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साहब... कब मिलेगी मेरी जमीन? 15 साल से दफ्तरों के चक्कर काट रही बुजुर्ग महिला, रो-रोकर सुनाया दर्द

Bihar News: बिहार के राजस्व विभाग से जुड़ा एक मामला सामने आया है, जहां एक बुजुर्ग महिला को अपनी जमीन के लिए पिछले 15 सालों से दफ्तरों के चक्कर लगाने पड़ रहे हैं। लगातार लापरवाही और देरी को लेकर प्रशासनिक व्यवस्था पर गंभीर सवाल उठ रहे...

साहब... कब मिलेगी मेरी जमीन? 15 साल से दफ्तरों के चक्कर काट रही बुजुर्ग महिला, रो-रोकर सुनाया दर्द
Ramakant kumar
3 मिनट

Bihar News: सरकारी दफ्तरों में आम लोगों की परेशानी और अधिकारियों की लापरवाही की कहानियां अक्सर सामने आती रहती हैं, लेकिन इस बार जो मामला चर्चा में है, जोा कटिहार जिला अंतर्गत फलका प्रखंड का है, जहां एक बुजुर्ग महिला पिछले 15 सालों से अपनी जमीन से जुड़े मामले को लेकर सरकारी दफ्तरों के चक्कर काट रही है, लेकिन आज तक उसे न्याय नहीं मिल सका। उम्र ढल गई, उम्मीद टूटने लगी, लेकिन फाइल अब भी सरकारी टेबलों के बीच कहीं अटकी पड़ी है।


महिला का आरोप है कि उसने अपनी जमीन के मामले को लेकर कई बार राजस्व विभाग और अंचल कार्यालय का दरवाजा खटखटाया, लेकिन हर बार सिर्फ आश्वासन मिला। कभी कोई कागज कम बता दिया गया, तो कभी किसी अधिकारी के नहीं रहने का बहाना बना दिया गया। इतने वर्षों में उसकी जिंदगी का बड़ा हिस्सा सिर्फ सरकारी दफ्तरों की सीढ़ियां चढ़ते-उतरते बीत गया।


बताया जा रहा है कि महिला कई बार अधिकारियों के सामने हाथ जोड़ चुकी है। आंखों में आंसू लेकर उसने अपनी समस्या सुनाई, लेकिन उसकी फरियाद सुनने वाला कोई नहीं मिला। अब हाल यह है कि वह पूरी तरह टूट चुकी है। दफ्तर के बाहर बैठकर रोती हुई महिला की तस्वीरें और वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहे हैं। लोग सवाल उठा रहे हैं कि आखिर एक बुजुर्ग महिला को अपने ही हक के लिए इतना संघर्ष क्यों करना पड़ रहा है।


पीड़िता का कहना है कि उसे हर बार सिर्फ कल आना, फाइल देख रहे हैं, ऊपर से आदेश नहीं आया जैसे जवाब मिलते रहे। 15 साल गुजर गए, लेकिन जमीन का मामला जस का तस पड़ा हुआ है। महिला ने आरोप लगाया कि कुछ कर्मचारी जानबूझकर फाइल को आगे नहीं बढ़ा रहे हैं। उनका कहना है कि अगर समय पर कार्रवाई हुई होती, तो उन्हें इतनी जिल्लत नहीं झेलनी पड़ती।


स्थानीय लोगों का भी कहना है कि राजस्व विभाग में आम लोगों की सुनवाई बेहद मुश्किल हो गई है। छोटे-छोटे कामों के लिए लोगों को महीनों और कई बार सालों तक दफ्तरों के चक्कर लगाने पड़ते हैं। लोगों का आरोप है कि गरीब और कमजोर लोगों की फाइलें अक्सर दबा दी जाती हैं, जबकि पहुंच और पैसे वालों के काम जल्दी हो जाते हैं।