पटना: बिहार विधान परिषद की 8 सीटों पर मतदान खत्म होने के बाद अब सबकी नजर 27 अक्टूबर को होने वाली मतगणना पर है। इनमें पटना स्नातक निर्वाचन क्षेत्र सबसे ज्यादा चर्चा में है। वजह सिर्फ यह नहीं कि यहां मुकाबला त्रिकोणीय रहा, बल्कि इस सीट पर JDU के सिटिंग MLC नीरज कुमार के सामने उनकी ही पार्टी के मोकामा विधायक अनंत सिंह ने खुलकर मोर्चा खोल दिया था।
अनंत सिंह ने जन सुराज के प्रत्याशी अनुज सिंह को समर्थन दिया और उनके पक्ष में कई जगहों पर रोड शो भी किए। दूसरी ओर नीरज कुमार लगातार चौथी बार जीत के लिए मैदान में थे। RJD ने दिलीप पटेल को उतारकर मुकाबले को और दिलचस्प बना दिया। मतदान के बाद सामने आए ग्राउंड रुझानों में फिलहाल नीरज कुमार और अनुज सिंह के बीच सीधा मुकाबला दिखाई दे रहा है। हालांकि इसे एकतरफा मुकाबला कहना जल्दबाजी होगी। अनंत सिंह के समर्थन ने अनुज सिंह को जिस तरह चर्चा के केंद्र में ला दिया, उससे नीरज कुमार के सामने निश्चित तौर पर चुनौती बढ़ी है। वहीं नीरज की लंबे समय से इलाके में मौजूदगी और संगठनात्मक पकड़ को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
अनंत सिंह ने बदल दिया चुनाव का माहौल
पटना स्नातक सीट पर चुनाव की शुरुआत में मुकाबला नीरज कुमार बनाम विपक्ष के रूप में देखा जा रहा था। लेकिन जैसे ही अनंत सिंह ने जन सुराज के अनुज सिंह का समर्थन किया, चुनाव का पूरा समीकरण बदल गया।अनंत सिंह ने कई इलाकों में रोड शो किया। उनके कार्यक्रमों में बड़ी संख्या में समर्थक पहुंचे। इससे अनुज सिंह को काफी राजनीतिक चर्चा मिली। वह उम्मीदवार, जिसे चुनाव से पहले सीमित दायरे में देखा जा रहा था, अचानक पटना स्नातक सीट के मुख्य मुकाबले में आ गया।अनंत सिंह का दावा रहा कि जनता का समर्थन उनके साथ है और चुनाव में इसका असर दिखाई देगा। ऐसे में अब असली सवाल यह है कि रोड शो में जुटी भीड़ कितने वोट में बदल पाई। ग्राउंड रिपोर्ट में कुछ जगहों पर अनुज सिंह को मजबूत समर्थन मिलने की बात सामने आई है, लेकिन अभी यह कहना मुश्किल है कि उनका वोट नीरज कुमार को पीछे करने के लिए पर्याप्त रहा या नहीं।
नीरज कुमार की सबसे बड़ी ताकत पुराना वोट नेटवर्क
दूसरी तरफ नीरज कुमार के पास इस चुनाव में एक बड़ा फायदा उनका पुराना नेटवर्क रहा। वह इस सीट से लगातार तीन बार MLC रह चुके हैं। लंबे समय से स्नातक मतदाताओं के बीच उनकी सक्रियता रही है।ऐसे चुनाव में व्यक्तिगत संपर्क और बूथ स्तर का नेटवर्क काफी मायने रखता है। नीरज कुमार के समर्थकों का दावा है कि उनके पक्ष में मौजूद यह पुराना वोट बैंक मतदान के दौरान भी दिखाई दिया।इसके अलावा NDA के बड़े नेताओं की सक्रियता ने भी नीरज के पक्ष में माहौल बनाने की कोशिश की। JDU संगठन ने भी उन्हें पार्टी का अधिकृत उम्मीदवार बताते हुए कार्यकर्ताओं को उनके पक्ष में लामबंद किया।यही वजह है कि मतदान के बाद भी नीरज कुमार को कमजोर उम्मीदवार नहीं माना जा रहा है।
अनुज सिंह के लिए अनंत सिंह का समर्थन कितना कारगर?
अनुज सिंह की पूरी चुनावी रणनीति में अनंत सिंह का समर्थन सबसे बड़ा फैक्टर रहा। अनंत सिंह का व्यक्तिगत प्रभाव और मोकामा क्षेत्र में उनकी पकड़ को देखते हुए माना गया कि वह अनुज सिंह के पक्ष में बड़ा वोट ट्रांसफर करा सकते हैं।लेकिन विधान परिषद का स्नातक चुनाव सामान्य विधानसभा चुनाव से अलग है। यहां मतदाता सीमित और अलग तरह की सामाजिक-राजनीतिक पृष्ठभूमि वाले होते हैं। इसलिए विधानसभा चुनाव में दिखाई देने वाला व्यक्तिगत प्रभाव विधान परिषद चुनाव में उसी अनुपात में वोट में बदले, यह जरूरी नहीं है।यही वजह है कि अनंत सिंह की सभाओं और रोड शो में उमड़ी भीड़ को देखकर किसी नतीजे पर पहुंचना जल्दबाजी होगी।फिर भी यह कहना भी सही नहीं होगा कि अनंत सिंह के समर्थन का कोई असर नहीं पड़ा। उनके मैदान में उतरने से अनुज सिंह को पहचान, चर्चा और अतिरिक्त वोट जुटाने का मौका जरूर मिला।
भूमिहार वोटों पर भी रहेगी नजर
पटना स्नातक सीट पर भूमिहार वोट भी चर्चा के केंद्र में रहे। अनुज सिंह को अनंत सिंह के समर्थन के बाद माना जा रहा था कि इस वोट बैंक में बड़ा बिखराव हो सकता है।हालांकि ग्राउंड रिपोर्ट के मुताबिक भूमिहार वोटों में वैसा व्यापक बिखराव स्पष्ट तौर पर नहीं दिखाई दिया, जैसा चुनाव की शुरुआत में अनुमान लगाया जा रहा था। कुछ इलाकों में अनुज सिंह को समर्थन जरूर मिला, लेकिन इसे पूरे वोट बैंक के बड़े ट्रांसफर के रूप में देखना अभी मुश्किल है।अगर 27 अक्टूबर को नतीजे में अनुज सिंह को अपेक्षा से ज्यादा वोट मिलते हैं तो यह माना जाएगा कि अनंत सिंह अपने प्रभाव को वोट में बदलने में सफल रहे।
RJD के दिलीप पटेल ने भी बिगाड़ा गणित
पटना स्नातक सीट पर RJD के दिलीप पटेल भी मुकाबले में महत्वपूर्ण फैक्टर रहे। खासकर नालंदा इलाके में उनके समर्थन को लेकर चर्चा रही।दिलीप पटेल के मैदान में होने से नीरज कुमार और अनुज सिंह के बीच वोटों का सीधा ध्रुवीकरण नहीं हो सका। कुर्मी वोटों को लेकर भी अलग-अलग इलाकों में अलग समीकरण दिखाई दिए।ऐसे में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि तीसरे नंबर पर रहने वाला उम्मीदवार किसके वोट में ज्यादा सेंध लगाता है। अगर दिलीप पटेल को अपेक्षा से ज्यादा वोट मिलते हैं तो वह नीरज और अनुज दोनों के समीकरण को प्रभावित कर सकते हैं।
नीरज की जीत हुई तो अनंत के लिए संदेश, अनुज जीते तो बड़ा पलटवार
पटना स्नातक सीट का नतीजा दोनों खेमों के लिए राजनीतिक संदेश लेकर आएगा।अगर नीरज कुमार जीतते हैं तो इसे उनकी व्यक्तिगत पकड़ और JDU संगठन की ताकत के तौर पर देखा जाएगा। खासकर इसलिए क्योंकि उन्हें अपनी ही पार्टी के एक प्रभावशाली विधायक के विरोध का सामना करना पड़ा।वहीं अगर अनुज सिंह बाजी पलट देते हैं तो यह अनंत सिंह के लिए बड़ी राजनीतिक उपलब्धि होगी। इससे यह संदेश जाएगा कि अनंत सिंह सिर्फ विधानसभा क्षेत्र तक सीमित नहीं हैं, बल्कि स्नातक मतदाताओं के चुनाव में भी अपना प्रभाव डाल सकते हैं। यानी इस चुनाव में हार-जीत सिर्फ उम्मीदवार की नहीं होगी, बल्कि दोनों तरफ के राजनीतिक प्रभाव की भी परीक्षा होगी।
43.87% मतदान ने बढ़ाई उत्सुकता
स्नातक निर्वाचन क्षेत्र की चार सीटों पर इस बार औसतन 43.87 प्रतिशत मतदान हुआ। 2020 में यह आंकड़ा करीब 48.5 प्रतिशत था। यानी स्नातक सीटों पर इस बार मतदान प्रतिशत में कमी आई है। कम मतदान का फायदा किसे मिला, यह भी नतीजे में महत्वपूर्ण होगा। ऐसे चुनाव में संगठित और प्रतिबद्ध वोटरों की भूमिका काफी बढ़ जाती है। इसलिए नीरज कुमार का पुराना नेटवर्क और अनुज सिंह के पक्ष में अनंत सिंह की लामबंदी—दोनों की असली परीक्षा अब मतगणना में होगी।
फिलहाल तस्वीर किसी एक खेमे के पक्ष में पूरी तरह साफ नहीं है। नीरज कुमार के पास अनुभव, तीन बार की जीत और संगठन का सहारा है, तो अनुज सिंह के पास अनंत सिंह का आक्रामक चुनावी अभियान और बदलाव का मुद्दा।यही वजह है कि पटना स्नातक सीट का मुकाबला आखिरी दौर तक दिलचस्प बना हुआ है। अब रोड शो की भीड़, नेताओं के दावे और बूथ के समीकरण सब पीछे छूट चुके हैं। 27 अक्टूबर को मतगणना में बैलेट बॉक्स ही बताएगा कि पटना स्नातक के मतदाताओं ने नीरज कुमार के अनुभव पर भरोसा किया या अनंत सिंह के समर्थन वाले अनुज सिंह को बदलाव का मौका दिया।





