DESK: कला को समझने और उसे आकार देने के लिए आंखों की रोशनी जरूरी नहीं, बल्कि हुनर, अनुभव और कल्पना की जरूरत होती है। उत्तर प्रदेश के बस्ती जिले के बाबुरहवा गांव में हर साल आने वाले 50 वर्षीय नेत्रहीन मूर्तिकार रामपाल इसकी मिसाल बन गये हैं। जन्म से दृष्टिहीन रामपाल पिछले करीब 25 वर्षों से सिर्फ स्पर्श, अनुभव और कल्पना के सहारे भगवान गणेश, मां दुर्गा समेत देवी-देवताओं की भव्य प्रतिमाएं तैयार कर रहे हैं।
पश्चिम बंगाल के निकुंज शहर से बस्ती के बाबुरहवा गांव तक रामपाल की यह सालाना यात्रा करीब ढाई दशक से जारी है। वह नवरात्र और दशहरा से लगभग छह महीने पहले गांव पहुंचते हैं और मिट्टी से देवी-देवताओं की प्रतिमाएं बनाना शुरू कर देते हैं। त्योहार खत्म होने के बाद वह वापस पश्चिम बंगाल लौट जाते हैं।
छूकर महसूस करते हैं मूर्तियों का आकार
रामपाल पारंपरिक कुम्हार परिवार से आते हैं। बचपन से ही मिट्टी के बीच पले-बढ़े रामपाल ने मूर्तियां बनाने का हुनर अपने पिता विनायक कृष्ण पाल से सीखा। जन्म से नेत्रहीन होने के बावजूद वह अपनी उंगलियों से मिट्टी के आकार, चेहरे के भाव और शरीर की बनावट को महसूस कर प्रतिमाओं को आकार देते हैं।
रामपाल का कहना है कि देवी-देवताओं के रूप और आकार उनके मन में पहले से अंकित हैं। इसलिए प्रतिमा बनाने के लिए उन्हें आंखों की जरूरत नहीं पड़ती। वह अपने अनुभव और कल्पना के आधार पर मिट्टी को छूकर उसके आकार को समझते हैं और धीरे-धीरे प्रतिमा को तैयार करते हैं।
हर साल बनाते हैं 40 से 50 प्रतिमाएं
रामपाल हर साल करीब 40 से 50 मूर्तियां तैयार करते हैं। उनके इस काम में परिवार भी पूरा सहयोग करता है। उनके भाई संजय पाल, जो खुद भी जन्म से दृष्टिहीन हैं, पहले उनके साथ मूर्तियां बनाने में मदद करते थे। अब उनकी पत्नी कंचन पाल और बच्चे भी इस काम में उनका साथ देते हैं।
मूर्तियां बनाने के अलावा रामपाल साल के बाकी समय मिट्टी के बर्तन, खिलौने और सजावटी सामान तैयार कर अपनी आजीविका चलाते हैं। त्योहारों के दौरान तैयार की गई मिट्टी की प्रतिमाओं को रंगने का काम भी परिवार के सहयोग से पूरा किया जाता है।
रंगों का चुनाव भी अनुभव से करते हैं
आंखों की रोशनी नहीं होने के बावजूद रामपाल प्रतिमाओं को अंतिम रूप देने में भी खास भूमिका निभाते हैं। अपने अनुभव और स्पर्श के आधार पर वह मूर्तियों की बारीकियों को समझते हैं। रंगाई के अंतिम चरण में मिट्टी की प्रतिमाओं को सजाकर जीवंत रूप दिया जाता है।
‘शरद सम्मान’ से हो चुके हैं सम्मानित
रामपाल की कला और उनकी संघर्षपूर्ण यात्रा को राष्ट्रीय स्तर पर भी पहचान मिली है। उनकी प्रतिभा को देखते हुए एशियन पेंट्स ने वर्ष 2020 में उन्हें ‘शरद सम्मान’ से सम्मानित किया था। इसके अलावा उनके जीवन, संघर्ष और कला पर आधारित एक डॉक्यूमेंट्री भी बनाई गई है, जिसे देश के अलग-अलग हिस्सों में प्रदर्शित किया गया और सराहना मिली।
रामपाल के जज्बे को देखकर यह समझा जा सकता है कि परिस्थितियां चाहे कितनी भी चुनौतीपूर्ण हों, हुनर और आत्मविश्वास के दम पर इंसान अपनी अलग पहचान बना सकता है। वह हर साल मिट्टी को स्पर्श और कल्पना से आकार देकर देवी-देवताओं की प्रतिमाओं में जान डालते हैं।
रामपाल की कला बिना देखे मिट्टी को आकार देकर देवी-देवताओं की सुंदर प्रतिमाएं तैयार करने की प्रतिभा इतनी चर्चा में आ गई कि देश की एक बहुचर्चित पेंट कंपनी ने एक विशेष सुंदर ‘शॉर्ट फिल्म’ बनाई है। इसमें रामपाल के संघर्ष, हुनर और मूर्तियां बनाने के अनोखे तरीके को दिखाया गया। उनकी कला यह साबित करती है कि हुनर के सामने कोई कमी बाधा नहीं बन सकती।