रही है। जानें सीट शेयरिंग, चुनाव परिणाम और भविष्य की राजनीति।

1st Bihar Published by: First Bihar Updated Mar 05, 2026, 2:23:43 PM

BIHAR NEWS : बिहार में BJP का उदय ! पढ़िए JDU के आगे 'सीनियर' बनने की पूरी टाइमलाइन; कब कैसे बदली रणनीति

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BIHAR NEWS : बिहार की राजनीति में दशकों से चले आ रहे जेडीयू-भाजपा गठबंधन ने राज्य की सियासी दिशा को लगातार आकार दिया है। लेकिन हाल के वर्षों में इस गठबंधन की शक्ति संतुलन पूरी तरह बदल गया है। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने  राज्यसभा के लिए अपना नामांकन दाखिल किया है। इस कदम के साथ ही यह स्पष्ट हो गया है कि कभी ‘छोटे भाई’ की भूमिका निभाने वाली भाजपा आज बिहार में एनडीए की सीनियर पार्टनर बनने की ओर अग्रसर है।


1990 के दशक में जब बिहार की राजनीति लालू प्रसाद यादव के इर्द-गिर्द घूम रही थी, तब नीतीश कुमार ने समता पार्टी के जरिए एक गठबंधन तैयार किया। उस समय उनकी पार्टी का आधार मजबूत और निर्णायक माना जाता था। 2000 के पहले के चुनावों में भी नीतीश कुमार ने अपनी साख मजबूत की और बिहार में निर्विवाद नेता के रूप में उभरे। अक्टूबर 2005 में जब पहली बार नीतीश कुमार की अगुवाई में एनडीए की सरकार बनी, तो जेडीयू ने 88 सीटें और भाजपा ने 55 सीटें जीतीं। इस स्थिति ने यह स्पष्ट कर दिया कि उस समय जेडीयू गठबंधन में सीनियर पार्टनर थी।


2010 के विधानसभा चुनाव में नीतीश कुमार की लोकप्रियता चरम पर थी। जेडीयू ने 115 सीटें जीतीं, जबकि भाजपा को 91 सीटों पर संतोष करना पड़ा। सीट शेयरिंग में भी जेडीयू को अधिक स्थान मिला। लेकिन जैसे ही 2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा की केंद्रीय राजनीति में नरेंद्र मोदी का प्रवेश हुआ, नीतीश कुमार असहज महसूस करने लगे। भाजपा ने प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के रूप में मोदी को चुना और इसके बाद नीतीश कुमार ने भाजपा से गठबंधन तोड़ दिया। उन्होंने राजद और कांग्रेस के साथ मिलकर महागठबंधन का गठन किया।


2014 के लोकसभा चुनाव ने बिहार में सत्ता संतुलन की दिशा बदल दी। भाजपा ने अकेले दम पर शानदार प्रदर्शन किया, जबकि जेडीयू मात्र 2 सीटों पर सिमट गई। यह पहली बार था जब बिहार में भाजपा का जनाधार स्वतंत्र रूप से बढ़ता दिखा। 2015 के विधानसभा चुनाव में नीतीश कुमार महागठबंधन के साथ गए और जीत हासिल की। बावजूद इसके, भाजपा ने अकेले चुनाव लड़ा और 24.4% वोट शेयर हासिल किया, जो किसी भी पार्टी के लिए बड़ी उपलब्धि थी।


2017 में नीतीश कुमार ने वापस एनडीए में शामिल होकर गठबंधन को पुनः मजबूत किया। लेकिन इस समय तक भाजपा की सौदेबाजी और चुनावी ताकत पहले से कहीं अधिक मजबूत हो चुकी थी। 2020 के विधानसभा चुनाव में जेडीयू और भाजपा ने साथ लड़ा। इस बार भाजपा को 74 सीटें मिलीं, जबकि जेडीयू 43 सीटों पर संतोष करना पड़ा। यह पहला अवसर था जब एनडीए में भाजपा जेडीयू से आगे निकल गई। हालांकि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार बने, लेकिन संख्या बल के मामले में भाजपा अब ‘बड़े भाई’ की भूमिका में थी।


2024 के लोकसभा चुनाव ने गठबंधन की नई दिशा को और स्पष्ट कर दिया। जेडीयू और भाजपा ने बराबर की सीटें जीतीं—दोनों को 12-12 सांसद मिले। लेकिन 2025 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने 89 सीटें जीतकर जेडीयू को पीछे छोड़ दिया, जबकि जेडीयू को 85 सीटें मिलीं। यह पहला अवसर था जब जेडीयू ने एनडीए में रहते हुए बराबर सीटों पर चुनाव लड़ा, दोनों दलों ने 101-101 उम्मीदवार उतारे।


भाजपा का कोर वोट बैंक लगातार स्थिर रहा, जबकि जेडीयू का वोट शेयर गठबंधन बदलने और एंटी-इंकंबेंसी के कारण प्रभावित हुआ। 2020 और 2025 में भाजपा का स्ट्राइक रेट जेडीयू की तुलना में बेहतर रहा। खासकर ग्रामीण इलाकों और अति पिछड़ा वर्ग (EBC) में भाजपा की पैठ मजबूत हुई। यह क्षेत्र पहले नीतीश कुमार की ताकत माना जाता था, लेकिन अब भाजपा ने स्वतंत्र रूप से वहां अपना आधार स्थापित कर लिया है।


नीतीश कुमार का राज्यसभा जाना भी इस बदलाव का प्रतीक है। उनके राज्यसभा जाने के बाद भाजपा के प्रभाव में वृद्धि होगी और बिहार में सत्ता संरचना में नया संतुलन बनेगा। एनडीए की नई सियासी तस्वीर में भाजपा का बढ़ता प्रभाव और जेडीयू की रणनीति बदलाव जरूरी हो जाएगा। यह परिवर्तन केवल सीटों के आंकड़ों तक सीमित नहीं है, बल्कि बिहार की राजनीति की गहरी रणनीतिक दिशा को भी प्रभावित करेगा।


संक्षेप में कहा जा सकता है कि बिहार में गठबंधन की परंपरा तो जारी है, लेकिन सत्ता का असली नियंत्रण अब धीरे-धीरे भाजपा के हाथ में आता दिख रहा है। जेडीयू और भाजपा के बीच का यह बदलता संतुलन आने वाले समय में बिहार की राजनीति के भविष्य की दिशा तय करेगा।