Bihar Court News: पटना हाई कोर्ट के एक हालिया फैसले पर सुप्रीम कोर्ट ने गंभीर चिंता जताई है. शीर्ष अदालत ने उस टिप्पणी पर सवाल उठाए हैं, जिसमें कहा गया था कि किसी महिला का सलवार उतारने की कोशिश करना और उसके सीने को दबाना अपने आप में दुष्कर्म के प्रयास (Attempt to Rape) की श्रेणी में नहीं आता. इस मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने संकेत दिया कि वह इस मुद्दे पर विस्तृत आदेश जारी करेगा. इस फैसले के बाद न्यायिक संवेदनशीलता, महिलाओं की सुरक्षा और यौन अपराधों की कानूनी व्याख्या को लेकर देशभर में नई बहस शुरू हो गई है.


मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने बुधवार को इस मामले की सुनवाई की. पीठ में न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहन भी शामिल थे. यह सुनवाई उस स्वत: संज्ञान (सुओ मोटू) मामले के दौरान हुई, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाई कोर्ट के एक विवादित फैसले के बाद शुरू किया था. उसी मामले में सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रीय न्यायिक अकादमी को यौन अपराधों की सुनवाई के दौरान न्यायिक संवेदनशीलता बढ़ाने के लिए दिशा-निर्देश तैयार करने का निर्देश दिया था.


सुनवाई के दौरान वरिष्ठ अधिवक्ता शोभा गुप्ता ने पटना हाई कोर्ट के हालिया फैसले का मुद्दा उठाते हुए कहा कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा इलाहाबाद हाई कोर्ट का विवादित फैसला रद्द किए जाने के बावजूद लगभग समान परिस्थितियों में पटना हाई कोर्ट ने वैसी ही टिप्पणियां की हैं. उन्होंने कहा कि यह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है कि शीर्ष अदालत के स्पष्ट रुख के बाद भी इस प्रकार के आदेश सामने आ रहे हैं. वरिष्ठ अधिवक्ता एच.एस. फूलका ने भी इस पर सहमति जताई. इस पर मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने कहा कि कई बार पर्याप्त शोध और कानूनी अध्ययन के अभाव में इस तरह के फैसले सामने आ जाते हैं. उन्होंने स्पष्ट किया कि सुप्रीम कोर्ट इस मामले पर भी विस्तृत आदेश पारित करेगा.


यह मामला बिहार के बांका जिले के अमरपुर थाना क्षेत्र से जुड़ा है. अभियोजन के अनुसार पीड़िता अपने पिता के साथ हिमांशु नामक व्यक्ति के स्टूडियो में फोटो खिंचवाने गई थी. आरोप है कि स्टूडियो संचालक हिमांशु ने पीड़िता के पिता को बाहर बैठाकर युवती को अंदर बुलाया, दरवाजा बंद कर दिया और उसके साथ अभद्र व्यवहार किया. शिकायत के मुताबिक आरोपी ने दुष्कर्म की नीयत से पीड़िता का सलवार उतारने की कोशिश की और उसके सीने को दबाया. पीड़िता के शोर मचाने पर उसके पिता दरवाजा तोड़कर अंदर पहुंचे, जिसके बाद आरोपी मौके से फरार हो गया.


इस मामले में अमरपुर थाना कांड संख्या 14/2008 दर्ज किया गया था. बांका के अपर सत्र न्यायाधीश-1 ने एक नवंबर 2023 को आरोपी हिमांशु पाठक उर्फ मिथिया को दोषी ठहराते हुए तीन वर्ष के सश्रम कारावास और पांच हजार रुपये जुर्माने की सजा सुनाई थी.


हालांकि, दोषसिद्धि के खिलाफ आरोपी ने पटना हाई कोर्ट में अपील दायर की. न्यायमूर्ति पूर्णेंदु सिंह की एकल पीठ ने 9 जुलाई को निचली अदालत का फैसला पलटते हुए आरोपी को सभी आरोपों से बरी कर दिया. हाई कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि मामले में पर्याप्त चिकित्सीय और अन्य साक्ष्य उपलब्ध नहीं हैं, जिनके आधार पर यह निष्कर्ष निकाला जा सके कि आरोपी ने दुष्कर्म का प्रयास किया था. अदालत ने यह भी कहा कि अभियोजन पक्ष आरोपों को संदेह से परे साबित करने में सफल नहीं हुआ.


गौरतलब है कि मार्च 2025 में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने भी एक मामले में कहा था कि नाबालिग लड़की के स्तन पकड़ना, पायजामे का नाड़ा तोड़ना और उसे पुलिया के नीचे खींचने की कोशिश प्रथम दृष्टया दुष्कर्म का प्रयास नहीं बल्कि पॉक्सो कानून के तहत गंभीर यौन उत्पीड़न का मामला बनता है. इस फैसले पर देशभर में तीखी प्रतिक्रिया हुई थी. इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने स्वत: संज्ञान लेते हुए इलाहाबाद हाई कोर्ट का आदेश रद्द कर दिया था और राष्ट्रीय न्यायिक अकादमी को यौन अपराधों से जुड़े मामलों में न्यायिक संवेदनशीलता बढ़ाने के लिए व्यापक दिशा-निर्देश तैयार करने का निर्देश दिया था. अब सुप्रीम कोर्ट ने उन दिशा-निर्देशों को मंजूरी देते हुए स्पष्ट किया है कि यौन अपराधों से जुड़े मामलों में न्यायिक प्रक्रिया पीड़ित-केंद्रित, संवेदनशील और कानून की मंशा के अनुरूप होनी चाहिए.