DESK: भगवान भोले नाथ का भक्त कछुआ इन दिनों चर्चा में बना हुआ है। ढिकुली गांव का गरल कंठेश्वर महादेव मंदिर भी इस अनोखी वजह से चर्चा में बना हुआ है।
दरअसल हम बात उत्तराखंड के नैनीताल जिले के रामनगर स्थित ढिकुली गांव का गरल कंठेश्वर महादेव मंदिर की कर रहे हैं। जो जंगल और नदी-नालों के बीच स्थित है। जहां पिछले कई वर्षों से शाम ढलते ही एक विशालकाय कछुआ पहुंचता है। मंदिर में वह कुछ देर ठहरता है और प्रसाद खाने के बाद वापस जंगल की ओर चला जाता है। खास बात यह है कि कछुए के मंदिर पहुंचने का समय लगभग तय रहता है और वह हर बार एक ही रास्ते से मंदिर आता-जाता दिखाई देता है।
कछुए के इस व्यवहार की चर्चा अब होने लगी है।कुछ लोग इसे भगवान शिव के प्रति उसकी आस्था से जोड़कर देखते हैं, जबकि वन्यजीव प्रेमियों और विशेषज्ञों के मुताबिक इसके पीछे भोजन की तलाश या कोई प्राकृतिक व्यवहार हो सकता है।
महाभारत काल से जुड़ी है मंदिर की मान्यता
गरल कंठेश्वर महादेव मंदिर को लेकर स्थानीय स्तर पर कई प्राचीन मान्यताएं प्रचलित हैं। लोगों के अनुसार इस मंदिर का संबंध महाभारत काल से है। मान्यता है कि अज्ञातवास के दौरान पांडवों ने इस क्षेत्र में कुछ समय बिताया था और इसी दौरान यहां शिवलिंग की स्थापना की गई थी। स्थानीय लोगों का यह भी मानना है कि शिवलिंग की स्थापना महाबली भीम ने की थी।
वर्षों से तय समय पर मंदिर पहुंच रहा कछुआ
लोगों का कहना है कि इस कछुए को कई वर्षों से मंदिर आते-जाते वो देख रहे हैं। कछुआ शाम ढलते ही मंदिर पहुंचता है। मंदिर के बाबा उसे प्रसाद देते हैं, जिसे खाने के बाद वह कुछ देर रुकता है और फिर उसी रास्ते से जंगल की ओर लौट जाता है।
हैरानी की बात है कि कछुए ने मंदिर का रास्ता याद कर लिया है। यही कारण है कि वो मंदिर में रोज शाम में पहुंचता है और प्रसाद खाने के बाद वापस जंगल में चला जाता है। कुछ लोग इसे धार्मिक आस्था से जोड़कर देख रहे हैं।
वैज्ञानिक अध्ययन से सामने आ सकता है कारण
रामनगर के पीएनजीपीजी राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय के प्राचार्य डॉ. एमसी पांडेय का कहना है कि कछुए का लगातार लगभग निर्धारित समय पर मंदिर में पहुंचना अध्ययन का विषय है। रामनगर के पीएनजीपीजी राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय के प्राचार्य डॉ. एमसी पांडेय का यह कहना है। उनका कहना है कि केवल भोजन को इसके पीछे की वजह मानना पर्याप्त नहीं होगा। वन्यजीव विशेषज्ञ यदि कछुए की आवाजाही, उसके आने-जाने के रास्ते, आसपास के जलस्रोत और भोजन व्यवहार का अध्ययन करें तो इसके पीछे की वजह को बेहतर तरीके से समझा जा सकता है।
वन विभाग ने बताई संभावित प्राकृतिक वजह
कॉर्बेट टाइगर रिजर्व के पार्क वार्डन बिंदर पाल सिंह ने बताया कि मानसून के दौरान कछुए सहित कई सरीसृप अपने ठिकानों से बाहर निकलते हैं। गरल कंठेश्वर महादेव मंदिर नदी-नालों और वन क्षेत्र के करीब स्थित है, इसलिए कछुए का वहां पहुंचना असामान्य नहीं माना जा सकता। उन्होंने संभावना जताई कि मंदिर में मिलने वाली खाने-पीने की सामग्री भी कछुए को वहां आकर्षित कर सकती है। फिलहाल यह विशालकाय कछुआ स्थानीय लोगों के लिए आस्था और जिज्ञासा का केंद्र बना हुआ है।