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साधु बनने निकला था 9 साल का बच्चा, फिर भाई की हत्या ने बदल दी जिंदगी... कभी गांव में चलता था सिक्का, कभी बग्घी से विधानसभा पहुंचा, अब फिर जेल की बारी!

9 साल की उम्र में साधु बनने के लिए घर छोड़ने वाला एक बच्चा आखिर कैसे मोकामा का ‘छोटे सरकार’ बन गया? राजनीति, बाहुबली छवि, गोलीबारी, जेल और अब सुप्रीम कोर्ट का आदेश... अनंत सिंह की जिंदगी किसी फिल्मी कहानी से कम नहीं है।

साधु बनने निकला था 9 साल का बच्चा, फिर भाई की हत्या ने बदल दी जिंदगी... कभी गांव में चलता था सिक्का, कभी बग्घी से विधानसभा पहुंचा, अब फिर जेल की बारी!
Tejpratap
Tejpratap
10 मिनट

बिहार की राजनीति में कुछ किरदार ऐसे होते हैं, जिनकी कहानी किसी फिल्म की पटकथा से कम नहीं लगती। शुरुआत मासूम होती है, बीच में संघर्ष आता है, फिर किरदार का कद बढ़ता जाता है और देखते ही देखते वह अपने इलाके की राजनीति का सबसे चर्चित चेहरा बन जाता है। मोकामा के अनंत सिंह की कहानी भी कुछ ऐसी ही है।


एक तरफ बचपन में महज 9 साल की उम्र में घर छोड़कर साधु बनने हरिद्वार पहुंचने वाला बच्चा... दूसरी तरफ वही बच्चा आगे चलकर मोकामा की राजनीति में ऐसा नाम बना, जिसके गांव में दाखिल होने से पहले कथित तौर पर पुलिस-प्रशासन के अफसरों को भी सोचना पड़ता था। सफेद कपड़े, काला चश्मा, बड़ी मूंछ, माथे पर लंबा तिलक और मुंह में सिगरेट—यह उनका ऐसा अंदाज बन गया, जिसने उन्हें बिहार की सियासत में एक अलग पहचान दे दी।


लेकिन अब इस कहानी का एक और मोड़ सामने है। दुलारचंद यादव हत्याकांड में सुप्रीम कोर्ट ने अनंत सिंह को 1 दिसंबर तक सरेंडर करने का आदेश दिया है। हाईकोर्ट से मिली राहत के बाद उन्हें फिर जेल जाना पड़ सकता है। इसके साथ ही कोर्ट ने जांच चार महीने में पूरी करने का निर्देश भी दिया है।यानी जिस कहानी में कभी मोकामा की सड़कों पर बाहुबली अंदाज दिखाई देता था, उसमें अब फिर अदालत, जेल और मुकदमे का अध्याय खुलता नजर आ रहा है।लेकिन इस मोड़ को समझने के लिए कहानी को कई दशक पीछे ले जाना होगा।


फ्लैशबैक... साल 1967।

पटना जिले के बाढ़ के पास नदवां गांव। चंद्रदीप सिंह के घर चार बेटों में सबसे छोटे बच्चे का जन्म हुआ। नाम रखा गया—अनंत सिंह। पढ़ाई में मन नहीं लगा और चौथी कक्षा के बाद स्कूल छूट गया। लेकिन जिंदगी की दिशा तब और बदल गई, जब महज 9 साल की उम्र में अनंत ने घर छोड़ दिया। मन पूजा-पाठ और आध्यात्मिकता में था। वह हरिद्वार पहुंच गए और साधुओं के बीच रहने लगे। कुछ समय तक साधुओं की सेवा और पूजा-पाठ में दिन बीतता रहा। फिर एक दिन साधुओं के बीच विवाद हुआ। बात इतनी बढ़ी कि मारपीट तक पहुंच गई। जिस दुनिया को अनंत ने वैराग्य की दुनिया समझा था, वहां भी हिंसा देखकर उनका मोहभंग हो गया। वह वापस अपने गांव लौट आए। और शायद यहीं से उनकी जिंदगी की फिल्म ने पहला बड़ा मोड़ लिया।


एक दिन घर में खाना खाते समय खबर आई—बड़े भाई बिराची सिंह की गोली मारकर हत्या कर दी गई है। अनंत दौड़ते हुए घटनास्थल पहुंचे। भाई की लाश सामने थी और गुस्सा उफान पर। उन्होंने ठान लिया कि भाई के हत्यारे को खुद सजा देंगे।बताया गया कि हत्या के पीछे माओवादी संगठन के एक सरगना का नाम सामने आया। पुलिस से कार्रवाई की उम्मीद थी, लेकिन समय गुजरता गया। आखिरकार अनंत ने खुद ही आरोपी को तलाशने का फैसला कर लिया।


कहानी यहीं फिल्मी हो जाती है। गंगा के उस पार आरोपी के छिपे होने की खबर मिली। साथी ने कहा कि हथियार नहीं हैं और नदी पार करना मुश्किल है। लेकिन अनंत नहीं रुके। उन्होंने नदी में छलांग लगा दी। तैरकर दूसरी तरफ पहुंचे और जंगल में आरोपी को तलाशते हुए आखिर उसके सामने जा पहुंचे।हाथ में हथियार नहीं था, तो पत्थर उठा लिया। आगे क्या हुआ, उसकी कहानी खुद अनंत ने भी बाद में ‘इंसाफ’ से जोड़कर बताई।


 इसके बाद नदवां और आसपास के इलाके में अनंत का प्रभाव बढ़ता गया। परिवार पहले से ही इलाके के बड़े जमींदार परिवारों में था। बड़े भाई दिलीप सिंह राजनीति में मजबूत थे और 1990 से 1995 के बीच मोकामा से जनता दल के विधायक भी रहे। बाद में वह लालू यादव-राबड़ी देवी सरकार में मंत्री बने। अब कहानी में एक और किरदार आता है—विवेका पहलवान। दोनों परिवारों की पुरानी रंजिश थी। विवाद बढ़ा तो एक समय दोनों पक्षों में गोलीबारी तक पहुंच गई। इसी संघर्ष में अनंत के बहनोई भूषण सिंह की मौत हुई। इसके बाद दुश्मनी और गहरी होती चली गई।


उधर एक व्यापारी के अपहरण की घटना ने अनंत की इलाके में छवि को और मजबूत किया। लोग पुलिस के पास जाने के बजाय कथित तौर पर नदवां पहुंचने लगे। व्यापारी को छुड़ाने के लिए अनंत अपने लोगों के साथ दूसरे गांव पहुंचे और गोलीबारी के बाद व्यापारी को छुड़ा लिया गया। इसके बाद इलाके में जातीय और आपराधिक संघर्ष और तेज हुआ।धीरे-धीरे नदवां सिर्फ एक गांव नहीं रहा, बल्कि अनंत सिंह का गढ़ कहा जाने लगा। उनकी सुरक्षा का इंतजाम बेहद कड़ा बताया जाता था। घोड़े, टमटम, हथियारबंद लोग और गांव के रास्तों पर निगरानी—इन सबने उनकी छवि को और रहस्यमय बना दिया।


कहानी का सबसे चर्चित दृश्य तब बताया जाता है, जब एक बार बाढ़ के ASP अनंत को गिरफ्तार करने नदवां पहुंचे। पुलिस अधिकारी बिना पर्याप्त फोर्स के गांव में दाखिल हुए और आरोप है कि उन्हें हवेली में रोक लिया गया। बाद में अधिकारियों के हस्तक्षेप से उन्हें छोड़ा गया।फिर शुरू हुआ अनंत सिंह का ‘फिल्मी लुक’ वाला दौर।


सफेद कपड़े, काला चश्मा, माथे पर लंबा तिलक, घुमावदार मूंछ और सिगरेट... जैसे किसी फिल्म के बाहुबली किरदार की पहचान हो। घर में अजगर और हाथी पालने की बातें भी उनकी चर्चा का हिस्सा बनीं। कभी डांस पार्टी का वीडियो सुर्खियों में आया तो कभी जरूरतमंदों की मदद, साड़ी बांटने, भोज और इफ्तार जैसे आयोजनों की खबरें। इलाके में कुछ लोग उन्हें ‘छोटे सरकार’ कहकर बुलाने लगे। लेकिन असली राजनीति अभी बाकी थी।


1990 के दशक में नीतीश कुमार की नजर बाढ़ इलाके में अनंत सिंह के प्रभाव पर पड़ी। दोनों करीब आए और अनंत सिंह ने नीतीश कुमार के चुनावी अभियानों में साथ दिया। 1996, 1998 और 1999 में नीतीश की चुनावी जीत के दौर में अनंत की भूमिका का जिक्र मिलता है। 2004 में तो एक जनसभा के दौरान अनंत सिंह ने नीतीश कुमार को चांदी के सिक्कों से तौला था।इसके बाद 2005 में अनंत सिंह जदयू के टिकट पर मोकामा से विधानसभा चुनाव जीतकर विधानसभा पहुंच गए।बाहुबली से विधायक बनने की कहानी पूरी हो चुकी थी, लेकिन विवादों का अध्याय खत्म नहीं हुआ।


2004 में उन पर जानलेवा हमला हुआ। गोली छाती में लगी। गंभीर हालत में अस्पताल पहुंचाया गया। इलाज के बाद जान बची, लेकिन अस्पताल से निकलते ही उन्हें गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया। 2006 में एक महिला की चिट्ठी और बाद में उसकी मौत के मामले ने भी बिहार की राजनीति में हलचल मचा दी। मामला CBI को सौंपा गया और बाद में जांच में अनंत सिंह को क्लीन चिट मिलने की बात सामने आई।फिर आया 2015। महागठबंधन की राजनीति में समीकरण बदले और अनंत सिंह को जदयू से बाहर कर दिया गया। उन्होंने निर्दलीय चुनाव लड़ा और फिर भी मोकामा जीत लिया। यानी पार्टी का टिकट चला गया, लेकिन इलाके में उनकी पकड़ कायम रही।


2019 में एक कथित ऑडियो ने फिर बिहार की राजनीति गर्म कर दी। पुलिस ने नदवां में छापेमारी की। हवेली की तलाशी हुई और हथियार मिलने का दावा किया गया। अनंत फरार बताए गए। कई टीमें तलाश में लगीं और आखिरकार उन्होंने दिल्ली की साकेत कोर्ट में सरेंडर कर दिया। इसके बाद उन्हें पटना लाकर बेऊर जेल भेजा गया। 2020 में जेल में रहते हुए उन्होंने RJD के टिकट पर चुनाव लड़ा और जीत गए। लेकिन 2022 में उन्हें 10 साल की सजा सुनाई गई और विधानसभा सदस्यता चली गई। बाद में उनकी पत्नी नीलम सिंह उपचुनाव जीतकर विधायक बनीं।2024 में आर्म्स एक्ट के एक मामले में पटना हाईकोर्ट से उन्हें राहत मिली। इसके बाद जनवरी 2025 में नौरंगा-जलालपुर में गोलीबारी की घटना में उनका नाम सामने आया और उन्होंने कोर्ट में सरेंडर किया।


फिर कहानी पहुंची दुलारचंद यादव हत्याकांड तक।अक्टूबर 2025 में चुनाव प्रचार के दौरान बसावनचक गांव में अनंत सिंह और जनसुराज समर्थक दुलारचंद यादव के बीच विवाद हुआ। इसके बाद दुलारचंद यादव की हत्या हो गई। पुलिस ने नवंबर में अनंत सिंह को गिरफ्तार किया और उन्हें बेऊर जेल भेज दिया।और अब कहानी फिर उसी मोड़ पर खड़ी है—जहां अदालत का आदेश है और 1 दिसंबर की तारीख सामने है।एक तरफ राजनीति में छह साल के लिए निष्कासन, दूसरी तरफ दुलारचंद हत्याकांड में कानूनी शिकंजा और तीसरी तरफ वर्षों से चली आ रही बाहुबली वाली छवि।


जिस आदमी की कहानी 9 साल की उम्र में साधु बनने के लिए घर छोड़ने से शुरू हुई थी, वह बिहार की राजनीति में सत्ता, संघर्ष, चुनाव, जेल और अदालत के इतने पड़ाव पार कर चुका है कि उसकी जिंदगी किसी लंबी राजनीतिक फिल्म की पटकथा जैसी लगती है।फर्क सिर्फ इतना है कि फिल्म में इंटरवल के बाद कहानी बदल जाती है।अनंत सिंह की कहानी में भी इंटरवल कई बार आया।लेकिन इस वक्त सवाल यह है—1 दिसंबर के बाद इस कहानी का अगला सीन क्या होगा?