Delhi High Court : अभिनय और रंगमंच शिक्षा के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक फैसला देते हुए दिल्ली हाई कोर्ट ने नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा (NSD) के तीन वर्षीय डिप्लोमा कोर्स में प्रवेश के लिए तय की गई 30 साल की अधिकतम उम्र सीमा पर अंतरिम रोक लगा दी है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि कला और अभिनय जैसे रचनात्मक क्षेत्र केवल उम्र पर आधारित नहीं हो सकते, बल्कि यह पूरी तरह प्रतिभा, कौशल और अभिव्यक्ति क्षमता पर निर्भर करते हैं।
यह आदेश न्यायमूर्ति जसमीत सिंह की एकल पीठ ने प्रारंभिक सुनवाई के दौरान पारित किया। कोर्ट ने कहा कि पहली नजर में यह प्रतीत होता है कि उम्र की कठोर सीमा लगाना संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार), अनुच्छेद 19(1)(g) (व्यवसाय चुनने की स्वतंत्रता) और अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता) का उल्लंघन हो सकता है।
34 और 42 वर्षीय याचिकाकर्ताओं को मिली राहत
इस मामले में दो याचिकाकर्ताओं, जिनकी आयु क्रमशः 34 और 42 वर्ष है, ने NSD की प्रवेश अधिसूचना को चुनौती दी थी। अधिसूचना के अनुसार 1 जुलाई 2026 तक अधिकतम आयु सीमा 30 वर्ष निर्धारित की गई थी। याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया कि वे योग्यता और अनुभव के आधार पर पूरी तरह सक्षम हैं, लेकिन केवल उम्र के कारण उन्हें आवेदन प्रक्रिया से बाहर कर दिया गया। कोर्ट ने उनकी दलीलों को प्राथमिक स्तर पर स्वीकार करते हुए उन्हें उम्र की बाधा के बिना प्रवेश प्रक्रिया में शामिल होने की अनुमति दे दी।
NSD की उम्र सीमा पर उठे सवाल
नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा (NSD) भारत का एक प्रमुख नाट्य प्रशिक्षण संस्थान है, जहां देशभर से छात्र अभिनय, निर्देशन और रंगमंच की बारीकियों को सीखने आते हैं। संस्थान द्वारा तीन वर्षीय डिप्लोमा कोर्स के लिए 30 वर्ष की अधिकतम आयु सीमा तय की गई थी, जिसे अब अदालत में चुनौती दी गई है।
याचिकाकर्ताओं की ओर से अधिवक्ता विवेक गुरनानी ने दलील दी कि यह आयु सीमा मनमानी है और इसका किसी भी शैक्षणिक या कलात्मक आवश्यकता से सीधा संबंध नहीं है। उनका कहना था कि अभिनय एक ऐसा क्षेत्र है, जिसे किसी भी उम्र में सीखा और निखारा जा सकता है।
कोर्ट की अहम टिप्पणी
कोर्ट ने सुनवाई के दौरान कहा कि अभिनय और रंगमंच जैसे क्षेत्र “स्किल-आधारित” हैं, जिनका विकास जीवन के किसी भी चरण में संभव है। इसलिए केवल उम्र के आधार पर किसी उम्मीदवार को अवसर से वंचित करना उचित नहीं प्रतीत होता। न्यायमूर्ति जसमीत सिंह ने यह भी कहा कि उम्र की इतनी सख्त सीमा का कोर्स के मूल उद्देश्य—अर्थात् कलात्मक प्रतिभा को बढ़ावा देना—से सीधा संबंध नहीं दिखता।
मौलिक अधिकारों से जुड़ा मुद्दा
कोर्ट ने यह भी संकेत दिया कि यह मामला केवल एक प्रवेश नीति का नहीं बल्कि व्यापक रूप से पेशेवर और रचनात्मक शिक्षा में उम्र आधारित सीमाओं की वैधता से जुड़ा हुआ है। अदालत ने कहा कि ऐसी नीतियां कई योग्य उम्मीदवारों को अनावश्यक रूप से बाहर कर सकती हैं, जो उनके मौलिक अधिकारों का हनन हो सकता है।
अंतरिम राहत और आगे की सुनवाई
फिलहाल कोर्ट ने विवादित उम्र सीमा के प्रावधान पर रोक लगाते हुए याचिकाकर्ताओं को आवेदन करने और चयन प्रक्रिया में भाग लेने की अनुमति दे दी है। साथ ही यह मामला आगे की विस्तृत सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया जाएगा, जिसमें इस नीति की संवैधानिक वैधता पर अंतिम निर्णय लिया जाएगा।इस फैसले को रंगमंच और कला शिक्षा के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है, जो भविष्य में देश के अन्य कला संस्थानों की प्रवेश नीतियों को भी प्रभावित कर सकता है।