Bihar Politics : बिहार की राजनीति में मंत्रिमंडल विस्तार केवल विभागों के बंटवारे का मामला नहीं होता, बल्कि इसके जरिए सत्ता का संतुलन, भविष्य की रणनीति और गठबंधन की दिशा तय होती है। मुख्यमंत्री Samrat Choudhary के नेतृत्व में हुए नए कैबिनेट विस्तार में भी यही तस्वीर देखने को मिली है। मंत्रिपरिषद की संख्या अब 35 तक पहुंच गई है, हालांकि अभी भी एक पद खाली रखा गया है। लेकिन सबसे ज्यादा चर्चा इस बात की हो रही है कि आखिर विभागों का ऐसा बंटवारा क्यों किया गया, जो बिहार की राजनीति में अब तक कम ही देखने को मिला था।
इस बार एनडीए सरकार में सबसे बड़ा राजनीतिक संदेश स्वास्थ्य और शिक्षा विभाग को लेकर दिया गया है। पहली बार ऐसा हुआ है कि स्वास्थ्य विभाग Nitish Kumar की पार्टी जेडीयू के खाते में गया है। वहीं शिक्षा विभाग बीजेपी ने अपने पास रखकर साफ संकेत दिया है कि आने वाले समय में वह वैचारिक और प्रशासनिक दोनों स्तरों पर अपनी पकड़ मजबूत करना चाहती है।
स्वास्थ्य विभाग की जिम्मेदारी पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के पुत्र Nishant Kumar को दी गई है। इसे सिर्फ विभागीय जिम्मेदारी नहीं बल्कि राजनीतिक उत्तराधिकार की दिशा में बड़ा कदम माना जा रहा है। अब तक बिहार की राजनीति में निशांत कुमार पर्दे के पीछे ही नजर आते रहे थे, लेकिन पहली बार उन्हें इतने महत्वपूर्ण विभाग की कमान देकर जेडीयू ने साफ कर दिया है कि पार्टी भविष्य की तैयारी शुरू कर चुकी है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि स्वास्थ्य विभाग सीधे आम जनता से जुड़ा होता है। कोरोना काल के बाद इस विभाग की अहमियत और बढ़ी है। ऐसे में अगर निशांत कुमार इस विभाग में बेहतर प्रदर्शन करते हैं तो जेडीयू उन्हें राज्यस्तरीय नेता के तौर पर स्थापित करने की कोशिश करेगी। यही कारण है कि इस फैसले को केवल प्रशासनिक नहीं बल्कि दीर्घकालिक राजनीतिक निवेश माना जा रहा है।
दूसरी तरफ बीजेपी ने पहली बार शिक्षा विभाग अपने पास रखकर बड़ा दांव चला है। बीजेपी कोटे से मंत्री बने Mithilesh Tiwari को शिक्षा विभाग की जिम्मेदारी दी गई है। अब तक यह विभाग अधिकतर जेडीयू के पास रहा करता था। शिक्षा विभाग को लेकर बीजेपी लंबे समय से अपनी वैचारिक पकड़ मजबूत करना चाहती थी। नई शिक्षा नीति, पाठ्यक्रम और शिक्षकों की नियुक्ति जैसे मुद्दों के जरिए पार्टी ग्रामीण और युवा वोटरों तक अपनी पहुंच बढ़ाने की रणनीति पर काम कर सकती है।
राजनीतिक तौर पर देखें तो बीजेपी अब बिहार में केवल सहयोगी दल की भूमिका में नहीं रहना चाहती। पार्टी अपने प्रभाव वाले विभागों के जरिए प्रशासनिक पहचान बनाना चाहती है। शिक्षा विभाग उसी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है।
ऊर्जा विभाग में हुआ बदलाव भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। पिछले लगभग तीन दशकों से ऊर्जा विभाग संभाल रहे Bijendra Prasad Yadav से यह जिम्मेदारी लेकर Bulo Mandal को दी गई है। बिहार की राजनीति में विजेंद्र यादव को ऊर्जा विभाग का पर्याय माना जाता था। लंबे समय तक बिजली सुधार और ग्रामीण विद्युतीकरण की योजनाएं उनके नेतृत्व में चलीं। ऐसे में उनका विभाग बदलना साफ संकेत देता है कि सरकार अब प्रशासनिक ढांचे में नई पीढ़ी और नए समीकरणों को जगह देना चाहती है।
बुलो मंडल को ऊर्जा विभाग देना सामाजिक और क्षेत्रीय संतुलन साधने की कोशिश भी माना जा रहा है। कोसी-सीमांचल क्षेत्र में राजनीतिक पकड़ मजबूत करने के लिए जेडीयू इस फैसले को अहम मान रही है।
इस पूरे विभागीय बंटवारे में एक और बात साफ दिखती है कि एनडीए के भीतर बीजेपी और जेडीयू के बीच नई समझ विकसित हुई है। पहले जहां जेडीयू कुछ प्रमुख विभाग अपने पास रखती थी, वहीं इस बार बीजेपी को ज्यादा प्रभावशाली भूमिका दी गई है। इससे यह संकेत भी मिलता है कि गठबंधन अब “समान भागीदारी” के मॉडल पर आगे बढ़ना चाहता है।
सम्राट चौधरी ने विभागों के जरिए केवल प्रशासनिक जिम्मेदारी नहीं बांटी, बल्कि आगे के लिए राजनीतिक बिसात भी बिछा दी है। स्वास्थ्य विभाग के जरिए निशांत कुमार की एंट्री, शिक्षा विभाग पर बीजेपी की पकड़ और ऊर्जा विभाग में बदलाव—इन तीन फैसलों ने साफ कर दिया है कि बिहार की राजनीति अब नए दौर में प्रवेश कर चुकी है।





