पटना: बिहार की राजनीति में कुछ रिश्ते सिर्फ चुनावी समीकरण नहीं होते, वे अपने पीछे एक पूरा दौर छोड़ जाते हैं। ऐसा ही एक नाम है अनंत सिंह और नीतीश कुमार का। करीब दो दशक पहले जब नीतीश कुमार बाढ़ की राजनीति में अपनी पकड़ बनाए रखने की कोशिश कर रहे थे, तब मोकामा के अनंत सिंह का नाम उनके आसपास तेजी से सुनाई देने लगा था। एक कार्यक्रम में अनंत सिंह ने नीतीश कुमार को चांदी के सिक्कों से तौला तो यह तस्वीर बिहार की सियासत में खूब चर्चा का विषय बनी। लेकिन इस कहानी का दूसरा अध्याय ज्यादा स्याह था।
साल 2004 में ही बाढ़ लोकसभा चुनाव के कुछ महीनों बाद पटना के लदमा गांव में पुलिस और एसटीएफ की एक बड़ी कार्रवाई हुई। मुठभेड़ में पुलिस के मुताबिक अनंत सिंह गिरोह से जुड़े आठ लोग मारे गए। इस कार्रवाई में घायल एक एसटीएफ जवान ने भी अस्पताल ले जाते समय दम तोड़ दिया। कुल नौ लोगों की मौत ने उस समय पूरे बिहार को हिला दिया था।

अब करीब 22 साल बाद अनंत सिंह के एक बयान ने उसी पुराने घटनाक्रम को फिर चर्चा में ला दिया है। नीतीश कुमार के साथ अपने पुराने राजनीतिक रिश्ते का जिक्र करते हुए अनंत सिंह ने अपने 'नौ लोगों की कुर्बानी' की बात कही। उनके इस बयान के बाद 2 अगस्त 2004 की लदमा मुठभेड़ का इतिहास फिर राजनीतिक चर्चाओं में लौट आया है।
बाढ़ की राजनीति और अनंत सिंह की एंट्री
कहानी को समझने के लिए थोड़ा पीछे जाना होगा। साल 2004 में नीतीश कुमार बिहार की राजनीति में अपने लिए नई जमीन तैयार कर रहे थे। उस समय वह बाढ़ लोकसभा सीट से लगातार चुनाव जीतते रहे थे। 1989 से लेकर 1999 तक उन्होंने इस सीट से कई बार जीत दर्ज की थी। लेकिन 2004 का चुनाव उनके लिए अलग था।

नीतीश कुमार इस बार बाढ़ के साथ-साथ नालंदा से भी मैदान में थे। बाढ़ में उनके सामने आरजेडी के विजय कृष्ण थे। दूसरी तरफ इलाके की स्थानीय राजनीति में मोकामा का प्रभाव भी अहम था। अनंत सिंह के परिवार की इलाके में मजबूत पकड़ मानी जाती थी। उनके भाई दिलीप सिंह मोकामा से विधायक रह चुके थे।

इसी दौर में बाढ़-मोकामा की राजनीति में बाहुबली शक्ति का एक और बड़ा नाम सूरजभान सिंह भी था। वर्ष 2000 के विधानसभा चुनाव में सूरजभान सिंह ने दिलीप सिंह को हराया था। बाद के वर्षों में सूरजभान की नजदीकी रामविलास पासवान के साथ बढ़ी और 2004 के लोकसभा चुनाव में वह लोजपा के टिकट पर बलिया से मैदान में उतर गए। यानी बाढ़ की राजनीति में समीकरण लगातार बदल रहे थे। इसी राजनीतिक उथल-पुथल के बीच अनंत सिंह और नीतीश कुमार की नजदीकी बढ़ने की चर्चा तेज हुई।
जब चांदी के सिक्कों से तौले गए थे नीतीश

2004 के चुनावी दौर में अनंत सिंह ने एक कार्यक्रम में नीतीश कुमार को चांदी के सिक्कों से तौला। यह सिर्फ एक स्थानीय कार्यक्रम की तस्वीर नहीं रही। देखते ही देखते यह बिहार की राजनीति में दोनों के रिश्ते का प्रतीक बन गई।हालांकि चुनावी नतीजे नीतीश कुमार की उम्मीद के मुताबिक नहीं रहे। बाढ़ सीट पर आरजेडी के विजय कृष्ण ने उन्हें 37,688 वोटों से हरा दिया। वहीं नालंदा से नीतीश कुमार चुनाव जीत गए। उस समय बिहार की सत्ता पर राबड़ी देवी थीं और लालू प्रसाद यादव का राजनीतिक प्रभाव कायम था। इसी दौर में अनंत सिंह के खिलाफ प्रशासनिक कार्रवाई को लेकर भी चर्चाएं तेज हुईं। फिर आया अगस्त 2004। और यहीं से कहानी ने ऐसा मोड़ लिया, जिसकी चर्चा दो दशक बाद भी खत्म नहीं हुई।
2 अगस्त 2004 की वह सुबह

पटना जिले के बाढ़ अनुमंडल का लदमा गांव। तारीख थी 2 अगस्त 2004। सुबह-सुबह गांव में पुलिस और विशेष कार्य बल यानी एसटीएफ की टीम पहुंची। समकालीन मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक पुलिस को सूचना मिली थी कि अनंत सिंह गिरोह से जुड़े लोग किसी बड़ी वारदात की तैयारी कर रहे हैं। उस समय अनंत सिंह खुद न्यायिक हिरासत में थे। पुलिस टीम ने गांव में कार्रवाई शुरू की। पुलिस के मुताबिक संदिग्ध लोगों की तरफ से फायरिंग हुई और इसके बाद जवाबी कार्रवाई शुरू हो गई। देखते ही देखते स्थिति मुठभेड़ में बदल गई। कई घंटे तक गोलियां चलने की बात सामने आई। उस दिन लदमा गांव बिहार की सुर्खियों में था। समकालीन रिपोर्टों के मुताबिक इस कार्रवाई में आठ लोग मारे गए। पुलिस ने उन्हें अनंत सिंह से जुड़े लोग बताया था और दावा किया था कि वे हत्या, अपहरण, लूट और रंगदारी समेत कई मामलों में वांछित थे।लेकिन इस कार्रवाई में पुलिस ने भी अपना एक जवान खो दिया। एसटीएफ जवान रघुवंश प्रताप सिंह गोली लगने से घायल हुए थे। उन्हें इलाज के लिए पटना लाया जा रहा था, लेकिन अस्पताल पहुंचने से पहले ही उनकी मौत हो गई। इस तरह उस मुठभेड़ में कुल नौ लोगों की जान चली गई।

समय आगे बढ़ गया। बिहार की राजनीति भी कई करवटें बदल चुकी है। नीतीश कुमार और अनंत सिंह के रिश्तों के बीच भी कई दौर आए। कभी नजदीकी की चर्चा हुई तो कभी राजनीतिक दूरी की।लेकिन 2026 में अनंत सिंह के एक बयान ने अचानक 2004 की उस सुबह को फिर याद दिला दिया।अनंत सिंह ने पुराने दौर का जिक्र करते हुए अपने नौ लोगों की कुर्बानी की बात कही। यही 'नौ' अब राजनीतिक बहस का सबसे चर्चित हिस्सा बन गया है।क्योंकि 2 अगस्त 2004 की लदमा मुठभेड़ में भी कुल नौ लोगों की मौत हुई थी—आठ लोग, जिन्हें पुलिस ने अनंत सिंह गिरोह से जुड़ा बताया था, और एक एसटीएफ जवान। यही समानता अब सवाल खड़े कर रही है कि क्या अनंत सिंह का हालिया बयान उसी पुराने घटनाक्रम की ओर इशारा था? या वह अपने राजनीतिक अतीत और संघर्षों को एक व्यापक संदर्भ में बता रहे थे? इन सवालों का अंतिम जवाब अनंत सिंह के बयान की सटीक मंशा से ही मिल सकता है। लेकिन इतना जरूर है कि उनके शब्दों ने बिहार के राजनीतिक इतिहास का एक ऐसा पन्ना फिर खोल दिया है, जिसे दो दशक पहले ही बंद समझ लिया गया था।
चांदी के सिक्कों से 'नौ लोगों' तक

2004 की तस्वीर में एक तरफ नीतीश कुमार हैं, जिन्हें अनंत सिंह चांदी के सिक्कों से तौल रहे हैं। दूसरी तरफ उसी साल कुछ महीनों बाद लदमा की वह सुबह है, जब गोलियों की आवाज के बीच नौ लोगों की जान चली गई।22 साल बाद जब अनंत सिंह फिर अपने पुराने राजनीतिक दौर, नीतीश कुमार के साथ अपने संबंधों और 'नौ लोगों' की कुर्बानी का जिक्र करते हैं, तो दोनों घटनाएं एक बार फिर एक ही कहानी के दो अलग-अलग पन्नों की तरह सामने आ जाती हैं।बिहार की राजनीति में चेहरे बदलते हैं, गठबंधन बदलते हैं और सत्ता के समीकरण भी बदलते हैं। लेकिन कुछ घटनाएं ऐसी होती हैं, जो समय बीतने के बाद भी राजनीतिक स्मृति से बाहर नहीं जातीं।लदमा की 2 अगस्त 2004 की मुठभेड़ भी ऐसी ही एक घटना है।और अनंत सिंह के हालिया बयान ने एक बार फिर सवाल खड़ा कर दिया है—क्या बिहार की सियासत में दो दशक पुरानी उस कहानी का कोई नया अध्याय शुरू हो गया है?





