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26-Jan-2026 07:47 PM
By FIRST BIHAR
UGC New Rules: विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) द्वारा लागू किए गए नए ‘Promotion of Equity in Higher Education Institutions Regulations, 2026’ को लेकर देशभर में विरोध तेज हो गया है। इस नियम के खिलाफ सोशल मीडिया पर #UGCRollback ट्रेंड करने के बाद मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गया है। इसी क्रम में उत्तर प्रदेश के बरेली के सिटी मजिस्ट्रेट अलंकार अग्निहोत्री ने नियम के विरोध में अपने पद से इस्तीफा दे दिया है।
क्या है UGC का नया नियम?
UGC ने 13 जनवरी को ‘Promotion of Equity in Higher Education Institutions Regulations, 2026’ नाम से नया नियम लागू किया है। इस नियम का उद्देश्य उच्च शिक्षण संस्थानों में SC, ST और OBC छात्रों के साथ होने वाले जातिगत भेदभाव को रोकना और उस पर निगरानी रखना बताया गया है। हालांकि, इस नियम को लेकर सामान्य वर्ग (सवर्ण समाज) में गहरा असंतोष देखा जा रहा है।
सिटी मजिस्ट्रेट का आरोप
इस्तीफा देने वाले सिटी मजिस्ट्रेट अलंकार अग्निहोत्री ने कहा कि यह नियम कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में पढ़ने वाले सामान्य वर्ग के छात्रों को स्वघोषित अपराधी बना देता है। उन्होंने इसे एकतरफा और भेदभाव को बढ़ाने वाला बताया।
नियम में किए गए प्रमुख प्रावधान
UGC के नए Equity Rule के तहत सभी विश्वविद्यालयों, कॉलेजों और उच्च शिक्षण संस्थानों को 24x7 हेल्पलाइन शुरू करनी होगी। इसके साथ ही साथ Equal Opportunity Centre की स्थापना करनी होगी। इतना ही नहीं Equity Committee और Equity Squad का गठन करना होगा। UGC ने स्पष्ट किया है कि नियमों का पालन न करने पर संस्थानों की मान्यता रद्द करने या फंड रोकने जैसी सख्त कार्रवाई की जा सकती है।
सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका
UGC के इस नियम को सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका (PIL) के जरिए चुनौती दी गई है। याचिका में नियम के सेक्शन 3(C) को भेदभावपूर्ण और मनमाना बताया गया है। याचिकाकर्ता का कहना है कि यह प्रावधान अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, समानता और व्यक्तिगत स्वतंत्रता जैसे मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करता है और UGC अधिनियम 1956 के भी खिलाफ है।
UGC की दलील
UGC का कहना है कि वर्ष 2020 से 2025 के बीच जातिगत भेदभाव से जुड़ी शिकायतों में 100 प्रतिशत से अधिक की वृद्धि हुई है। आयोग के अनुसार, रोहित वेमुला और पायल तड़वी मामलों में सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियों के बाद ऐसी निगरानी व्यवस्था जरूरी हो गई थी।
छात्र संगठनों की आपत्ति
छात्र संगठनों का कहना है कि नए नियम में झूठी शिकायतों से निपटने के लिए कोई स्पष्ट प्रावधान नहीं है। साथ ही Equity Committee में सामान्य वर्ग के प्रतिनिधित्व को अनिवार्य नहीं किया गया है। छात्रों का आरोप है कि Equity Squad को अत्यधिक अधिकार दिए गए हैं और ‘भेदभाव’ की परिभाषा भी स्पष्ट नहीं है।
दो पक्षों में बंटी राय
UGC का कहना है कि प्रभावी निगरानी के बिना कैंपस में समान और सुरक्षित माहौल संभव नहीं है, जबकि विरोध कर रहे छात्र इसे एकतरफा नियम बताते हुए आशंका जता रहे हैं कि इससे उच्च शिक्षा संस्थानों में भेदभाव और असंतोष बढ़ सकता है।
UGC New Rules: विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) द्वारा लागू किए गए नए ‘Promotion of Equity in Higher Education Institutions Regulations, 2026’ को लेकर देशभर में विरोध तेज हो गया है। इस नियम के खिलाफ सोशल मीडिया पर #UGCRollback ट्रेंड करने के बाद मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गया है। इसी क्रम में उत्तर प्रदेश के बरेली के सिटी मजिस्ट्रेट अलंकार अग्निहोत्री ने नियम के विरोध में अपने पद से इस्तीफा दे दिया है।
क्या है UGC का नया नियम?
UGC ने 13 जनवरी को ‘Promotion of Equity in Higher Education Institutions Regulations, 2026’ नाम से नया नियम लागू किया है। इस नियम का उद्देश्य उच्च शिक्षण संस्थानों में SC, ST और OBC छात्रों के साथ होने वाले जातिगत भेदभाव को रोकना और उस पर निगरानी रखना बताया गया है। हालांकि, इस नियम को लेकर सामान्य वर्ग (सवर्ण समाज) में गहरा असंतोष देखा जा रहा है।
सिटी मजिस्ट्रेट का आरोप
इस्तीफा देने वाले सिटी मजिस्ट्रेट अलंकार अग्निहोत्री ने कहा कि यह नियम कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में पढ़ने वाले सामान्य वर्ग के छात्रों को स्वघोषित अपराधी बना देता है। उन्होंने इसे एकतरफा और भेदभाव को बढ़ाने वाला बताया।
नियम में किए गए प्रमुख प्रावधान
UGC के नए Equity Rule के तहत सभी विश्वविद्यालयों, कॉलेजों और उच्च शिक्षण संस्थानों को 24x7 हेल्पलाइन शुरू करनी होगी। इसके साथ ही साथ Equal Opportunity Centre की स्थापना करनी होगी। इतना ही नहीं Equity Committee और Equity Squad का गठन करना होगा। UGC ने स्पष्ट किया है कि नियमों का पालन न करने पर संस्थानों की मान्यता रद्द करने या फंड रोकने जैसी सख्त कार्रवाई की जा सकती है।
सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका
UGC के इस नियम को सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका (PIL) के जरिए चुनौती दी गई है। याचिका में नियम के सेक्शन 3(C) को भेदभावपूर्ण और मनमाना बताया गया है। याचिकाकर्ता का कहना है कि यह प्रावधान अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, समानता और व्यक्तिगत स्वतंत्रता जैसे मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करता है और UGC अधिनियम 1956 के भी खिलाफ है।
UGC की दलील
UGC का कहना है कि वर्ष 2020 से 2025 के बीच जातिगत भेदभाव से जुड़ी शिकायतों में 100 प्रतिशत से अधिक की वृद्धि हुई है। आयोग के अनुसार, रोहित वेमुला और पायल तड़वी मामलों में सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियों के बाद ऐसी निगरानी व्यवस्था जरूरी हो गई थी।
छात्र संगठनों की आपत्ति
छात्र संगठनों का कहना है कि नए नियम में झूठी शिकायतों से निपटने के लिए कोई स्पष्ट प्रावधान नहीं है। साथ ही Equity Committee में सामान्य वर्ग के प्रतिनिधित्व को अनिवार्य नहीं किया गया है। छात्रों का आरोप है कि Equity Squad को अत्यधिक अधिकार दिए गए हैं और ‘भेदभाव’ की परिभाषा भी स्पष्ट नहीं है।
दो पक्षों में बंटी राय
UGC का कहना है कि प्रभावी निगरानी के बिना कैंपस में समान और सुरक्षित माहौल संभव नहीं है, जबकि विरोध कर रहे छात्र इसे एकतरफा नियम बताते हुए आशंका जता रहे हैं कि इससे उच्च शिक्षा संस्थानों में भेदभाव और असंतोष बढ़ सकता है।