PATNA: पटना शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र से बिहार विधान परिषद से लिए हो रहे चुनाव में पहली वरीयता के वोटों की गिनती पूरी हो चुकी है. लेकिन मुकाबला बेहद कांटे का है. पहली वरीयता के मतों में बीजेपी को मामूली बढ़त हो हासिल हुई है लेकिन इससे जीत-हार तय नहीं हुआ है. अब दूसरी औऱ तीसरी वरीयता के मतों की गिनती होगी और उसके बाद विजेता का फैसला होगा.
बीजेपी को मामूली बढ़त
मतगणना केंद्र से मिली जानकारी के मुताबिक पटना शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र की काउंटिंग में बीजेपी के नवल किशोर यादव को मामूली बढ़त मिली है. पहली वरीयता के मतों की गिनती के बाद नवल किशोर यादव आरजेडी के उम्मीदवार डॉ संजीव कुमार से करीब 50 वोट से आगे हैं. लेकिन इससे जीत हार तय नहीं होगा. अभी दूसरे-तीसरे वरीयता के मतों की गिनती होगी औऱ तब विजेता तय होगा.
क्या है वरीयता वाले वोट का मतलब?
विधान परिषद चुनावों में इस्तेमाल होने वाली वोटिंग प्रणाली को अनुपातिक प्रतिनिधित्व की एकल संक्रमणीय मत प्रणाली (Single Transferable Vote , STV) कहा जाता है। इस प्रणाली में वोटर अपना केवल एक ही वोट नहीं देता, बल्कि सभी प्रत्याशियों के नाम के आगे अपनी वरीयता (1, 2, 3 आदि) तय करता है।
लोकसभा या विधानसभा के आम चुनाव में वोटर सिर्फी किसी एक उम्मीदवार को वोट देते हैं. लेकिन एमएलसी चुनाव में बैलेट पेपर पर सभी प्रत्याशियों के नाम लिखे होते हैं. मतदाता को अपनी पहली पसंद के उम्मीदवार के नाम के आगे '1' लिखना होता है। अगर वोटर चाहता है कि उसका पहला पसंदीदा उम्मीदवार न जीते तो उसका वोट किसे मिले, तो वह दूसरी पसंद के आगे '2', तीसरी पसंद के आगे '3' लिख सकता है। हालांकि वोटर के लिए सिर्फ पहली वरीयता का वोट ('1') दर्ज करना जरूरी होता है. बाकी उसकी मर्जी पर है कि वह 2,3,4 लिखे या न लिखे.
जीत के लिए कितना वोट चाहिये?
एमएलसी चुनाव में जिस प्रत्याशी को सबसे ज्यादा पहली वरीयता के वोट मिलते हैं, वह सीधे नहीं जीतता; बल्कि उसे जीतने का न्यूनतम कोटा पार करना होता है। जीत का न्यूनतम कोटा होता है कुल वोट का पचास प्रतिशत से एक अधिक. यानि किसी क्षेत्र में अगर दस हजार वोटर हैं और किसी उम्मीदवार को पहली वरीयता के 5000+1 वोट मिल जायें तो वह जीत जायेगा. लेकिन अगर उसे इससे कम वोट मिलते हैं तो उसकी जीत नहीं होगी.
ऐसे बढ़ता है काउंटिंग का काम
अगर पहली वरीयता के वोटों की गिनती में किसी उम्मीदवार को पहली वरीयता के पर्याप्त वोट नहीं मिलते हैं तो अगली कवायद शुरू होती है. तब पहली वरीयता के सबसे कम वोट लाने वाले प्रत्याशी को रेस से बाहर कर दिया जाता है. बाहर हुए प्रत्याशी के मतपत्रों को खोलकर देखा जाता है कि उन पर दूसरी पसंद ('2') के रूप में किसे चुना गया था। वे वोट उन प्रत्याशियों के खातों में जोड़ दिए जाते हैं जो रेस में बरकरार हैं।
इसी तरह से नीचे से एक-एक कर उम्मीदवारों की छंटनी कर उनके वोट को मतपत्र पर अंकित दूसरी वरीयता वाले उम्मीदवार के वोट में जोड़ा जाता है. यह प्रक्रिया तब तक दोहराई जाती है जब तक कि उम्मीदवार तय कोटे तक न पहुँच जाएँ या फिर मैदान में सिर्फ दो उम्मीदवार ही बच जायें. तब ज्यादा वोट वाले कैंडिडेट को विजेता घोषित कर दिया जाता है.
पटना शिक्षक निर्वाचन में ऐसे ही होगी जीत-हार
पटना शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र में किसी उम्मीदवार को पहली वरीयता के इतने वोट नहीं मिले हैं जिससे कि वह चुनाव जीत जाये. अब दूसरी वरीयता वाले वोट की गिनती की जायेगी. सबसे दिलचस्प बात ये है कि प्रशांत किशोर की पार्टी जन सुराज की उम्मीवार ने अच्छा खासा वोट बटोरा है. जनसुराज उम्मीदवार के वोटरों ने जिसे दूसरी वरीयता का वोट दिया होगा, उसकी जीत ही तय लग रही है.
पटना से ब्यूरो रिपोर्ट





