BIHAR NEWS : 'शाहपुर थाना क्षेत्र के बिलौंटी गांव में हुई पुलिस कार्रवाई अब सिर्फ एक युवक की मौत की कहानी नहीं रह गई है, बल्कि यह बिहार पुलिस की कार्यशैली पर कई गंभीर सवाल भी छोड़ गई है। जिस युवक ने सोशल मीडिया पर हथियार लहराते हुए पुलिस को खुली चुनौती दी, वह अब इस दुनिया में नहीं है। लेकिन उसके मरने के बाद जो सवाल खड़े हुए हैं, उनका जवाब अभी तक किसी के पास नहीं दिख रहा।
घटना की शुरुआत एक वायरल वीडियो से हुई। वीडियो में युवक हाथ में पिस्टल लेकर पुलिस को ललकार रहा था। उसने यहां तक कह दिया कि "सरेंडर नहीं, युद्ध होगा।" वीडियो वायरल होते ही पुलिस हरकत में आई और भारी संख्या में जवानों के साथ गांव पहुंच गई। दावा किया गया कि आरोपी को समझाने का प्रयास किया गया, लेकिन वह नहीं माना।
इसके बाद जो हुआ, वह पुलिस के आधिकारिक बयान और स्थानीय चर्चाओं के बीच उलझा हुआ दिखाई देता है। पुलिस का कहना है कि आरोपी ने फायरिंग की, जिसके जवाब में आत्मरक्षा में गोली चलाई गई। गोली उसके दोनों पैरों में लगी और बाद में इलाज के दौरान उसकी मौत हो गई। अब यहीं से सवालों की शुरुआत होती है।
सवाल यह कि अगर गोली केवल पैरों में लगी थी तो फिर मौत कैसे हुई? क्या घायल युवक को समय पर बेहतर चिकित्सा सुविधा उपलब्ध कराई गई? क्या पुलिस की रणनीति केवल गोली चलाने तक सीमित थी या उसे जिंदा पकड़ने की भी कोई गंभीर कोशिश हुई? इन सवालों का जवाब अभी तक साफ नहीं है। और सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब पूरा घटनाक्रम सोशल मीडिया और फेसबुक लाइव के जरिए सामने आ रहा था, तब पुलिस के पास क्या ऐसे विकल्प नहीं थे जिनसे बिना गोली चलाए स्थिति को नियंत्रित किया जा सके?
दिलचस्प बात यह भी है कि घटना के बाद विभागीय कार्रवाई की खबर सामने आई और कुछ पुलिसकर्मियों को निलंबित कर दिया गया। जानकारी के अनुसार, एसपी ने मामले की समीक्षा और जांच के बाद घटना के समय ड्यूटी पर मौजूद एक सब-इंस्पेक्टर (एसआई), एक असिस्टेंट सब-इंस्पेक्टर (एएसआई) और कई सिपाहियों को भी निलंबित कर दिया है। इसके साथ ही घटना के दौरान कर्तव्य में लापरवाही और गंभीर चूक पाए जाने के बाद शाहाबाद प्रक्षेत्र के डीआईजी डॉ. सत्यप्रकाश ने शाहपुर थानाध्यक्ष राजेश कुमार मलाकार को तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया है। यह कार्रवाई भोजपुर एसपी राज की अनुशंसा पर की गई है। अब सवाल यह कि अगर पूरी कार्रवाई नियमों के अनुसार हुई थी तो फिर निलंबन क्यों?
वहीं, पुलिस ने पिस्टल, कारतूस और मैगजीन बरामद करने का दावा किया है। यह भी कहा गया कि दोनों तरफ से फायरिंग हुई। विडंबना देखिए कि सोशल मीडिया पर चुनौती देने वाला युवक अपराधी साबित होने से पहले ही मौत के घाट उतर गया और अब पूरा मामला जांच के हवाले है। सवाल यह नहीं है कि युवक सही था या गलत। सवाल यह है कि क्या कानून का राज स्थापित करने का मतलब केवल गोली और मुठभेड़ ही रह गया है?
बिलौंटी की घटना एक बार फिर यह सोचने पर मजबूर करती है कि पुलिस की सफलता किसी आरोपी की मौत से मापी जानी चाहिए या उसे कानून के सामने जिंदा पेश करने से। क्योंकि लोकतंत्र में न्याय अदालत करती है, गोलियां नहीं। अब मजिस्ट्रेट जांच और पोस्टमार्टम रिपोर्ट का इंतजार है। लेकिन तब तक भोजपुर की यह घटना पुलिस की कार्यशैली, जवाबदेही और मुठभेड़ों की पारदर्शिता पर बड़ा सवालिया निशान बनकर खड़ी रहेगी।


