High Court: कर्नाटक हाईकोर्ट ने वैवाहिक क्रूरता से जुड़े एक मामले में अहम टिप्पणी करते हुए कहा है कि पति-पत्नी का एक ही मकान में अलग-अलग कमरों में रहना अपने आप में वैवाहिक क्रूरता साबित नहीं करता। हालांकि, अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि अलग रहने के साथ लगातार झगड़े, गाली-गलौज, भावनात्मक उपेक्षा और खराब व्यवहार जैसे हालात हों, तो पूरे घटनाक्रम को समग्र रूप से देखते हुए मानसिक क्रूरता का निष्कर्ष निकाला जा सकता है।
यह फैसला हाईकोर्ट ने पति की ओर से दायर अपील पर सुनाया। अदालत ने फैमिली कोर्ट के उस फैसले को बरकरार रखा, जिसमें वैवाहिक क्रूरता के आधार पर विवाह को भंग कर दिया गया था। साथ ही पत्नी के लिए 25,000 रुपये प्रति माह स्थायी भरण-पोषण का आदेश भी बरकरार रखा गया।
2001 में हुई थी शादी, दो बच्चे हैं
मामले के अनुसार, पति-पत्नी की शादी 11 नवंबर 2001 को हुई थी और उनके दो बच्चे हैं। दोनों कुछ समय तक एक ही इमारत में रहे, लेकिन अलग-अलग कमरों में रहते थे और व्यावहारिक रूप से अलग जीवन जी रहे थे। बाद में पत्नी अपने बच्चों के साथ ससुराल छोड़कर चली गई।
मामले की सुनवाई जस्टिस डीके सिंह और जस्टिस एच. शांति भूषण की पीठ ने की। अदालत ने कहा कि केवल इस आधार पर कि पति-पत्नी अलग-अलग कमरों में रहते हैं, क्रूरता का निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता।
झगड़े और मानसिक प्रताड़ना को माना अहम
पत्नी ने पति पर शारीरिक, मौखिक और भावनात्मक क्रूरता के आरोप लगाए थे। उसने बच्चों की उपेक्षा और पति के मालिकाना व्यवहार का भी आरोप लगाया। वहीं, पति ने इन आरोपों से इनकार करते हुए दावा किया कि पत्नी अपने मायके वालों के प्रभाव में थी और वैवाहिक रिश्ते में आई खटास के लिए वही जिम्मेदार थी।
हाईकोर्ट ने कहा कि अलग-अलग कमरों में रहने की घटना को अकेले नहीं देखा जा सकता। मामले में बार-बार होने वाले झगड़े, मौखिक गाली-गलौज, भावनात्मक उपेक्षा, खराब व्यवहार और सुलह की असफल कोशिशों के समग्र प्रभाव को देखते हुए मानसिक क्रूरता साबित होती है।
अदालत ने कहा कि किसी भी जीवनसाथी से यह उम्मीद नहीं की जा सकती कि वह लंबे समय तक ऐसे व्यवहार को सहन करता रहे, जिससे लगातार मानसिक पीड़ा हो और वैवाहिक जीवन की बुनियादी सुरक्षा प्रभावित हो।
शिकायत को क्रूरता मानने से इनकार
हाईकोर्ट ने पति की उस दलील को भी खारिज कर दिया, जिसमें उसने पत्नी द्वारा दर्ज कराई गई आईपीसी की धारा 498-A की शिकायत को पत्नी की ओर से की गई क्रूरता बताया था। अदालत ने स्पष्ट किया कि केवल आपराधिक शिकायत दर्ज कराने या बाद में उसमें बरी हो जाने से यह साबित नहीं होता कि शिकायत झूठी या दुर्भावनापूर्ण थी। इस मामले में पति को 498-A के केस में बरी कर दिया गया था, लेकिन हाईकोर्ट ने इसे पत्नी की ओर से वैवाहिक क्रूरता का प्रमाण मानने से इनकार कर दिया।
25 हजार रुपये मासिक भरण-पोषण भी बरकरार
हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट द्वारा तय किए गए 25,000 रुपये प्रति माह के स्थायी भरण-पोषण को भी बरकरार रखा। अदालत ने कहा कि पत्नी का रोजगार में होना या उसकी अपनी आय होना, अपने आप में उसे पति से स्थायी भरण-पोषण पाने से वंचित नहीं करता।
इस फैसले में हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि वैवाहिक विवादों में किसी एक घटना को अलग करके देखने के बजाय पति-पत्नी के व्यवहार और पूरे वैवाहिक संबंधों की परिस्थितियों का समग्र आकलन जरूरी है।