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मध्य-पूर्व की जंग का असर बिहार तक… सुधा डेयरी में त्राहिमाम, नौकरी छोड़कर घर लौटे प्रवासी; गैस-डीजल संकट की आहट

Iran Israel War: मध्य-पूर्व में चल रहा ईरान-इजरायल संघर्ष अब बिहार में भी असर दिखाने लगा है। गैस और डीजल की संभावित कमी ने उद्योगों और आम लोगों की चिंता बढ़ा दी है। सुधा डेयरी और एनटीपीसी जैसे संस्थान सतर्क हैं, जबकि प्रवासी मजदूरों की मुश्किलें...

28-Mar-2026 12:37 PM

By First Bihar

Iran Israel War: बिहार में एक बार फिर वैश्विक हालात का असर साफ दिखने लगा है। मध्य-पूर्व में जारी ईरान-इजरायल संघर्ष की तपिश अब राज्य के उद्योगों और आम लोगों तक पहुंचती नजर आ रही है। खासकर गैस और डीजल की संभावित कमी को लेकर चिंता बढ़ने लगी है, जिसका असर बड़े औद्योगिक प्रतिष्ठानों से लेकर प्रवासी मजदूरों तक महसूस किया जा रहा है।


मुजफ्फरपुर स्थित सुधा डेयरी में हालात धीरे-धीरे चुनौतीपूर्ण होते जा रहे हैं। डेयरी प्रबंधन के अनुसार, फिलहाल उत्पादन सामान्य रूप से चल रहा है, लेकिन गैस सिलेंडर और डीजल की आपूर्ति में आई कमी के संकेत भविष्य के लिए खतरे की घंटी माने जा रहे हैं। प्लांट को हर दिन 47 किलो वाले करीब 40 से 45 गैस सिलेंडरों की जरूरत होती है, जबकि महीने में 20 से 21 हजार लीटर डीजल की खपत होती है।


डेयरी के प्रबंध निदेशक फूल कुमार झा ने बताया कि अगर यही स्थिति बनी रही तो आने वाले दिनों में दूध और अन्य डेयरी उत्पादों के उत्पादन पर असर पड़ सकता है। इसको लेकर मुख्यालय को पत्र भेजकर स्थिति से अवगत करा दिया गया है और आवश्यक दिशा-निर्देश मांगे गए हैं।


इधर एनटीपीसी कांटी जैसे बड़े बिजली उत्पादन केंद्र भी सतर्क हैं। हालांकि यहां डीजल की खपत सीमित होती है, लेकिन आपात स्थिति में यदि डीजल की उपलब्धता नहीं हुई तो बिजली उत्पादन प्रभावित हो सकता है। एनटीपीसी के अधिकारियों का कहना है कि फिलहाल कोई बड़ा संकट नहीं है, लेकिन हालात पर लगातार नजर रखी जा रही है।


दूसरी ओर, इस वैश्विक संकट का असर मजदूरों की जिंदगी पर भी पड़ने लगा है। जालंधर में काम कर रहे बिहार के प्रवासी मजदूरों को गैस की बढ़ती कीमतों और कमी के कारण भारी परेशानी का सामना करना पड़ा। गैस सिलेंडर की अनुपलब्धता के चलते खाना बनाना मुश्किल हो गया, जिससे उनका खर्च काफी बढ़ गया।


मुजफ्फरपुर और सीतामढ़ी के कई मजदूरों ने बताया कि पहले एक गैस सिलेंडर में पूरे महीने का खाना बन जाता था, लेकिन अब गैस नहीं मिलने के कारण रोज लकड़ी पर 200 रुपये से अधिक खर्च करना पड़ रहा था। वहीं, फैक्ट्री में काम भी कम हो गया, जिससे आमदनी घट गई और खर्च बढ़ गया।


ऐसी स्थिति में मजदूरों के सामने दोहरी मार पड़ी—एक तरफ महंगाई और दूसरी तरफ रोजगार की कमी। मजबूरी में कई मजदूरों ने नौकरी छोड़ दी और अपने गांव लौट आए। लेकिन गांव लौटने के बाद भी उनकी परेशानियां खत्म नहीं हुई हैं।


घर लौटे मजदूर अब रोजी-रोटी की चिंता में डूबे हुए हैं। उनका कहना है कि घर पर बैठकर कितने दिन गुजारा किया जा सकता है। बच्चों की पढ़ाई, दवा, कपड़ा और रोजमर्रा के खर्च कैसे पूरे होंगे, यह एक बड़ा सवाल बन गया है। फिलहाल उन्हें केवल गेहूं कटनी जैसे मौसमी काम से ही कुछ दिनों तक रोजगार मिलने की उम्मीद है।